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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 446 of 505

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Page 446

४५२ [परिशिष्ट] दक्षिणा
पर सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है। सूक्ष्म शरीर सत्रह अवयवों वाला है-पंचज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच प्राण
तथा मन और बुद्धि। दूसरे शब्दों में इसे विज्ञानमय कोश (पंचज्ञानेन्द्रियाँ तथा बुद्धि), मनोमय कोश (पंच ज्ञानेन्द्रियाँ
तथा मन) तथा प्राणमय कोश (पंचकर्मेन्द्रियाँ तथा पंच प्राण) का समुच्चय कहा जा सकता है।
सूक्ष्म शरीर की दो स्थितियाँ होती हैं- एक समष्टिगत, दूसरी व्यष्टिगत। सूक्ष्म शरीर की समष्टि से उपहित
चैतन्य को 'हिरण्यगर्भ' तथा व्यष्टि से उपहित चैतन्य को 'तैजस' कहा गया है। समष्टिभूत 'चैतन्य' हिरण्यगर्भ के
अतिरिक्त सूत्रात्मा प्राण, प्रजापति तथा ब्रह्मा आदि संज्ञाओं से भी अभिहित किया गया है। व्यष्टिभूत चैतन्य 'तैजस'
है। दोनों में प्रमुख अन्तर यह है कि समष्टिभूत चैतन्य अपरिच्छिन्न (अनावृत-असीम) होता है और व्यष्टिभूत
चैतन्य 'परिच्छिन्न' (आवृत-ससीम) होता है। यह सूक्ष्म देहाभिमानी 'तैजस' सूक्ष्मतर विषयों का ही आहार ग्रहण
करने वाला होता है। यह स्थिति 'स्वप्नावस्था' में आती है। वेदान्त की मान्यतानुसार वन और वृक्ष की तरह
हिरण्यगर्भ (वन) और तैजस (वृक्ष) में अभेद है।
८९. त्रयताप-त्रिविध दुःख - 'दर्शन' जगत् में यह शब्द अति प्रसिद्ध है। दर्शन का एक प्रयोजन तीनों तापों-तीनों
दुःखों से मुक्ति दिलाना माना गया है। सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल ने मानव जीवन का परम पुरुषार्थ त्रिविध
दुःखों का अत्यन्ताभाव माना है-अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्त पुरुषार्थः (सां० १.१)। सभी प्राणी जिन
अनेकानेक दुःखों-कष्टों से विनिवृत्ति चाहते हैं, उन्हें तीन वर्गों में बाँटा गया है- १. आध्यात्मिक २. आधिभौतिक
३. आधिदैविक। जो दुःख शरीर-मन से जुड़े होते हैं, उन्हें आध्यात्मिक दुःख कहा जाता है, जैसे- रोग, शोक,
लोभ- मोह, ईर्ष्या-द्वेष, आदि। जो दुःख अन्यान्य प्राणियों के संसर्ग से उत्पन्न होते हैं, उन्हें आधिभौतिक-दुःख
कहा जाता है, जैसे-सर्प-बिच्छू, सिंह आदि हिंस्र जन्तुओं तथा मनुष्यों के लड़ाई-झगड़े से उत्पन्न दुःख। जो दुःख
दैवी आपदाओं के रूप में प्राप्त होते हैं, उन्हें आधिदैविक दुःख कहा जाता है। जैसे- अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प,
विद्युत्पात आदि। दर्शन का प्रयोजन मुख्यतः इन्हीं त्रय तापों से मुक्ति प्रदान करने का है। इसी उद्देश्य से इनके
अध्ययन, चिन्तन, मनन, की आवश्यकता होती है। त्रयतापों की निवृत्ति के बाद ही परमानन्द प्राप्ति का पथ-प्रशस्त
होता है।
९०. त्रय-शरीर - शास्त्रों में मनुष्य शरीर के तीन भेद किये गये हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण। दृश्यमान अंग-
अवयवों या पञ्चभूतों से निर्मित शरीर स्थूल शरीर कहलाता है। स्थूल का शब्दार्थ भौतिक, मूर्त, अन्न तथा भोग्य
से लिया जाता है। सूक्ष्म से तात्पर्य अभौतिक, अमूर्त, अग्नि, भोक्ता तथा अदृश्य से लिया जाता है। पञ्च तन्मात्राओं,
पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्चकर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि-इन सत्रह के समूह को सूक्ष्म या लिङ्ग शरीर कहते हैं। भावनाओं,
इच्छाओं, आकांक्षाओं से सम्बद्ध आन्तरिक शरीर को कारण शरीर कहा जाता है। ऐसा भी वर्णन आता है कि स्थूल
शरीर स्वयं से विराट् सूक्ष्म शरीर में तथा सूक्ष्म शरीर स्वयं से विराट् कारण शरीर में समाया हुआ है। इन तीनों शरीरों
को प्रेरित करने वाला वह परम पुरुष अर्थात् आत्मा इनसे भिन्न है। स्थूल शरीर को अन्नमय कोश, सूक्ष्म शरीर को
प्राणमय, मनोमय एवं विज्ञानमय कोश तथा कारण शरीर को आनन्दमय कोश से सम्बद्ध माना जाता है। स्थूल, सूक्ष्म
एवं कारणरूप जो विश्व, तैजस एवं प्राज्ञ ईश्वर है, उनके साथ सब अवस्थाओं में एक ही साक्षी (ब्रह्म) स्थित है-
स्थूल सूक्ष्मकारणरूपैर्विश्वतैजसप्राज्ञेश्वरैः सर्वावस्थासु साक्षी त्वेक एवावतिष्ठते (ना०प० ६.१)।
९१. दक्षिणा - यज्ञ करने वाले पुरोहितों को दिये गये दान को दक्षिणा कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति पर शिष्य
अपने आचार्य को गुरु दक्षिणा देता था। गृह्यसूत्रों में इसका विधान वर्णित है। प्रत्येक धार्मिक या माङ्गलिक कार्य की
समाप्ति पर पुरोहितों, ऋत्विजों को दक्षिणा देना आवश्यक समझा जाता था। इसके बिना शुभ कार्य का सुफल नहीं
मिल पाता। श्रुति के अनुसार दक्षिणादाता स्वर्ग में उच्चस्थ पदों पर प्रतिष्ठित होते हैं- उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो
अस्थुर्ये (ऋ० १०.१०७.२)। छान्दोग्य० के अनुसार जो तप, दान, आर्जव (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन हैं-
ये आत्मयज्ञ की दक्षिणारूप हैं-यत्तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः (छान्दो०३.१७.४)।
याज्ञवल्क्य और शाकल्य संवाद में वर्णित है कि यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है ? दक्षिणा में। दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है ?
श्रद्धा में; क्योंकि पुरुष में जब श्रद्धा होती है, तभी दक्षिणा देता है- कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति
कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठित इति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धद्धेऽथ दक्षिणां ददाति (बृह०३.९.२१)।