१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextके षण्मास, उत्तरायण से संवत्सर, संवत्सर से आदित्य, आदित्य से विद्युत् को प्राप्त होते हैं। पितृयान मार्ग से जाने
वाले मनुष्य इसी प्रकार धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के षण्मास, फिर पितृलोक और वहाँ से चन्द्रमा को प्राप्त
होते हैं। स्वर्ग सुख भोगने के अनन्तर किसी योनि में पुनः जन्म ग्रहण करते हैं। उपनिषद् के अनुसार जो पितृयान
मार्ग है, वही यह रयि है- एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः (प्र०१.९)। देवयान मार्ग सत्य से परिपूर्ण है, जिससे
आप्तकाम ऋषिगण गमन करते हैं, जहाँ उस सत्यस्वरूप परमेश्वर का परमधाम है- सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन
पन्थाविततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् (मुण्ड०३.१.६)।
९७. धर्म-अधर्म - धर्म शब्द 'धृ' धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है- धारण करना। दर्शन शास्त्र के अनुसार
जिससे जीवन में अभ्युदय और निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति होती है, वह धर्म है-यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः
स धर्मः (वै०द०१.१.२)। मीमांसा दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि के अनुसार 'वेदों द्वारा निर्दिष्ट कर्म ही व्यक्ति
का धर्म है'- (मी०द०१.१.२)। न्यायदर्शन में २४ गुणों में से एक गुण धर्म भी वर्णित है। गीता में चारों वर्णों के
लिए भिन्न-भिन्न धर्म निर्धारित है। धर्म के चार वर्गीकरण इस प्रकार भी प्रतिपादित हैं- नित्य, नैमित्तिक, काम्य और
आपद् धर्म। स्मृति ग्रन्थ में धर्म के दस अङ्गों का वर्णन मिलता है- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह,
धी, विद्या, सत्य और अक्रोध। उपनिषद् में धर्म का आचरण करने और उसमें प्रमाद न करने का निर्देश दिया गया
है- धर्मं चर। धर्मान्न प्रमदितव्यम् (तैत्ति०१.११.१)। गीता में कहा गया है कि धर्म का थोड़ा आचरण भी महान्
भय से मुक्त कर देता है- स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् (गी०२.४०)। धर्म ही प्रजा को धारण करता
है-'धारणाद् धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः' (महा०कर्ण० ६९.५८)। इस प्रकार धर्म का जो प्रतिपादन हुआ,
उससे विपरीत अधर्म है। व्यास जी ने संक्षेप में धर्म (पुण्य) और अधर्म (पाप) को परिभाषा बताते हुए लिखा है-
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। परोपकार ही धर्म है, परपीडा
(दूसरों को कष्ट देना) अधर्म है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है-
परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई॥
९८. धर्मसूत्र - वेदाङ्ग में 'कल्प' के अन्तर्गत सूत्र ग्रन्थ चार प्रकार के हैं- श्रौत, गृह्य, धर्म और ऐन्द्रजालिक (रचना
सम्बन्धी)। ये मनुष्य के व्यावहारिक तथा धार्मिक जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्व के हैं। धर्मसूत्र वे ग्रन्थ हैं, जिनमें
चारों वर्णों तथा चारों आश्रमों के कर्त्तव्यों, मर्यादाओं तथा आचरण, व्यवहार आदि का निर्देश है। ये धर्मसूत्र प्रमुख
रूप से पाँच हैं- १.आपस्तम्ब, २. हिरण्यकेशी, ३.बौधायन, ४. गौतम और ५. वसिष्ठ। इनमें अपराध आदि के दण्डों
के विधान तथा प्रायश्चित्त भी वर्णित हैं।
९९. धाता - द्र० - विधाता।
१००. धारणा - चित्तवृत्तियों को चारों ओर से हटाकर किसी एक स्थान या विषय में लगाना धारणा है। मन के
विचारों-संकल्पों को आत्मा में लय करते रहना और आत्मा या परमात्मा के चिन्तन में स्थित रहना धारणा कहलाता
हैं। मन की वह स्थिति जिसमें ब्रह्म चिन्तन के अतिरिक्त अन्य कोई भाव या विचार नहीं ठहरता, धारणा कहलाती
है। इसमें मन में वासना नहीं रह जाती। उपनिषद् के अनुसार मन को संकल्पात्मक मानकर उसे आत्मा में लय करते
हुए उसे परमात्म चिन्तन में धारण करना 'धारणा' को स्थिति है- मनः संकल्पकं ध्यात्वा संक्षिप्यात्मनि
बुद्धिमान्। धारयित्वा तथात्मानं धारणा परिकीर्तिता (अमृ०१६)। योगसूत्र के अनुसार चित्त को एक स्थान पर
दृढ़ करना धारणा है- देशबन्धः चित्तस्य धारणा (यो०द०३.१)। प्राणायाम के द्वारा इन्द्रियों के दोषों को तथा
धारणा के द्वारा पापों को जलाते हैं-प्राणायामैर्दहेद् दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषम्। किल्बिषं हि क्षयं नीत्वा
रुचिरं चैव चिन्तयेत् (अमृ०८)।
१०१. ध्यान - चित्त को चारों ओर से हटाकर किसी एक विषय पर सतत स्थिर करना ध्यान कहलाता है। बाह्य इन्द्रियों
के बिना केवल मन में किसी विषय या व्यक्ति को लाना या बिठाना भी ध्यान है। ध्यान में ध्याता अपने चित्त को
ध्येय में स्थिर या एकाग्र करता रहता है। यही ध्यान जब चरमावस्था को पहुँचता है, तब समाधि कहलाता है। सांख्य
दर्शन के अनुसार चित्त का राग से विमुक्त होना ही ध्यान है- रागोपहितिर्ध्यानम् (सां०द०३.३०)। इसी तथ्य को
उपनिषद् कहता है कि मन का विषयों से मुक्त होना ही ध्यान है- ध्यानं निर्विषयं मनः (मैत्रे०२.३)। गीता में कहा