१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
Page 450 of 505
Read in contextनारायण से ही समष्टिगत प्राण उत्पन्न हुआ है, मन और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भी उन्हीं से प्रकट हुई। आकाश, वायु, तेज,
जल तथा सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी की उत्पत्ति भी उन्हीं से हुई। ब्रह्मा और रुद्र भी नारायण से ही
उत्पन्न होते हैं- नारायणात्प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी।
नारायणाद्ब्रह्मा जायते। नारायणाद्रुद्रो जायते (नारा० १)। नारायण देव ही एकमात्र निष्कलङ्क, निरञ्जन,
निर्विकल्प, अनिर्वचनीय एवं विशुद्ध हैं, उनके सिवा दूसरा कोई नहीं है- निष्कलङ्को निरञ्जनो निर्विकल्पो
निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित् (नारा०२)। महोपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि
होती है कि आदि में एकमात्र नारायण ही थे, न ब्रह्मा, न रुद्र-एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो
(महो०१.१)। आदि पुरुष भगवान् नारायण के नामोच्चारण मात्र से मनुष्य कलि के सब दोषों का नाश करता है-
भगवत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलिर्भवतीति (कलिसं० १)।
१०६: निःश्रेयस -द्र०- अभ्युदय।
१०७. निःस्पृह—स्पृहा का तात्पर्य है - इच्छा, कामना, लालसा, अभिलाषा। जो कोई भी लौकिक इच्छा, कामना न
रखता हो, उसे निःस्पृह कहते हैं। निःस्पृह व्यक्ति ही एकमात्र आध्यात्मिक उत्कर्ष की महत्त्वाकांक्षा की रखते और
महिमावान् बनते हैं। ऐसे महामना अपने कर्त्तव्य पथ पर अविचल खड़े रहते हैं और प्रतिष्ठा एवं देव कृपा के सुयोग
को पाते हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि रजोगुण के बढ़ने पर लोभ प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति
और स्पृहा (विषय भोगों को इच्छा)- ये सब बढ़ते हैं- लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि
जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ (गी० १४.१२)। बन्धु-बान्धवों आदि की बढ़ाने की स्पृहा से दीनता के दोष की वृद्धि
होती है- दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा (महो० ३.३६)। सब कामनाओं से निःस्पृह चित्त ही युक्त
(नियंत्रित) कहा जाता है- निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा (गी० ६.१८)।
१०८ ध्रुवा — कोश ग्रन्थों में ध्रुवा-नित्या का पर्याय पार्वती, मनसा देवी, एक शक्ति बताया गया है। नित्या का एक अर्थ
ध्रुवा अर्थात् स्थिर है। ब्राह्मणग्रन्थों में पृथ्वी, आत्मा आदि की ध्रुवा कहकर उपन्यस्त किया गया है- पृथिवी ध्रुवा
(तै० ब्रा० ३.३.१.२), आत्मा ध्रुवा (तै०ब्रा० ३.३.१.५)। ब्रह्माण्ड पुराण (४.१९.५९) में अविनाशी देवियों के
एक समूह को नित्या कहा गया है। उपनिषद् में वर्णित है कि आहारशुद्धि होने पर अन्तःकरण की शुद्धि होती है
और अन्तःकरण की शुद्धि होने पर निश्चल (स्थिर) स्मृति प्राप्त होती है- आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ
ध्रुवा स्मृतिः (छान्दो० ७.२६.२)।
१०९. निर्गुण-सगुण— परब्रह्म के दो रूप माने गये हैं। निर्गुण और सगुण। उसके सगुण रूप से दृश्य जगत् की
उत्पत्ति हुई है। अनन्त सृष्टि की रचना करने वाला वह परमेश्वर वास्तव में अनन्त और निर्गुण ही है। निर्गुण का
तात्पर्य है- गुण रहित। परमात्मा की बनायी सृष्टि सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से युक्त है, लेकिन परमात्मा स्वयं
इन तीनों गुणों से परे होने से निर्गुण कहा जाता है। निर्गुण ब्रह्म अव्यक्त और केवल ज्ञान गम्य हैं। सगुण व्यक्त तथा
गुणों से संयुक्त है। गीता के कथनानुसार निर्गुण की उपासना क्लिष्ट है और सगुणोपासना सरल है। आदि शंकराचार्य
ने ब्रह्म को निराकार, निर्गुण, समस्त भेदों से रहित, सर्वोपाधि विनिर्मुक्त और नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव वाला
स्वीकार किया है। उपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि होती है। उस ब्रह्म को शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध से
रहित नित्य तथा अविनाशी स्वरूप वाला वर्णित किया गया है- अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च
यत् (कठ० १.३.१५)। ब्रह्म के निराकार, निर्गुण स्वरूप की मुण्डकोपनिषद् में उपन्यस्त किया गया है। वह ब्रह्म
अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण तथा चक्षुः, श्रोत्र और हाथ-पैरों से रहित हैं- यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः
श्रोत्रं तदपाणिपादम् (मुण्ड०१.१.६)। ब्रह्म का निर्गुण स्वरूप अनिर्वचनीय है, अतः उपनिषदों में उसका निरूपण
करते हुए 'नेति-नेति' (बृह० २.३.६) कहा गया है। सगुण ब्रह्म को माया की उपाधि से युक्त माना गया है। सगुण
उपासना में अवतारों की प्रधानता है। ईश्वर ही जब मायोपहित देह के द्वारा आविर्भूत होते हैं, तो उसे अवतार कहते
हैं। यह दृश्यमान जगत् भी सगुण ब्रह्म का रूप माना जाता है।
११०. निर्विकल्पक - द्र०-समाधि।
१११. निष्काम कर्म — शास्त्रों में निष्काम कर्म की महत्ता विशेष रूप से प्रतिपादित हुई है। निष्काम कर्म का तात्पर्य