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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

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तप (परिशिष्ट) ४५१
८५. तप—विषयों से, राग से शरीर और मन को दृढ़ता पूर्वक मुक्तकर योग की स्थिति के लिए तैयार करना ही तप
है। शरीर तथा मन की विविध विषयों में प्रयुक्त होने वाली शक्ति की संयमित करना और उनकी शक्ति की उड्डीस
करना भी तप कहलाता है। तप के द्वारा मनुष्य असाधारण तेज सम्पन्न होता है। साधन की दृष्टि से तप की तीन प्रकार
का माना गया है-१. शारीरिक, २. वाचिक, ३. मानसिक। महापुरुषों, देवगणों आदि की पूजा आराधना, ब्रह्मचर्य,
अहिंसा की शारीरिक तप माना गया है। वेद पठन, सत्य, प्रिय और हितकर वचन बोलना वाचिक तप है। मनो-
निग्रह, वासनाओं का निरोध, मौन और भावशुद्धि की मानसिक तप कहा गया है।
फलाकांक्षा से रहित होकर श्रद्धापूर्वक किये गये ये तीनों तप सात्त्विक तप कहे गये हैं। भावों की दृष्टि से
इस प्रकार भी तप के तीन भेद किये गये हैं- १. सात्त्विक, २. राजस और ३. तामस। तप से विद्या, योग, मन्त्र आदि
की इष्ट सिद्धि मिलती है। उपनिषद् में तप और स्वाध्याय तथा उपदेश की मनुष्य के कर्त्तव्यों में अभिहित किया गया
है- तपश्च स्वाध्याय प्रवचने च (तैत्ति० १.९)। तप से ही ब्रह्म वृद्धि-विस्तार की प्राप्त होता है- तपसा चीयते
ब्रह्म (मुण्ड० १.१.८)। तप से ही ब्रह्म की जानने की तीव्र इच्छा करें, तप ही ब्रह्म है- तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व।
तपो ब्रह्मेति (तैत्ति०३.२)। तप के द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है, ज्ञान होने से 'मन' वश में आता है। मन वश में आने
से आत्मा की प्राप्ति होती है और आत्मा की प्राप्ति होने पर संसार से मुक्ति मिल जाती है-तपसा प्राप्यते सत्त्वं
सत्त्वात्संप्राप्यते मनः। मनसा प्राप्यते त्वात्मा ह्यात्मापत्त्या निवर्तत इति (मैत्रा० ४.३)। तप के प्रति एकनिष्ठ रहने
वाले को तपोनिष्ठ तथा तप की विपुल पूँजी संचय करने वाले की तपोनिधि कहा गया है।
८६. तुरीय-तुरीयातीत- वेदान्त में प्राणियों की चार अवस्थाएँ वर्णित हैं- जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। तुरीय
(चतुर्थ अवस्था) की मोक्ष की अवस्था भी कहा गया है। उक्त तीनों अवस्थाओं की उत्पत्ति और लय की जानने
वाला और स्वयं उत्पत्ति-लय से परे रहने वाला जो नित्य साक्षी चैतन्य है- वह तुरीय चैतन्य है और यह अवस्था
तुरीय है- अवस्थात्रयभावाभावसाक्षी स्वयंभूभावरहितं नैरन्तर्यं चैतन्यं यदा-तदा तुरीयं चैतन्यमित्युच्यते (स०
सा०४)। जाग्रत् अवस्था मे वैश्वानर संज्ञक आत्मा नेत्र में रहता है, स्वप्नावस्था में तैजस आत्मा कण्ठ में रहता है,
सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ संज्ञक आत्मा हृदय में रहता है और तुरीय (चतुर्थ- तीन अवस्थाओं से परे की) अवस्था
का आत्मा ब्रह्मरन्ध्र में रहता है-नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समाविशत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि
संस्थितम् (ना०प० ५.१)। तुरीय अवस्था की विजित करने वाले संन्यासियों की एक श्रेणी तुरीयातीत कहलाती
है। उस जन्म-मरण, धर्म और मोक्ष की तुरीय अवस्था से परे उस विशुद्ध परमात्मा या परब्रह्म को भी तुरीयातीत
कहा गया है।
उपनिषद् में सूर्य की भी तुरीय या दर्शात पद कहा गया है। जो (आदित्य) तपता है, जो चतुर्थ होता है, वही
तुरीय या दर्शात पद है- य (आदित्य) एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरियं दर्शातं पदमिति (बृह० ५.१४.३)। यह
तुरीय दर्शात पद या परोरजा (सभी लोकों से परे) किसी के द्वारा प्राप्य नहीं है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कैसे कर
सकता है- एतदेव तुरीयं दर्शातं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् (बृह०
५.१४.६) यह निर्गुण ब्रह्म ही तुरीयातीत तत्त्व है, इसमें अवस्था-भेद नहीं है- अवस्थाः न त्वेवं तुरीयातीतस्य
निर्गुणस्य (ना०प० ६.१)।
८७. तैंतीस देवता-निरुक्तकार यास्कमुनि के अनुसार देव शब्द की व्युत्पत्ति दान, दीपन, द्योतन आदि अर्थों में की
गयी है। वास्तव में देव शब्द विश्व की प्रकाशक और कल्याणकारी शक्तियों का प्रतीक है। इन्हें तैंतीस कोटि
(करोड़) या श्रेणियों का माना गया है। तैंतीस संख्यक देवों में अष्टवसु, एकादशरुद्र, द्वादश आदित्य, पृथ्वी और द्यौ
को परिगणित किया गया है। इसकी पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में होती है- अष्टौ वसवः। एकादश रुद्रा द्वादशादित्या
इमेऽएव द्यावापृथिवी त्रयस्त्रिंश्यौ त्रयस्त्रिंशद्वै देवाः (शत० ब्रा० ४.५.७.२)। निरुक्त (३.७.४) के अनुसार
ये सब देवता एक ही अद्वय आत्मा के प्रत्यंगरूप हैं- एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति।
८८. तैजस- यह वेदान्तदर्शन का पारिभाषिक शब्द है। सृष्टि विकास क्रम मे कारण रूप ईश्वर से उनकी इच्छानुसार
सृष्टि सृजन के संकल्प के साथ ही सृष्टि-प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इसी क्रम में सूक्ष्म तन्मात्राएँ, पंचभूत,
पंचज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चप्राणादिकों के प्रादुर्भाव का क्रम सम्पन्न होता है। पंचीकरण एवं त्रिवृत्करण सिद्धान्तों के आधार