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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

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है- कामना रहित कर्म। श्रीमद्भगवद्गीता में निष्काम कर्म का आदेश है। इसमें फल की इच्छा के बिना कर्म किया
जाता है। अपने कर्म को अपने उपास्य के चरणों में अर्पित कर दिया जाता है। निष्काम कर्म करने वाले के हृदय
में परमात्मा प्रवेश करता है तथा उसे भक्ति एवं मोक्ष प्रदान करता है। सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण कर्म प्रकृति
के द्वारा होता है, पुरुष के ऊपर कर्म का आरोप मिथ्या है। जब यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब मनुष्य बन्धन में नहीं
पड़ता। मनुस्मृति के अनुसार संसार में कहीं भी कामना के बिना कोई क्रिया नहीं दिखाई देती। मनुष्य कामनाओं
की प्रेरणा से ही कर्म करता है (मनु०स्मृ०२.४); परन्तु कामनाओं के पथ पर भटकते मनुष्य भगवत्प्राप्ति जैसे दिव्य
उद्देश्य को प्राप्ति नहीं कर पाते, उसके लिए तो निष्काम कर्म ही प्रतिपादित किया गया है।
११२. पञ्चकोश — वेदान्त में मनुष्य शरीर के पाँच कोशों का वर्णन किया गया है- अन्नमय, प्राणमय, मनोमय,
विज्ञानमय और आनन्दमय कोश। स्थूल शरीर में अन्नमय कोश, सूक्ष्म शरीर में प्राणमय कोश, मनोमय एवं
विज्ञानमय तथा कारण शरीर में आनन्दमयकोश अवस्थित है। मन के साथ पंच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से मनोमय
कोश तथा बुद्धि के साथ पंच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से विज्ञानमय कोश बनता है। पाँच प्राणों तथा कर्मेन्द्रियों के मेल
से प्राणमयकोश बनता है। प्राणमय कोश क्रियाशक्ति से सम्पन्न तथा कर्मरूप है। मनोमय कोश इच्छाशक्ति से सम्पन्न
और कारण रूप है। विज्ञानमय कोश ज्ञानशक्ति से सम्पन्न और कर्तृरूप है। आनन्दमयकोश में मनुष्य समाधि का
अभ्यास करके अपने मूल स्वरूप में आ जाता है। सर्वसारोपनिषद् के अनुसार अन्न से बनने वाले कोशों के
समूहरूपी शरीर को अन्नमय कोश कहते हैं। प्राण आदि चौदह प्रकार को वायु इस अन्नमय कोश में संचार करते
हैं, तब उसे प्राणमय कोश कहते हैं। इन दो कोशों के भीतर मन आदि चौदह इन्द्रियों द्वारा जब आत्मा शब्दादि
विषयों का विचार करता है, तब उसे मनोमय कोश कहते हैं। आत्मा इन तीनों कोशों के साथ संयुक्त होकर बुद्धि
द्वारा जो कुछ जानता है, उसका बुद्धियुक्त स्वरूप विज्ञानमय कोश है। इन चारों कोशों के साथ आत्मा बरगद के बीज
के वृक्ष की भाँति अपने कारण स्वरूप अज्ञान में रहता है, उसे आनन्दमय कोश कहते हैं। अन्नमय कोश को
विकसित करने के उपाय १. उपवास, २. आसन, ३. तत्त्व शुद्धि और ४. तपश्चर्या मुख्य हैं। प्राणमय कोश के लिए
१. बन्ध, २. मुद्रा तथा ३. प्राणायाम किया जाता है। मनोमय कोश को साधना हेतु १. ध्यान, २. त्राटक, ३. जप
और ४. तन्मात्रा को साधना करते हैं। विज्ञानमय कोश की पुष्टि के लिए १. सोऽहम् साधना २. आत्मानुभूति, ३.
स्वर-संयम और ४. ग्रन्थि भेदन करने हैं। आनन्दमय कोश के विकास के लिए १. सहज समाधि, २. नाद साधना,
३. बिन्दु साधना तथा ४. किरण या कला साधना का प्रयोग करते हैं।
११३. पञ्चप्राण — द्र० - प्राण।
११४. पञ्चविध मुक्ति — जीवात्मा जब इष्ट देव या ब्रह्म के लोक, रूप, योग, निकटता या एकत्व को प्राप्त करता है,
तो यह मुक्ति की अवस्था कही जाती है। यह मुक्ति पञ्चविध मान्य है- सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य और
कैवल्य। मुक्त जीव जब इष्टदेव के साथ एक लोक में वास करता है, इसे सालोक्य मुक्ति कहा गया है। उपासक जब
अपने उपास्य के रूप में रहते हुए उसी के रूप को प्राप्त कर लेता है, इस समान रूप होने के भाव या सरूपता को
सारूप्य मुक्ति कहते हैं। मुक्त जीव जब भगवान् के पास वास करता है, तो उस मुक्ति को सामीप्य कहा गया है और
जिसमें जीव परमात्मा में लीन हो जाता है या योग को प्राप्त करता है, तो यह मुक्ति सायुज्य कही जाती है। अविद्या,
त्रिविध दुःखों तथा अहंकार आदि से निवृत्ति की विशुद्ध स्थिति को कैवल्य मुक्ति कहा गया है। मुक्तिकोपनिषद् में
भगवान् श्रीराम का कथन है कि दुराचार में लगा हुआ व्यक्ति भी मेरा नाम स्मरण करते से सालोक्य मुक्ति को प्राप्त
होता है, वहाँ से वह अन्य लोकों में नहीं जाता- दुराचारस्तो वापि मन्नामभजनात्कपे। सालोक्य मुक्तिमाप्नोति
न तु लोकान्तरादिकम् (मुक्ति० १.१८-१९)। पाप समूह के नष्ट होने पर वह मेरे सारूप्य-समान रूप को प्राप्त
होता है-निर्धूताशेषपापौघो मत्सारूप्यं भजत्ययम् (मुक्ति० १.२१)। जो द्विज सदाचार में रत रहकर नित्य अनन्य
भाव से मेरा ध्यान करता है और सर्वात्म भाव से मेरा भजन करता है, वह मेरे सामीप्य को प्राप्त होता है-
सदाचाररतो भूत्वा द्विजो नित्यमनन्य धीः। मयि सर्वात्मके भावो मत्सामीप्यं भजत्ययम् (मुक्ति०१.२२-२३)।
वह द्विज जब भ्रमरकीट के समान सम्यक् रूप से मेरे सायुज्य को प्राप्त होता है, तब वह कल्याणकारी और ब्रह्मानंद
को प्रदान करने वाली सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है- मत्सायुज्यं द्विजः सम्यग्भजेद्भ्रमरकीटवत्। सैव सायुज्यमुक्तिः