Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished505 pages

About this granth

This is the Gyan Khand (ज्ञान खण्ड), the second volume of the 108 Upanishad series edited by Pandit Shriram Sharma Acharya. The series sorts the Upanishads into three thematic groups; this one brings together texts focused on knowledge of the Self, Brahman and the world.

As in the other volumes, the Sanskrit mantras are printed with a simple Hindi bhavartha, and running heads mark adhyaya, khanda and mantra numbers. The Katha Upanishad appears here with its two adhyayas and six vallis, carrying the dialogue between Nachiketa and Yama. The introduction places the Upanishads within the four layers of Vedic literature (Samhita, Brahmana, Aranyaka and Upanishad) and contrasts their emphasis on knowledge with the ritual concerns of the earlier layers.

The copy was published by Yug Nirman Yojana, Gayatri Tapobhumi, Mathura, in 2005 and runs to 505 pages, making it the largest of the three parts in this printing.

अध्याय १ ब्राह्मण २ मन्त्र ४ २४३

Page 243Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण २ मन्त्र ४ २४३
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
नैवेह किंचनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत्। अशनाययाशनाया हि मृत्युस्तन्मनो-
ऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति। सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चते वै मेकमभूदिति
तदेवार्कस्यार्कत्वम् कः ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद॥ १॥
प्रारम्भ में इस विश्व में और कुछ भी न था। सब कुछ मृत्यु से आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था।
क्षुधा ही मृत्यु है। (संसार को अपने अन्दर विलीन कर लेने के कारण ईश्वर को भी मृत्यु कहते हैं।) उसने सङ्कल्प
किया कि मैं मन (संकल्पशक्ति) से युक्त हो जाऊँ। उसने अर्चन (इसके लिए प्रयत्न) किया, जिससे आपः (कारण
रूप सक्रिय तत्त्व या प्रकृति) की उत्पत्ति हुई। यह (आपः) ही अर्क (ब्रह्माण्ड) का अर्कत्व (ऐश्वर्य) है। इस अर्क
(मूल तत्त्व) को इस प्रकार जानने वाले को 'क' (सुख) की प्राप्ति होती है॥ १॥
[ सब कुछ मृत्यु एवं क्षुधा से आवृत था, यह आलंकारिक उक्ति है। मृत्यु निष्क्रियता की स्थिति है- प्रलय
की स्थिति है। ब्रह्माण्ड को अपने में लय कर लेने की ईश्वरीय इच्छा को उसकी क्षुधा कह सकते हैं। लय करने
की इच्छा या क्षुधा के फलस्वरूप ही प्रलय-मृत्यु की स्थिति आती है। उसी ब्रह्म की इच्छा पुनः उगल देने की-सृष्टि
को प्रकट करने की हुई, तो वह चक्र पुनः चल पड़ा। अर्क शब्द 'अर्च' धातु से बना है। इसे अर्च्+क या अर्कू+क
( = अर्चक-अर्क) कह सकते हैं। इसे देव संज्ञक मानते हैं। इस देव रहस्य को जानने वाले को सुख या देवत्व की
प्राप्ति होना उचित है।]
आपो वा अर्कस्तद्यदपाᳵ शर आसीत्तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य
श्रान्तस्य तप्तस्य तेजोरसो निरवर्तताग्निः ॥ २॥
आपः (मूलतत्त्व) ही अर्क है। उस आपः के ऊपर स्थूल भाग एकत्र हो जाने से पृथिवी की उत्पत्ति
हुई। तदुपरान्त उस पृथिवी पर सृजेता के श्रम और तपश्चर्या के परिणाम स्वरूप उसका (ईश्वर का) सारभूत
तेज अग्नि के रूप में प्रकट हुआ॥ २॥
स त्रेधात्मानं व्यकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं तृतीयंᳵ स एष प्राणस्त्रेधा विहितः। तस्य
प्राची दिक़्शिरोऽसौ चासौ चेमौ। अथास्य प्रतीची दिक् पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ
दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्वचैति
तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥ ३॥
उस परमेश्वर ने अपने (अग्निरूप अवतरण) के तृतीयांश को सूर्य, तृतीयांश को वायु (तथा शेष
तृतीयांश अग्नि) इस प्रकार तीन भागों में विभक्त किया । पूर्व दिशा उस विराट् का शीर्ष भाग (सिर),
ईशान दिशाएँ और आग्नेय दिशाएँ उसकी दोनों बाँहें, पश्चिम दिशा उसकी पूँछ तथा वायव्य और नैऋत्य
दिशाएँ उस विराट् की जंघाएँ हैं। उत्तर और दक्षिण दिशाओं को उसका पार्श्व भाग तथा द्युलोक को पृष्ठ
भाग कहते हैं। अन्तरिक्ष उसका उदर प्रदेश और पृथिवी वक्षस्थल (हृदय) है। यह (अग्नि रूप विराट्
तत्त्व) आपः तत्त्व में प्रतिष्ठित है। इस विराट् को जो इस प्रकार जानता है, वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ३॥
सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनᳵ समभवदशनाया
मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत्स संवत्सरोऽभवत्। न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं
कालमबिभः। यावान्संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत। तं जातमभिव्याददात्स
भाणकरोत्सैव वागभवत्॥ ४॥

Page 244Permalink

२४४ [Page Number]
बृहदारण्यकोपनिषद् [Header]

उस विराट् ने इच्छा की कि मेरा द्वितीय (भिन्न) रूप या प्रयास भी प्रकट हो। अस्तु, उस क्षुधारूप
मृत्यु ने मन के साथ वाणी की कामना की। दोनों के सम्बद्ध होने से जो रेतस् प्रकट हुआ, वही संवत्सर
हुआ। उससे पूर्व संवत्सर अथवा काल नहीं था। उस संवत्सर को उतने ही समय तक वे मृत्यु स्वरूप
प्रजापति गर्भ में धारण किये रहे। निर्धारित समय पूरा हो चुकने के बाद उस (संवत्सर) को प्रकट किया।
उस उत्पन्न कुमार को खाने के लिए मृत्यु ने मुँह फैलाया, तब उस (कुमार के) मुख से 'भाण्' (शब्द)
निकला, वही वाणी हो गई ॥४॥
[यह आलंकारिक वर्णन है। मन के साथ वाणी के संयोग से रेतस् अर्थात् प्रवहमान तेजस्-ज्ञान
प्रकट हुआ। वही घनीभूत होकर संवत्सर (संवित्+सर) अर्थात् मन एवं वाणी के संयोग से बना ज्ञान
सरोवर बना। वह ज्ञान काल-कवलित न हो जाये, इसलिए उसने भा=शोभायुक्त, ण=प्राण प्रयोग (शोभनीय
प्राण प्रयोग अर्थात् ज्ञानयुक्त जीवों का विस्तार) किया। यह बात आगे सिद्ध होती है।]
स ऐक्षत यदि वा इममभिमांᳵस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तया वाचा तेनात्मनेदꣳ
सर्वमसृजत यदिदं किंचर्चो यजूंषि सामानि छन्दाꣳसि यज्ञान् प्रजाः पशून्। स
यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वꣳ सर्वस्यैतस्यात्ता भवति
सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥५॥
उस (मृत्यु) ने कुमार को भयभीत देखकर सोचा कि यदि मैं इसका भक्षण कर लूँ, तो यह अत्यल्प
अन्न ही ग्रहण करूँगा। अस्तु, मृत्यु ने मन और वाणी के संयोग से ऋक्, यजु, साम, छन्द और यज्ञ, पशु और
प्रजा की रचना की। इन सभी सृजित वस्तुओं को उसने भक्षण कर लेने का विचार किया। वह सबका भक्षण
करता है। ईश्वर भी सभी को अपने में लीन कर लेता है। अतः यही उस अदिति (अखण्ड रूप ईश्वर) का
अदितित्व (एकरस-एकरूप) है। जो इस प्रकार इस अदिति के अदितित्व का ज्ञान रखता है, वह इन सबका
अत्ता होता है अर्थात् वह समस्त वस्तुओं और अन्नों का खाने वाला (आत्मसात् करने वाला) होता है ॥५॥
सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति सोऽश्राम्यत्स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य
तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरꣳ श्वयितुमध्रियत
तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥६॥
उस (प्रजापति) ने कामना की कि मैं फिर से एक विराट् यज्ञ द्वारा यजन कार्य करूँ, सो उसने श्रम
और तप किया। तप और श्रम से यश और बल प्रकट हुए। प्राण तत्त्व ही यश और बल (वीर्य) है। प्राणों
के विस्तार के साथ ही शरीर फूलने (विस्तार पाने) लगा। तब भी उसका मन शरीर में (उस विकास
प्रक्रिया में) ही लगा रहा ॥६॥
[वर्तमान वैज्ञानिक-अनुसंधान के आधार पर भी सृष्टि का उद्भव बिगबैंग-महाविस्फोट के साथ
प्राण-प्रक्रिया का विस्तार हुआ और दृश्य जगत् फैल गया। पहले पदार्थ अत्यधिक घनीभूत था। उसके
फैलने-फूलने से ही यह मेध्य समझ जाने योग्य ब्रह्माण्ड विकसित हुआ।]
सोऽकामयत मेध्यं म इदꣳ स्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति ततोऽश्वः समभवद्यदश्व-
त्तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वं । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद तमनवरु-
द्ध्यैवामन्यत तꣳ संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत् तस्मात्सर्वदेवतं
प्रोक्षितं प्राजापत्यमालभन्ते । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्मायम-

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३ २४५

Page 245Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३ २४५
ग्रिरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ सोपुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप
पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ७ ॥
तदुपरान्त उसने कामना की कि मेरा यह शरीर जानने योग्य अथवा यज्ञीय (मेध्य) हो जाए और मैं
इसके माध्यम से शरीरवान् हो जाऊँ। तब यह शरीर अश्वत् (फैलकर बड़ा) हो गया। अस्तु, वह अश्व
कहलाया और वह अश्व ही मेध्य (जानने योग्य या संगति बिठाने योग्य अथवा यजनीय) हुआ। यही
अश्वमेध का अश्वमेधत्व है। इसे इस प्रकार जानने वाला ही वस्तुतः अश्वमेध को जानता है। उसने
(प्रजापति ने) उस अश्वमेध को अवरोध रहित ही विचार किया (दर्शन किया)। उसने (प्रजापति ने )
संवत्सर के बाद उसका (अश्व का) अपने निमित्त आलभन किया और अन्य पशुओं को भी देवों के
निमित्त प्रस्तुत किया। अस्तु, यजनकर्त्ता मन्त्र से संस्कारित समस्त देवों से सम्बन्धित प्राजापत्य पशु को
आलभित करते हैं। यह तप्यमान (आदित्य) ही अश्वमेध है। संवत्सर उसकी देह है। अग्नि अर्क है और
समस्त लोक ही इस (अश्व) की आत्मा हैं। ये अग्नि और आदित्य दोनों ही अर्क और अश्वमेध हैं; किन्तु
वे मृत्यु स्वरूप देवता एक ही हैं। इस प्रकार से मृत्यु को जानने वाला मृत्युजित् या मृत्युंजय हो जाता है।
वह स्वयं भी मृत्यु स्वरूप होकर देवों में भी मुख्य स्थान प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
उद्गीथ विद्या की यह आख्यायिका कतिपय परिवर्तनों के साथ छान्दोग्य उपनिषद् के अध्याय-१ के
द्वितीय खण्ड में भी आई है-
द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु
लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥
प्रजापति के पुत्रों के दो वर्ग थे- देवता और असुर। उनमें देवता अल्प और असुर बहु संख्यक थे।
विभिन्न लोकों में निवास करते हुए वे परस्पर प्रतिस्पर्धा करने लगे। देवताओं ने निश्चय किया कि हम
लोग यज्ञ में 'उद्गीथ' के द्वारा असुरों का अतिक्रमण करें ॥ १ ॥
ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणं वदति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥
तदुपरान्त देवों ने उद्गीथ गान हेतु वाणी के अभिमानी देवता वाक् से निवेदन किया। उनके निवेदन
को स्वीकार कर वाक् ने उद्गीथ पाठ किया। उसने अपने भोग को देवताओं के निमित्त गाया और अपने
लिए शुभ वचनों का गान किया, जिससे असुर जान गये कि देवगण उद्गाता के माध्यम से हम पर
आक्रमण करेंगे। अस्तु, उन्होंने वाक् के निकट जाकर उसे पाप से विद्ध कर दिया। वाक् का निषिद्ध
(अनुचित) वचन ही वस्तुतः पाप है ॥ २ ॥
अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः प्राण उदगायद्यः प्राणे भोगस्तंदेवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणं जिघ्रति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥

Page 246Permalink

२४६ बृहदारण्यकोपनिषद्
तब देवों ने प्राण से कहा कि आप हमारे लिए उद्गाता बन जाएँ। प्राण ने 'तथास्तु' कहकर इसे
स्वीकार कर लिया और उद्गीथ गायन सम्पन्न किया। उसने (प्राण ने) प्राण तत्त्व के भोग को देवताओं के
लिए और जिस (श्रेष्ठ) गंध को वह सूँघता है, उसे अपने लिए गाया। असुरों को विदित हो गया कि देवता
प्राण रूप उद्गाता द्वारा हमारा अतिक्रमण करेंगे। अस्तु, वे प्राण के पास गये और उसे पाप से बींध दिया।
घ्राण (प्राण शक्ति) जिस अनुपयुक्त अथवा निषिद्ध को सूँघता है, वही पाप है॥ ३॥
अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायद् यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४॥
तब देवों ने चक्षु से उद्गीथ गान करने के लिए निवेदन किया। उसे स्वीकार कर चक्षु इन्द्रिय ने
उद्गीथ गान किया। चक्षु में स्थित भोग सामर्थ्य को उसने देवों के निमित्त गाया और उसमें जो शुभ दर्शन
का गुण है, उसे अपने लिए गाया। इस तथ्य को असुरगण जान गये कि देवता चक्षुरूप उद्गाता के द्वारा
हमारा अतिक्रमण करेंगे, तब असुरों ने चक्षु के निकट जाकर (आक्रमण करके) उसे पाप से विद्ध कर
दिया। नेत्रेन्द्रिय जिस अनुचित को देखती है, वही पाप है॥ ४॥
अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुद्रायद्यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत्कल्याणःशृणोति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपःशृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५॥
इसके बाद देवताओं ने श्रोत्र (कर्णेन्द्रिय) से कहा कि आप हमारे लिए उद्गान करें। श्रोत्र ने स्वीकार करके
देवों के लिए उद्गान किया। श्रोत्रेन्द्रिय के भोग को उसने देवताओं के लिए और वह जो शुभ सुनता है, उसे अपने
लिए गाया। असुर यह जान गये कि श्रोत्र रूप उद्गाता के द्वारा देवता हमारे ऊपर आक्रमण करेंगे, तब उनने श्रोत्र पर
आक्रमण किया और उन्हें पाप- रूप अस्त्र से बींध दिया। अनुचित और अनुपयुक्त सुनना ही पाप है॥५॥
अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो मन उद्गायद्यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणः संकल्पयति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपः संकल्पयति स एव स पाप्मैवमु खल्वेता
देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मेनाविध्यन् ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवताओं ने मन से उद्गान करने की प्रार्थना की। मन ने उसे स्वीकार कर लिया और
उद्गान सम्पन्न किया। मन के भोगों को उसने देवताओं के लिए और उसके शुभ संकल्पों का अपने लिए
गान किया। इससे असुर यह जान गये कि देवगण मनरूप उद्गाता द्वारा हमारा अतिक्रमण करेंगे। तब
उन्होंने (असुरों ने) मन पर आक्रमण करके उसे पाप से विद्ध कर दिया। अनुपयुक्त और अशुभ संकल्प
करना ही पाप है। अतः देवगण पाप का संसर्ग पाकर (असुरों द्वारा) पाप से विद्ध हुए ॥ ६ ॥
अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत्ते विदुरनेन
वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यत्सयन्स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वग्ंसे
तैवग्ं हैव विध्वग्ंसमाना विष्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य
द्विषन्भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥७॥

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र १३ २४७

Page 247Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र १३ २४७
तब देवों ने अपने मुख में निवास करने वाले प्राण से निवेदन किया कि आप हमारे निमित्त उद्गीथ
पाठ करें। मुखस्थ प्राण ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उद्गीथ गान किया, जब असुरों ने यह
जाना कि देवता (प्राणरूप) उद्गाता के द्वारा हमारे ऊपर आक्रमण करेंगे, तब उन्होंने प्राण के पास जाकर
उसे भी पाप से विद्ध करने का प्रयत्न किया, परन्तु मिट्टी के ढेले के पत्थर से टकराकर चूर-चूर हो जाने
के समान वे असुरगण (मुखस्थ प्राण से टकराकर) विभिन्न प्रकार से छिन्न-भिन्न होकर ध्वस्त हो गये। इस
प्रकार देवगण विजयी और असुर-गण पराजित हुए। जो इस तथ्य को इस प्रकार जानता है वह शत्रु को
पराजित करके स्वयं विजयी होता है ॥ ७॥
ते होचु क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरितिसोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां
हि रसः ॥ ८ ॥
इसके पश्चात् उन देवताओं ने परस्पर चर्चा की कि जिसने हमें असक्त (स्व स्वरूप से युक्त) किया
अर्थात् हमारी रक्षा की और हमें देवत्व भाव को प्राप्त कराया, वे कहाँ स्थित हैं? किसी ने उत्तर दिया कि
वे (मुख्य प्राण) हमारे मुख में स्थित हैं, इसीलिए उनका नाम अयास्य हुआ। अङ्गों का रस होने के कारण
उन्हें आङ्गिरस भी कहते हैं ॥ ८॥
सा वा एषा देवता दुर्नाम दूरँ ह्यस्या मृत्युर्द्दूरँ ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥
यह (प्राण नाम वाले) देवता 'दूर' नाम से युक्त हैं, क्योंकि मृत्यु इससे दूर रहती है। जो इस
(मृत्यु के प्राण से दूर रहने के रहस्य) को इस तरह जानता है, वह मृत्यु से बचा रहता है ॥ ९ ॥
स वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहृत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयांचकार
तदासां पाप्मनो विन्यदधात्तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥
उस, इस प्राण रूप देवता ने इन्द्रियरूपी देवताओं के पाप रूपी मृत्यु को विनष्ट करके दिशाओं के
सीमान्त स्थल तक पहुँचा दिया और तिरस्कारपूर्वक उसने (प्राण ने) उन्हें (पापों को) वहाँ प्रतिष्ठित कर
दिया। अतः किसी को भी यह सोचकर कि मैं पापरूप मृत्यु के पाश में न फँसूँ, दिशाओं के सीमान्त प्रदेश
में नहीं जाना चाहिए (अर्थात् मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए) ॥ १० ॥
सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥
उस प्राण देवता ने इन्द्रियादि देवताओं के पाप रूप मृत्यु को विनष्ट कर उन्हें मृत्यु के उस पार पहुँचा
दिया अर्थात् मृत्यु रहित कर दिया (पाप का परित्याग कर मानव मोक्ष रूपी अमृतत्व को प्राप्त करता है) ॥
स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत्सोऽयमग्निः
परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥
उस प्राण देवता ने सर्वप्रथम वाग्देवता को मृत्यु के पार किया। वाग्देवता मृत्यु के पार होते ही (अमृतत्व
प्राप्त करके)अग्निरूप हो गये। अग्निरूप हुई वह वाणी ही मृत्यु का अतिक्रमण करके देदीप्यमान हो रही है ॥ १२ ॥
अथ ह प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत्सोऽयं वायुः परेण
मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥
तदुपरान्त उस प्राण देवता ने घ्राणशक्ति को मृत्यु के पार किया। तब (पापरूपी) मृत्यु से पार हुई
वह घ्राण शक्ति वायुरूप हो गई। अब वही वायु मृत्यु के पाश से मुक्त होकर प्रवाहित हो रही है ॥ १३ ॥

Page 248Permalink

२४८ बृहदारण्यकापानषद
अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स आदित्योऽभवत् सोऽसावादित्यः परेण
मृत्युमतिक्रान्तास्तपति ॥ १४॥
तत्पश्चात् वह प्राण चक्षु को मृत्यु के पार ले गया। मृत्यु बन्धन से विमुक्त हुआ चक्षु आदित्य रूप
हो गया। अब वही चक्षु पाप (मृत्यु) बन्धन से मुक्त होकर आदित्य रूप से तपता है-प्रकाशित होता है॥
अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशोऽभवंस्ता इमा दिशः परेण
मृत्युमतिक्रान्ताः॥ १५॥
इसके बाद प्राण ने श्रोत्र को मृत्यु से पार किया। मृत्यु से मुक्त होकर श्रोत्र दिशारूप हो गये। इस
प्रकार दिशारूप होकर श्रोत्र मृत्यु बन्धन से छूट गये॥ १५॥
अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमा अभवत्सोऽसौ परेण
मृत्युमतिक्रान्तो भात्येवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद ॥ १६ ॥
तब उस प्राण ने मन को मृत्यु से पार किया। मृत्यु से पार होकर मन चन्द्रमा हो गया। पाप अथवा
मृत्यु से मुक्त होकर वह मन ही चन्द्रमा होकर प्रकाशित हो रहा है। इस रहस्यात्मक तथ्य को जानने वाले
(तत्त्वज्ञानी) के प्राण उसे मृत्यु से मुक्त कर देता है॥ १६॥
अथात्मनेऽन्नाद्यमागायद्यद्धि किंचान्न मद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७॥
तदुपरान्त प्राण ने अपने निमित्त अन्न का गायन (गुणगान) किया, क्योंकि जो भी अन्न ग्रहण किया
जाता है, वह प्राण द्वारा ही भक्षण किया जाता है और अन्न से ही प्राण प्रतिष्ठित होता है॥ १७॥
ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा इदं सर्वं यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति
ते वै माभिसंविशतेति तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त तस्माद्यदनेनान्नमत्ति
तेनैतास्तृप्यन्त्येवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादो-
ऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रतिबुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य
एवैतमनुभवति यो वै तमनु भार्यान् बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८॥
इसके पश्चात् देवों ने प्राण से कहा कि आपने सम्पूर्ण अन्न का उद्गान अपने निमित्त ही किया है,
अतः अपने उपभोग से अवशिष्ट अन्न में हमें भी भागीदार बनाएँ। प्राण ने कहा कि आप लोग अपना भाग
ग्रहण करने हेतु चारों ओर से हममें प्रवेश करें। 'ऐसा ही करेंगे'- यह कहकर वे समस्त (इन्द्रियरूप)
देवगण प्राण में प्रवेश कर गये। इस प्रकार प्राण द्वारा अन्न (भोज्य-पदार्थ) ग्रहण किये जाने पर इन्द्रियरूप
देवता भी तृप्ति अनुभव करते हैं। इस प्रकार से जानने वाले का ज्ञानीजन आश्रय ग्रहण करते हैं। वह
स्वजनों का पोषक, उनमें श्रेष्ठ और अग्रगामी होता है। ज्ञानीजनों में से भी; जो इस प्रकार के ज्ञाता के
विपरीत होना चाहते हैं, वे अपने आश्रित जनो का भरण-पोषण नहीं कर पाते और जो उनके अनुकूल होते
हैं, वे अपने स्वजनों-आश्रितों का भरण-पोषण करने में सक्षम होते हैं॥ १८॥
सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां
रसस्तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष हि वा अङ्गानां रसः॥
उस प्राण तत्त्व को अयास्य तथा आङ्गिरस कहा गया है, क्योंकि वह मुख में स्थित अङ्गों का
(रस) सार होता है। निश्चित ही प्राण अङ्गों का रस है, क्योंकि जब शरीर के किसी भी अङ्ग से प्राण
निकल जाता है, तो वह अङ्ग सूख जाता है॥ १९॥

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र २५ २४९

Page 249Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र २५ २४९
एष उ एव बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥
प्राण को ही बृहस्पति कहा गया है, क्योंकि वाणी बृहती है और उसके पति बृहस्पति हैं ॥ २० ॥
एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग् वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥
यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाणी ही ब्रह्म है और प्राण वाणी का स्वामी है, इसलिए प्राण ही ब्रह्मणस्पति है ॥
एष उ एव साम वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वं यद्वेव समः प्लुषिणा
समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते
साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवमेतत्साम वेद ॥ २२ ॥
यही (प्राण) साम है। यह वाक् ही 'सा' और यह प्राण ही 'अम' है। 'सा' और 'अम' के संयोग
से ही 'साम' बनता है। साम का सामत्व भी यही है, क्योंकि यह (प्राण) मक्खी जैसा है, मच्छर जैसा
है, हाथी जैसा है और तीनों लोकों के तुल्य है। इसी कारण वह साम है। जो इस प्रकार साम के विषय में
जानता है, वह साम के सायुज्यत्व और सालोक्यत्व को प्राप्त करता है ॥ २२ ॥
एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीदँ सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्चगीथा
चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥
इसी प्राण को उद्गीथ कहते हैं। प्राण के द्वारा ही सब कुछ धारण किया हुआ होने से इसे 'उत्'
कहा गया है। वाक् अर्थात् वाणी ही गीथा (गीत) है, प्राण ही उत् है और गीथा भी, इसीलिए इसे
'उद्गीथ' कहते हैं ॥ २३ ॥
तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयता-
द्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोद्गायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोद्गायदिति ॥ २४ ॥
(प्राण के विषय में) एक प्रसिद्ध आख्यायिका यह भी है कि चैकितानेय ब्रह्मदत्त ने सोमपान करते
समय यह कहा कि यदि मैंने मुख में निवास करने वाले अङ्गों के रस को प्राणों से अलग जानकर उद्गान
(उद्गीथगान) किया हो, तो सोमदेव मेरा सिर गिरा दें (अर्थात् मेरा अपमान कर दें अथवा मेरा सोमपान
व्यर्थ कर दें)। इससे स्पष्ट होता है कि उसने प्राण और वाक् द्वारा ही उद्गान किया था ॥ २४ ॥
[ मुख से - वाणी से जो व्यक्त है, वह यदि प्राणों के स्पन्दन से युक्त नहीं तो व्यर्थ है- ढोंग है। केवल रटकर
बोले गये शब्दों में अनुभूतिजन्य प्राणों का संचार न होने से वे निस्तेज-निष्प्रभावी होते हैं। प्राण एवं वाक् का
संयोग जीवन साधना में अनिवार्य है।]
तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादार्त्विज्यं
करिष्यन्वाचि स्वरमिच्छेत तया वाचा स्वरसंपन्नयार्त्विज्यं कुर्यात्तस्माद्यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त
एवाथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥
जो व्यक्ति इस साम के 'स्वर' से यथार्थ रूप से विज्ञ है, वह निश्चित ही धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न होता
है। स्वर (कण्ठ की मधुरता) ही उसका धन है। अतः ऋत्विक्-कर्म सम्पादित करने वाले को स्वर में
माधुर्य का समावेश करना चाहिए। उत्कृष्ट स्वर युक्त वाणी में ऋत्विक्-कर्म सम्पादित करना चाहिए;
क्योंकि यज्ञ में मधुर स्वर युक्त उद्गाता का दर्शन करने की सभी इच्छा करते हैं। जो व्यक्ति साम के धन
को जानता है, वह उस धन (मधुर स्वर) को अवश्य ही प्राप्त करता है ॥ २५ ॥

Page 250Permalink

२५० बृहदारण्यकोपनिषद्
तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णं तस्य वै स्वर एव सुवर्णं
भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥
जो इस साम के सुवर्ण (मधुर-स्वर या धन) को जानता है, उसे सुवर्ण (मधुर स्वररूपी धन) मिलता
है; क्योंकि मधुर स्वर ही साम का सुवर्ण है। जो साम के सुवर्ण को इस प्रकार जानता है, वह निश्चित ही
सुवर्ण प्राप्त करता है ॥ २६ ॥
तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि
खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः ॥ २७॥
जो व्यक्ति साम की प्रतिष्ठा के विषय में जानते हैं, वे प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। व्यक्ति की वाणी ही प्रतिष्ठा
स्वरूप है (उसी से प्रतिष्ठा मिलती है)। प्राण ही निश्चित रूप से वाणी में प्रतिष्ठित होकर गाया जाता है। कुछ
विद्वानों का कथन है कि वह प्राण अन्न में प्रतिष्ठित होकर (अन्न की शुद्धि के साथ) गाया जाता है ॥ २७ ॥
अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र
प्रस्तुयात्तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमयेति स
यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह
तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह
मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्ति। अथ यानीतराणि स्तोत्राणि
तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत्तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं०स एष एवंविदुद्गातात्मने
वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया
आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २८ ॥
अब आगे पवमान-स्तोत्रों का पाठ करने का विधान वर्णित किया जाता है- प्रस्तोता (प्रस्तोता नामक
ऋत्विज्) यज्ञकर्म में सामगान प्रारम्भ करने से पहले इन मंत्रों का जप करे- 'असतो मा सद्गमय,'
'तमसो मा ज्योतिर्गमय', 'मृत्योर्माऽमृतं गमय' अर्थात् हमें असत् से सत् की ओर ले चलो, हमें
अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो, हमें मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। प्रस्तोता जब यह कहता है,
मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो, तब उसका अभिप्राय होता है- मृत्यु ही असत् और अमृत ही सत् है
और मुझे मृत्यु से बचाकर अमर कर दो। जब वह यह कहता है कि मुझे तमस् से प्रकाशोन्मुख करो, तब
उसका अभिप्राय होता है कि मृत्यु ही अंधेरा और अमृत ही प्रकाश है और मुझे मृत्यु से अमरत्व की ओर
ले चलो। जब वह (प्रस्तोता) यह कहता है कि मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो, तो इस कथन में
तो कुछ छुपी बात है ही नहीं अर्थात् कथन स्पष्ट ही है। अन्य स्तोत्रों में उद्गाता को अपने लिए अन्न
(पोषक तत्त्वों) का उद्गान करना चाहिए। इन स्तोत्रों के द्वारा यजमान इच्छित भोगों की याचना करे। इस
तथ्य को जानने वाला उद्गाता अपने या यजमान के निमित्त जिस वस्तु या भोग की कामना करता है, उसी
का उद्गान करता है। यह प्राण दर्शन समस्त लोकों को प्राप्त करने का साधन है। जो ज्ञानी इस साम को इस
प्रकार से जानता है, उसे कुछ भी प्राप्त करने के लिए निराश होने की आवश्यकता नहीं है ॥ २८ ॥

अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र ३ २५१

Page 251Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र ३ २५१
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् सोऽहमस्मीत्यग्रे
व्याहरत्ततोऽहंनामाभवत्तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येवाग्र उक्त्वाथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य
भवति स यत्पूर्वो ऽस्मात्सर्वस्मात्सर्वान्पाप्मन औषत्तस्मात्पुरुष ओषति ह वै स तं
योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १॥
पुरुष के रूप में यह आत्मा (पहले एकाकी) ही था। चतुर्दिक् दृष्टिपात करने पर उसने अपने से भिन्न
कुछ भी नहीं पाया, तब उसने कहा 'अहमस्मि' अर्थात् मैं हूँ। इसीलिए उसे अहम् संज्ञक कहा जाता है।
इसी कारण अभी भी बुलाए जाने पर कोई व्यक्ति पहले 'अयमहम्' अर्थात् 'यह मैं हूँ' कहने के बाद ही
अपना अन्य नाम बतलाता है। उस (प्रजापति) ने (समस्त पापों को) दग्ध कर दिया था, इसीलिए वह
पुरुष कहलाया। जो इस प्रकार इस पुरुष (आत्मा) को जानता है, वह उस (आत्मा) से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध
करने का प्रयास करने वाले को भस्मीभूत कर देता है ॥ १ ॥
[पुर् =प्रथमे, उष=दाहे, प्रथम-पहले ही विकारों-पापों का दाह कर देने वाला होने से 'पुरुष' कहलाता है।
पुरुष कहलाने वाले में विकारों को दग्ध कर देने का पुरुषोचित पौरुष होना चाहिए।]
सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति स हायमीक्षांचक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति
तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्धयभेष्यद्द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ २ ॥
तदुपरान्त वह (पुरुष) भयभीत हो गया। इसी कारण अकेला पुरुष भयभीत होता है, तब उस पुरुष
ने चिन्तन किया कि जब मेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है, तब मैं किससे और क्यों भय करूँ? यह चिन्तन
करते ही उसका भय दूर हो गया; क्योंकि भय तो दूसरों से ही होता है, अकेला होने पर तो उसके भय का
कोई कारण नहीं है ॥ २ ॥
स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् स हैतावानास यथा स्त्रीपुमांसौ
संपरिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव
स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव तां समभवत्ततो मनुष्या
अजायन्त ॥ ३ ॥
(एकाकी होने के कारण) वह रमा नहीं अर्थात् उसका मन नहीं लगा। इसी कारण एकाकी
पुरुष का मन अभी भी रमता नहीं। तब उसने किसी अन्य की आकांक्षा की। तदुपरान्त स्त्री और
पुरुष के सम्मिलित होने पर जितना आकार होता है, वह पुरुष उतने ही आकार का बन गया और
उसने अपने शरीर को स्त्री और पुरुष इन दो भागों में विभक्त कर दिया। जिससे दोनों भाग परस्पर
पति-पत्नी हुए । ऋषि याज्ञवल्क्य का कथन है कि - इसी कारण यह काया अर्द्धबृगल (द्विदल अन्न
के एक दल) की भाँति है। अस्तु, यह आकाश (पुरुष का रिक्त भाग) स्त्रीत्व से पूर्ण होता है।
पुरुष और स्त्री के सम्मिलन से ही मनुष्यों की उत्पत्ति हुई है ॥ ३ ॥

Page 252Permalink

२५२ बृहदारण्यकोपनिषद्
[ शिव के अर्धनारी नटेश्वर की धारणा यहाँ स्पष्ट की गई है। प्रथम चरण में पुरुष एवं प्रकृति के प्रकटीकरण
की घटना गर्भ से शिशु जन्म की तरह घटित नहीं हुई। दाल या सीप पकने पर उसके दो दल खुल जाने की तरह
यह सृष्टि प्रक्रिया सम्पन्न हुई। ब्रह्म से पुरुष और प्रकृति, महादेव से शिव और शक्ति, प्रजापति से ब्रह्मा और सावित्री
का प्राकट्य इसी प्रकार हुआ।]
सो हेयमीक्षांचक्रे कथं नु मात्मान एव जनयित्वा संभवति हन्त तिरोऽसानीति सा
गौरभवदृ षभ इतरस्ताग्ं समेवाभवत्ततो गावोऽजायन्त वडवेतराभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा
गर्दभ इतरस्ताग् समेवाभवत्तत एकशफमजायताजेतराभवदस्त इतरोऽविरितरा मेष
इतरस्ताग्ंसमेवाभवत्ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किंच मिथुनमापिपीलि-
काभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥ ४॥
उस स्त्री ने सोचा कि अपने ही शरीर से मुझे प्रकट करके यह पुरुष मुझसे सम्पर्क क्यों करता है ?
अच्छा हो मैं इससे बचने के लिए छिप जाऊँ, अस्तु उसने गौ का रूप धारण कर लिया, तब वह पुरुष वृषभ
बन गया, जिससे गौओं और बैलों की उत्पत्ति हुई, तदुपरान्त उसने घोड़ी का शरीर धारण कर लिया, तब
पुरुष अश्व हो गया, फिर वह गर्दभी बन गई और पुरुष गर्दभ बन गया, इससे एक खुर वाले पशुओं का
प्रादुर्भाव हुआ। तत्पश्चात् वह बकरी बन गई और पुरुष बकरा बन गया, जब वह भेड़ी बन गई, तो वह भेड़ा
बन गया, इस प्रकार बकरियों और भेड़ों की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार चींटी तक सभी जोड़े सहित मिथुनों
की रचना सम्पन्न हुई ॥ ४॥
[ ऋषि यहाँ बहुत स्पष्टता से यह तथ्य प्रकट करते हैं कि विकासवाद के अनुसार अमीबा से धीरे-धीरे
विभिन्न प्रजाति के प्राणियों के विकास की कल्पना उचित नहीं है। प्रथम- चरण में आवश्यकतानुसार जिस-जिस
रूप में प्रकृति अपने संकल्प से ढलती गयी, उसी अनुरूप उसका पूरक पुरुष पक्ष भी संकल्प शक्ति से ही बना,
उसके बाद मैथुनी सृष्टि का क्रम प्रारम्भ हुआ।]
सोऽवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यहग्ंहीदग्ंसर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत्सृष्ट्याग्ं हास्यैतस्यां
भवति य एवं वेद ॥ ५॥
यह रचना करने के बाद प्रजापति रूप उस पुरुष की ज्ञान हुआ कि मैंने सबकी रचना की है, इसलिए
मैं ही सृष्टि हूँ। इस प्रकार वह 'सृष्टि' नाम से युक्त हुआ। सृष्टि की इस प्रकार जानने वाला व्यक्ति उसकी
सृष्टि में प्रसिद्धि प्राप्त करता है ॥ ५ ॥
अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत तस्मादेतदुभयमलो-
मकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतस्तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देव-
मेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवा अथ यत्किंचेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत
तदु सोम एतावद्वा इदग्ंसर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमनिरन्नादः सैषा
ब्रह्मणोऽतिसृष्टिर्यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृ-
ष्टिरतिसृष्ट्याग्ं हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥

अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र ८ २५३

Page 253Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र ८ २५३
तदुपरान्त उस पुरुष (प्रजापति) ने मन्थन किया। उसने मुखरूपी योनि (उत्पत्ति स्थल) और दोनों
हाथों से मन्थन करके अग्नि को प्रकट किया। हाथ और मुख दोनों में ही अन्दर की ओर लोम नहीं होते
और योनि में भी अन्दर लोम नहीं होते। अस्तु, जो (याज्ञिक जन) एक-एक देवता (अग्नि, इन्द्र आदि) के
लिए यजन करने को कहते हैं, वे इस तथ्य को नहीं जानते कि सब देवता एक ही परमेश्वर में समाहित
हैं और उस एक (परमेश्वर) ने ही सृष्टि की रचना की है। जो भी द्रव पदार्थ है, वह वीर्य से उत्पन्न सोम
है। निश्चित ही सोम ही अन्न, अग्नि और अन्नाद का उपभोग करने वाला है। परब्रह्म की यह महान् रचना
है। यह ब्रह्मा की महान् सृष्टि (अतिसृष्टि) ही है कि उसने अमरत्व प्राप्त देवताओं का सृजन किया - स्वयं
मर्त्य होकर अमृत्तों का निर्माण किया, इसलिए इसे अतिसृष्टि कहा जाता है। जो इस सृष्टि को इस प्रकार
जानता है, वह इस (परब्रह्म) की अतिसृष्टि में (प्रसिद्धि को प्राप्त) हो जाता है॥ ६ ॥
तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियेतेऽसौनामायमिदंऽरूप इति
तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियेतेऽसौनामायमिदंऽरूप इति स एष इह प्रविष्ट
आ नखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्याद्विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाये तं न पश्यन्ति ।
अकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक्पश्यंऽश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो
मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदाकृत्स्नो ह्येषोऽत एकैकेन
भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मानेन
ह्येतत्सर्वं वेद । यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिं श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥ ७॥
पहले (सृष्टि के आरम्भ में) यह जगत् नाम रहित था। तत्पश्चात् वह नाम और रूप से युक्त होकर
प्रकट हुआ। इसीलिए कोई वस्तु अभी भी 'इस नाम और रूप से युक्त है' इस प्रकार जानी जाती है। वह
(आत्मा) इस शरीर में नखों के अग्रभाग तक इस प्रकार प्रविष्ट है, जिस प्रकार उस्तरे का फल काष्ठ में
प्रविष्ट रहता है और अग्नि अपने आश्रय वेदी अथवा काष्ठ में स्थित रहती है, किन्तु उसे प्रत्यक्ष देख सकना
किसी के लिए सम्भव नहीं है। वह आत्मा अपूर्ण है। प्राणन प्रक्रिया (श्वास-प्रश्वास) के कारण उसे प्राण,
बोलने के कारण वाणी, देखने के कारण चक्षु, सुनने के कारण श्रोत्र और मनन करने के कारण मन कहते
हैं। ये सभी संज्ञाएँ उसे उसके भिन्न-भिन्न कर्मानुसार प्रदान की गई है। अस्तु, जो व्यक्ति इनमें से पृथक्-
पृथक् की उपासना करता है, वह (इसके वास्तविक स्वरूप को) नहीं जानता, क्योंकि सभी गुण उस एक
में ही एकत्र हो जाते हैं। यह आत्मा सबके लिए प्राप्त करने योग्य है; क्योंकि इसे प्राप्त कर लेने अथवा जान
लेने से सम्पूर्ण विश्व को जाना जा सकता है। जिस प्रकार पद-चिह्नों द्वारा खोये हुए (पशु आदि) को ढूँढ़
लिया जाता है (उसी प्रकार व्यक्ति आत्मा को जानकर उसके सूत्रों द्वारा सम्पूर्ण संसार को जान लेता है)।
इस तथ्य को इस प्रकार जानने वाला कीर्ति लाभ प्राप्त करता है ॥ ७ ॥
तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा स योऽन्यमात्मनः
प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियंऽ रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य
आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति ॥ ८ ॥

Page 254Permalink

२५४ बृहदारण्यकोपनिषद्
इस प्रकार यह (आत्मा) पुत्र से भी अधिक प्रिय, सम्पदा से भी अधिक प्रिय और अन्य सभी से भी
अधिक प्रिय है । शरीर के अन्दर स्थित आत्मा से भिन्न वस्तु को यदि कोई अधिक प्रिय समझता है, तो वह
मानों अपने अन्तरात्मा को ही खो देता है अर्थात् आत्मा को विस्मृत कर देता है। जो साधक आत्म तत्त्व को
सर्वाधिक प्रिय मानकर उसकी उपासना करता है, वह कभी मरता नहीं- अमर हो जाता है ॥ ८ ॥
तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मा-
त्सर्वमभवदिति ॥ ९ ॥
जिज्ञासु ब्राह्मणों द्वारा कहा गया है कि ब्रह्मविद्या के माध्यम से 'हम सब कुछ हो जाएँगे' अर्थात् हमें
सब कुछ प्राप्त हो जायेगा। इस तथ्य का क्या आधार है ? क्या अभी तक किसी ने उस ब्रह्मविद्या को भली-
भाँति जान लिया है, जिसके द्वारा उसे सब कुछ प्राप्त हो गया है ? ॥ ९ ॥
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत् सर्वमभवत् तद्यो
यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः
प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाऽहं ब्रह्मास्मीति स इदग्ंसर्वं
भवति तस्य ह न देवाश्चनाभूत्या ईशते आत्मा ह्येषाग्ं स भवत्यथ योऽन्यां
देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवग्ं स देवानां यथा ह वै
बहवः पशवो मनुष्यं भुंज्युरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमानेऽप्रियं
भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ १० ॥
सर्वप्रथम केवल ब्रह्म ही था। यह जानकर कि 'मैं ब्रह्म हूँ' वह सर्वरूप हो गया। देवताओं में से
जिस-जिस ने उस ब्रह्म को जाना, वे सब ब्रह्मरूप हो गये। इसी तरह मानवों और ऋषियों में से भी जिस-
जिस ने उसका ज्ञान प्राप्त किया, वे सब भी ब्रह्मस्वरूप हो गये। ऋषि वामदेव ने कहा- इसे (ब्रह्म को)
जानकर मैं मनु और सूर्य हो गया। इस समय भी जो यह मानता है कि 'मैं ब्रह्म हूँ' वह सर्वरूप हो जाता
है। उसको पराजित करने में देवता भी समर्थ नहीं होते; क्योंकि वह उनका ही आत्मस्वरूप हो जाता है।
जो अपने और दूसरे में भेद देखता है, वह पशु के समान हो जाता है। जिस प्रकार विभिन्न पशु मनुष्यों को
पोषित करते हैं, उसी प्रकार (देवों के लिए पशु तुल्य) मनुष्य भी अनेक देवताओं को पोषित करते हैं।
एक पशु का ही अपहरण हो जाए, तो बुरा लगता है। यदि अनेक पशुओं का अपहरण हो, तब तो और भी
बुरा लगेगा। इसी कारण देवगण यह नहीं चाहते कि मनुष्य सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर सकें ॥ १० ॥
[ ऋषि का यह कथन बड़ा रहस्यात्मक है। देवता मनुष्य देह में विभिन्न इन्द्रियों, अंग-अवयवों के अधिष्ठाता
बनकर स्थित हैं। आत्म चेतना जब परमात्म तत्त्व की ओर उन्मुख होती है, तो इन्द्रियों की भोगेच्छाओं से उसका
लगाव हटने लगता है तथा उनमें स्थित देवता, जीवात्मा (आत्मचेतना) का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं,
यही प्रक्रिया उसके ब्रह्मज्ञान में प्रविष्ट होने में बाधक बनती है।]
ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकग्ं सन्न व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत क्षत्रं
यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति तस्मात्

Page 255Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण ४ मन्त्र १४ २५५
क्षत्रात्परं नास्ति तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा
क्षत्रस्य योनैर्यद्ब्रह्म तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवान्तत उपनिश्रयति स्वां योनिं
य उ एनꣳ हिनस्ति स्वाꣳ स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेयाꣳसꣳ हिꣳ सित्वा ॥
सबसे पहले ब्रह्म (ब्राह्मण वर्ण) ही था; किन्तु एकाकी होने के कारण वह अपनी वृद्धि करने में
समर्थ न हो सका। अस्तु, उसने क्षत्रिय वर्ण का सृजन किया। देवों में वरुण, इन्द्र, सोम, रुद्र, पर्जन्य, मृत्यु,
यम और ईशान ये सभी क्षत्रिय ही हुए, इसीलिए क्षत्रिय सर्वोत्कृष्ट हैं। इसी कारण राजसूय यज्ञों में ब्राह्मण
भी क्षत्रिय से नीचे आसीन होकर उसकी (क्षत्रिय की) उपासना (सम्मान) करता है। यह ब्रह्म (ब्राह्मण)
क्षत्रिय की ही योनि है। अतः यद्यपि (राजसूय यज्ञ के क्रम में) क्षत्रिय उत्कृष्ट है, तो भी यज्ञ के पश्चात् वह
ब्राह्मण का ही आश्रय ग्रहण करता है। जो क्षत्रिय ब्राह्मण को हिंसित करता है, वह अपनी ही योनि को
विनष्ट करता है। वह अपने श्रेष्ठ आधार की हिंसा करने वाला व्यक्ति 'पापीयान्' (बड़ा पापी या पाप कर्म
का आधार) बन जाता है ॥ ११ ॥
[ प्रारम्भ में सभी ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण जैसा जीवन जीते थे। समाज बढ़ा तो रक्षा करने वालों की आवश्यकता
पड़ी। रक्षक वर्ग ( क्षत्रिय ) का विकास उन्हीं ब्रह्मनिष्ठों के बीच से किया गया। रक्षण कार्य के सन्दर्भ में उन्हें ही
सर्वश्रेष्ठ माना गया। ]
स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो
रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ १२ ॥
वह ब्रह्म (ब्राह्मण) क्षत्रिय का सृजन करने के बाद भी अपनी वृद्धि में सक्षम नहीं हुआ, तब उसने
वैश्य वर्ण का सृजन किया। वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेवा और मरुत् ये समस्त देवगण वैश्य कहलाते हैं ॥
[ समाज का और विकास हुआ, तो पुनः उभरी आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन, वितरणपरक वैश्य
वर्ण को उसी समाज में से विकसित किया गया।]
स नैव व्यभवत्स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमियं वै पूषेयꣳ हीदꣳ सर्वं पुष्यति यदिदं किंच ॥
इसके अनन्तर (अर्थात् क्षत्रिय और वैश्य की रचना के बाद) भी वह ब्रह्म प्रवृद्ध न हो सका, तब
उसने शूद्र वर्ण की रचना की । पूषा देवता शूद्र वर्ण के हैं। यह पृथ्वी माता भी पूषा देवता ही है, क्योंकि
यह समस्त प्राणियों का पोषण करती है ॥ १३ ॥
स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत्क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो
अबलीयान् बलीयाꣳ समाशꣳसते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात् सत्यं
वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तꣳ सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ १४ ॥
इतने (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों का सृजन करने) पर भी वह (ब्रह्म) प्रवृद्ध (सृष्टि कर्म
का विस्तार) नहीं हुआ, तब उसने श्रेय स्वरूप धर्म की उत्पत्ति की। धर्म ही क्षत्रियों (शासकों) का भी
क्षत्र (शासक-रक्षक है); अस्तु धर्म से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। राजा की तरह बलहीन व्यक्ति भी धर्म की
शक्ति से अधिक बल सम्पन्नों पर नियन्त्रण करने में सक्षम होता है। धर्म ही सत्य है। इसी कारण सत्य वचन

Page 256Permalink

२५६ बृहदारण्यकोपनिषद्

बोलने वालों को धर्मयुक्त वचन बोलने वाला और धर्म वचन बोलने वालों को सत्यवादी कहते हैं,
अस्तु, इन दोनों में कोई भेद नहीं है ॥ १४॥
तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण
क्षत्रियो वैश्येन वैश्यः शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे
मनुष्येष्वेताभ्याग्ँहि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् । अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति
स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदिह वा अप्यनेवंविद्
महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव
लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते ॥ १५ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं। इन वर्णों का रचयिता ब्रह्म देवताओं में अग्नि रूप से
श्रेष्ठ (ब्राह्मण) हुआ। वह (ब्रह्म) मनुष्यों में ब्राह्मण रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय रूप से क्षत्रिय, वैश्य रूप से
वैश्य और शूद्र रूप से शूद्र रूप में प्रकट हुआ। इसी कारण अग्निहोत्रादि धर्मकृत्य करके मनुष्य देवों से
कर्मफल की इच्छा करता है, क्योंकि ब्रह्म इन्हीं दो रूपों से अभिव्यक्त हुआ था। स्वलोक अथवा अपने
आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, अन्यथा अपने लोक और परलोक का सुधार असम्भव है। ऐसे व्यक्ति
का पुण्य भी व्यर्थ ही हो जाता है, जिसने आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया। आत्मा के उपासक के पुण्य कृत्य
कभी क्षीण नहीं होते, वरन् उसकी समस्त आकांक्षाएँ पूर्ण होती हैं॥ १५॥
अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ
यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ
यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति
तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयाग्ंस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा
ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवग्ँ हवैंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं
मीमाग्ँसितम् ॥ १६ ॥
यह आत्मा समस्त जीवों का आश्रय प्रदाता है, अर्थात् उनका लोक है। यह (आत्मा) हवन-यज्ञ
करने से देवताओं का लोक (आश्रयदाता) होता है। स्वाध्याय (वेदों का पठन-पाठन) करने से ऋषियों
का, सन्तानोत्पादन (की इच्छा) करने तथा पिण्डदान करने से पितरों का, मनुष्यों को आश्रय स्थल और
भोज्य पदार्थ देने से मनुष्यों का, पशुओं को तृण-जल आदि देने से पशुओं का तथा गृह स्थित कुत्ते, बिल्ली,
पक्षी एवं चींटी आदि जीवों का आश्रय प्रदाता होता है, उससे यह उनका लोक होता है। जिस प्रकार लोक
में (सभी) अपने शरीर की सुरक्षा चाहते हैं, उसी प्रकार ऐसा जानने वाले की सभी जीव सुरक्षा चाहते हैं।
इस प्रकार उस कर्म की अनिवार्यता [पंच महायज्ञ प्रकरण में] ज्ञात है और इसकी मीमांसा की गई है॥
आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे
स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छग्ँश्चनातो भूयो विन्देत्तस्मादप्येतह्यैकाकी
कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं

Page 257Permalink

न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्यो कृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा
चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवग्ं श्रोत्रेण हि तच्छृणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना
हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदग्ं सर्वं
यदिदं किंच तदिदग्ं सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥ १७॥
सृष्टि के प्रारम्भ में यह आत्मा बिल्कुल अकेला था, उसने स्त्री (पत्नी) की कामना की, फिर प्रजा
(सन्तति) प्राप्ति की कामना की। इसके पश्चात् इच्छा की कि मेरे पास धन हो, जिससे मैं कर्म कर सकूँ।
मानवों की प्रायः इसी स्तर की कामनाएँ होती हैं और वे इससे अधिक प्राप्त भी नहीं कर पाते। इन
कामनाओं की पूर्ति के अभाव में वे अपने को अपूर्ण ही मानते रहते हैं। यदि वे चाहें, तो इस अपूर्णता की
पूर्ति इस दृष्टिकोण द्वारा कर सकते हैं- अपने मन को आत्मा मानें, वाणी को स्त्री, प्राण को सन्तति, चक्षु
को मानवी सम्पदा और श्रोत्रेन्द्रिय को दिव्य सम्पदा मानें। इस प्रकार साधन सम्पन्न पुरुष का शरीर ही कर्म
है; क्योंकि शरीर से ही कर्म किया जाता है। इसलिए यह यज्ञ पाङ्क्त (पाँच-आत्मा, वाणी, प्राण, चक्षु
एवं श्रोत्र से सम्पन्न होने वाला ) है। समस्त जीवों में ये पाँचों विद्यमान हैं। अतः पशु पाङ्क्त है, पुरुष पांक्त
है तथा अन्य भी जो कुछ है सब पाङ्क्त है, अर्थात् यह सृष्टि ही पञ्च तत्त्वात्मक यज्ञ स्वरूप है। इस ज्ञान
को इस प्रकार जानने वाले को इन सबकी प्राप्ति हो जाती है ॥ १७॥

॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता । एकमस्य साधारणं द्वे देवानभाजयत् ।
त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं प्रायच्छत्तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न
कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वैतामक्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन स
देवानपि यच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति श्लोकाः ॥ १॥
परमपिता ने ज्ञान और तप के प्रभाव से सात प्रकार के अन्नों का सृजन किया। उन अन्नों में एक प्रकार
का अन्न सभी के लिए, दो का देवताओं के निमित्त, तीन का अपने निमित्त और एक का पशुओं के निमित्त
वितरण कर दिया। पशुओं को प्रदान किये गये उस अन्न में प्राणन क्रिया करने वाले और न करने वाले
(श्वास लेने और न लेने वाले) सभी प्रतिष्ठित हैं। इन अन्नों का सदैव भक्षण किया जाता है, फिर भी ये
क्षीण नहीं होते, इसका क्या कारण है? इस प्रकार सभी को सभी का अन्न भाग देने के अक्षय भाव को जो
जानता है, वह अन्नोपभोग करते हुए कभी क्षीण नहीं होता अर्थात् अमृतत्व को प्राप्त होता है ॥ १॥
यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पितेति मेधया हि तपसाऽजनयत्पितैकमस्य
साधारणमितीदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते
मिश्रग्ं ह्येतद्द्वे देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं च तस्माद्देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वत्यथो
आहुर्दर्शपूर्णमासाविति। तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात्पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः पयो

Page 258Permalink

२५८ बृहदारण्यकोपनिषद्
होवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति तस्मात् कुमारं जातं घृतं वै वाग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं
वानुधापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरतृणाद इति। तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च
नेति पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा
जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपज-
यत्येवंविद्वान्सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति । कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति
पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते यो वै -तामक्षितिं वेदेति पुरुषो वा अक्षितिः
स हीदमन्नं धिया धिया जनयते । कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति
मुखं प्रतीकं मुखेनेत्येतत्स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा ॥ २ ॥
पिता-प्रजापति ने अपने तप और ज्ञान से जिन सात अन्नों को उत्पन्न किया, उनमें से एक अन्न ( धरती
से उत्पन्न खाद्य) सामान्य है। उसमें सभी की साझेदारी है, अतः सभी को समान रूप से उसका उपभोग
करना चाहिए। सबके लिए निर्धारित इस अन्न का अकेले ही उपभोग करने वाला कभी पाप से विमुक्त नहीं
होता। पूर्व वर्णित जिन दो अन्नों को देवताओं के निमित्त बताया गया, उनमें एक हुत अर्थात् (हवन द्वारा
दिया जाने वाला) और दूसरा प्रहुत (प्रत्यक्ष में अर्पित किया जाने वाला) है। कुछ विद्वान् इसे दर्श और
पूर्णमास भी कहते हैं। (क्योंकि यज्ञ देवों के लिए निर्धारित है, इसलिए) यज्ञों को काम्य (लौकिक
कामनाओं की पूर्ति के लिए) न करें। पशुओं के निमित्त दिया गया अन्न, दूध (पय-पान करने योग्य) है।
मनुष्य और पशु दोनों ही उस अन्न का सेवन करते हैं। शीघ्र उत्पन्न हुए शिशु को घृत चटाते हैं अथवा
स्तनपान कराते हैं। बछड़ा भी जन्म लेने के तुरन्त बाद घास ग्रहण नहीं करता, वरन् दुग्ध पान ही करता है।
श्वास लेने और न लेने वाले सभी जीव दूध में ही प्रतिष्ठित हैं। अस्तु, जिनका यह कथन है कि एक वर्ष तक
(दूध से) निरन्तर अग्निहोत्र करने वाला मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है (उनका यह कथन समीचीन
नहीं); वरन् यह मानना चाहिए कि जिस दिन वह यज्ञ सम्पन्न करता है, उसी दिन मृत्यु पर विजय प्राप्त
कर लेता है। ऐसा जानने वाला देवताओं को उनके सेवन योग्य अन्न प्रदान करता है। बारम्बार भक्षित होने
पर भी वह अन्न क्षीण क्यों नहीं होता ? वह इसलिए क्षीण नहीं होता; क्योंकि वह पुरुष क्षयरहित है और
पुनः-पुनः अन्नोत्पादन करने में समर्थ है। वह अविनाशी पुरुष कर्म और बुद्धि के संयोग से अन्नोत्पादन
करता है। यदि वह पुरुष कर्म और बुद्धि से हीन हो जाए, तो अन्न और अन्नोत्पादन भी समाप्तप्राय हो
जाए। उस अन्न का सेवन मुख के माध्यम से किया जाता है, इसी कारण देवताओं को भी वह प्राप्त हो जाता
है और अमृतत्व प्रदायक होता है। यह इसकी (फलश्रुति) प्रशंसा है ॥ २ ॥
['श्वास लेने वाले और न लेने वाले सभी 'पय' पर निर्भर हैं', इस कथन में 'पय' का अर्थ स्थूल दूध नहीं
लिया जा सकता, यहाँ तो 'पयः पृथिव्यां पयऽओषधीषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः'- आदि कहकर जिस कारण
रूप पान करने योग्य पोषक प्रवाह की ओर संकेत किया जाता है, उसे ही 'पय' मानना चाहिए। इसी प्रकार प्रकृति
के पाश में बँधे हुए चेतन को ही पशु मानना चाहिए।]
त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं

अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र ८ २५९

Page 259Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र ८ २५९
नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति । कामः संकल्पो
विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्हीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो
मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमायैतैषा हि न प्राणोऽपानो व्यान
उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ३ ॥
उस (पुरुष) ने तीन अन्नों का चयन अपने लिए किया। ये तीन अन्न-मन, वाणी और प्राण हैं।
मनोयोग से ही सभी कार्य सम्पन्न होते हैं। यदि मन अन्यत्र है, तो समुचित रूप से देखा-सुना भी नहीं
जाता। इसीलिए प्रायः कहा जाता है- 'मेरा मन दूसरी जगह था, इसलिए मैं नहीं देख सका' तथा 'मेरा मन
यहाँ नहीं था, इसलिए मैं नहीं सुन सका।' अतः स्पष्ट है कि व्यक्ति मन से ही देखता और सुनता है। काम,
सङ्कल्प, श्रद्धा, संशय, अश्रद्धा, धारण शक्ति (धृति), अधृति, ही अर्थात् लज्जा, बुद्धि और भय ये सभी मन
स्वरूप हैं। इसी कारण शरीर के पृष्ठभाग (पीठ) की ओर से स्पर्श किये जाने पर मनुष्य मन द्वारा इसे जान
लेता है। समस्त शब्द ही वाक् शक्ति अर्थात् वाणी हैं, जिसके द्वारा समस्त अभिप्राय अभिव्यक्त किये जा
सकते हैं। शरीर स्थित पञ्चप्राण हैं- प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान। आत्मा की निर्भरता (शरीर
में रहने की स्थिति) इन्हीं पंच प्राणों पर आधृत है॥ ३॥
[ जिस प्रकार हुत एवं प्रहुत से शरीर और प्रकृति में स्थित देवों को तृप्त और पुष्ट किया जाता है, उसी प्रकार
मन, वाणी और प्राण से ब्रह्म को शरीरस्थ और प्रकृति में व्याप्त ब्राह्मी चेतना को तृष्ट-पुष्ट किया जा सकता है।
इन तीनों का प्रयोग ब्रह्म के निमित्त ही करना चाहिए-भोगादि के लिए नहीं। जो ऐसा करता है, वही ब्रह्मनिष्ठ
ब्राह्मण या ब्रह्मचारी कहा जा सकता है।]
त्रयो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥ ४ ॥
पूर्व वर्णित मन, वाणी और प्राण ये ही तीनों लोक हैं। वाक् पृथिवी लोक है (इसीलिए पृथिवी पर
वाणी द्वारा ही समस्त कार्य सम्पादित होते हैं)। मन अन्तरिक्ष लोक है और प्राण द्यु (स्वर्ग) लोक है॥ ४॥
त्रयो वेदा एत एव वागेवर्ग्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः ॥ ५ ॥
ये (वाणी, मन और प्राण) ही तीनों वेद हैं। वाक् शक्ति ऋग्वेद, मन यजुर्वेद और प्राण ही सामवेद है॥
देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवा मनः पितरः प्राणो मनुष्याः ॥ ६ ॥
ये तीनों ही देवता, पितरगण और मनुष्य हैं। वाक् शक्ति ही देवता, मन पितरगण और प्राण मनुष्य है॥ ६॥
पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता प्राणः प्रजा ॥ ७ ॥
ये तीनों माता, पिता और प्रजा (सन्तान) हैं। वाक् माता, मन पिता और प्राण प्रजा-सन्तति रूप है॥
विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत् किंच विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्घि विज्ञाता
वागेनं तद्भूत्वावति ॥ ८ ॥
ये ही विज्ञात (जाने हुए), विजिज्ञास्य (जानने योग्य) और अविज्ञात (न जाने हुए) हैं। जाना
हुआ (ज्ञान) ही वाक् है। वाक् शक्ति ही विज्ञात है। यह वाक् ही ज्ञानस्वरूप होकर अपने जीवात्मा
(अपने ज्ञाता) की रक्षा करती है॥ ८॥

Page 260Permalink

२६० बृहदारण्यकोपनिषद्
यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वावति ॥
जो कुछ भी जानने योग्य है, वह मन का ही स्वरूप है। वास्तव में मन ही जानने योग्य या
विजिज्ञास्य है (क्योंकि सन्देह आदि भाव मन में ही उत्पन्न होते हैं)। वही (मन ही) विजिज्ञास्य
होकर उसका संरक्षण करता है ॥ ९॥
यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वावति ॥ १० ॥
जो कुछ भी अनजाना (अविज्ञात) है, वह प्राणस्वरूप है; क्योंकि वह अविज्ञात (छुपा) रहकर भी
शरीर का संरक्षण करता है ॥ १० ॥
तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतिरूपमयमग्निस्तद्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी
तावानयमग्निः ॥ ११ ॥
उस वाक् शक्ति का शरीर, पृथिवी और ज्योतिष्मान् रूप अग्नि है। वाक् शक्ति की मात्रा जितनी ही
पृथिवी है और उतना ही अग्नितत्त्व है ॥ ११ ॥
अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतिरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती
द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुन ँ समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो
द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १२ ॥
द्युलोक मन की काया और आदित्य उसका (मन का) ज्योतिष्मान् स्वरूप है। जितने परिमाण का
मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही आदित्य है। उन (आदित्य और अग्नि) के परस्पर संयोग से ही
प्राण तत्त्व का उद्भव हुआ। प्राण को ही इन्द्र और शत्रुहीन कहा गया है। प्रतिपक्षी को ही सपत्न अर्थात्
शत्रु कहते हैं। इस तथ्य को इस प्रकार जानने वाले का कोई सपत्न (शत्रु) नहीं होता ॥ १२ ॥
अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतिरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्तावत्य
आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्त ँ
स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानुपास्तेऽनन्तः स लोकं जयति ॥ १३ ॥
जल उस प्राण का शरीर, चन्द्रमा ज्योतिष्मान् स्वरूप है। वहाँ प्राण के परिमाण जितना ही जल और
चन्द्रमा है। ये सभी बराबर और अन्तरहित हैं। जो कोई इन्हें अन्तयुक्त समझकर उनकी उपासना करता है,
उसे अन्तयुक्त लोक पर विजय प्राप्त होती है और जो अनन्त समझकर इनकी उपासना करता है,वह अनन्त
लोक पर विजय प्राप्त करता है ॥ १३ ॥
स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदशकला ध्रुवैवास्य
षोडशी कला स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते सोऽमावास्या ँ रात्रिमेतया षोडश्या
कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मादेता ँ रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न
विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ १४ ॥
वह (ऊपर वर्णित) संवत्सर ही प्रजापति है। जिसकी सोलह कलाएँ हैं। रात्रियाँ उनकी पन्द्रह
कलाएँ हैं। उसकी सोलहवीं कला नित्या (ध्रुवा) है। रात्रियों के माध्यम से ही वह (शुक्ल पक्ष में) प्रवृद्ध

अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र १७ २६१

Page 261Permalink

अध्याय १ ब्राह्मण ५ मन्त्र १७ २६१
और (कृष्ण पक्ष में) क्षीण होता है। वह प्रजापति अमावस्या की रात्रि में अपनी सोलहवीं कला के माध्यम से सबमें
प्रविष्ट होकर प्रातः काल में पुनः प्रकट होता है। अस्तु, अमावस्या की रात्रि में किसी की हिंसा नहीं करनी चाहिए और
देवता को बलि प्रदान करने के निमित्त भी किसी गिरगिट तक का वध नहीं करना चाहिए ॥ १४ ॥
यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलो ऽयमेव स योऽयमेवंवित्पुरुषस्तस्य वित्तमेव
पञ्चदशकला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नभ्यं
यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीर्यत आत्मना चेज्जीवति
प्रधिनागादित्येवाहुः ॥ १५ ॥
षोडश कलायुक्त यह संवत्सर निश्चित ही प्रजापति है। धन उसकी पन्द्रह कलाएँ और आत्मा (शरीर)
उसकी सोलहवीं कला है। वह धन से ही प्रवृद्ध और क्षीण होता है। आत्मा इसकी नाभि और धन-सम्पदा
प्रधि अर्थात् रथ के पहिए का बाहरी घेरा है। इसीलिए पुरुष का यदि सर्वस्व (सम्पूर्ण धन) हरण हो जाए
और आत्मा (आत्मबल) बना रहे, तो यह कहा जाता है कि केवल प्रधि बाहर से ही क्षीण हुआ है (अर्थात्
सम्पूर्ण धन के नष्ट होने पर भी व्यक्ति तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक उसका जीवन है) ॥ १५ ॥
अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः
पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानां
श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशंसन्ति ॥ १६ ॥
निश्चित ही ये तीन लोक हैं- मनुष्य लोक, पितृलोक और देवलोक। मनुष्य लोक पुत्र के द्वारा जीता जा
सकता है, अन्य किसी के द्वारा नहीं। पितृलोक कर्म से और देवलोक विद्या द्वारा जीता जा सकता है। समस्त
लोकों में देवलोक ही उत्कृष्ट है, इसी कारण विद्या को भी सर्वश्रेष्ठ कहकर उसकी प्रशंसा की जाती है ॥ १६ ॥
अथातः संप्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोक इति स पुत्रः
प्रत्याहाहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति यद्वै किंचानूक्तं तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता । ये वै के च
यज्ञास्तेषां सर्वेषां यज्ञ इत्येकता ये वै के च लोकास्तेषां सर्वेषां लोक इत्येकतैतावद्वा
इदं सर्वमेतन्मा सर्वं सन्नयमतोऽभुनजदिति तस्मात् पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुस्तस्मा-
देनमनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रैत्यथैभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशति स यद्यनेन
किंचिदक्ष्णयाकृतं भवति तस्मादेनं सर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति तस्मात्पुत्रो नाम स
पुत्रेणैवास्मिँल्लोके प्रतितिष्ठत्यथैनमेते देवाः प्राणा अमृता आविशन्ति ॥ १७ ॥
अब 'सम्प्रति' (इस नाम से जानी जाने वाली प्रक्रिया) कहते हैं। जब पिता दुनिया से गमन करने की
स्थिति में होता है अथवा स्वयं को पुत्र का मार्गदर्शक समझता है, तो वह पुत्र से कहता है- तुम ब्रह्म हो,
यज्ञ हो, लोक हो। इसका प्रत्युत्तर देते हुए पुत्र कहता है- मैं ब्रह्म हूँ, यज्ञ हूँ, लोक हूँ। [इस संवाद का
भाव यह है कि पिता अपने पुत्र को ब्रह्मज्ञानी, यज्ञ परायण और लोक में कीर्तिवान् बनने का शिक्षण देता
है और पुत्र उसे ग्रहण करता है।] इस विश्व में जो कुछ भी अनूक्त (स्वाध्याय या ज्ञान) है, वह सब 'ब्रह्म'
से एकीकृत है, जो कुछ भी 'यज्ञ' है (किए हुए अथवा बिना किये हुए) वे सब 'यज्ञ' शब्द से एकीकृत

Page 262Permalink

२६२ बृहदारण्यकोपनिषद्
हैं और जो भी लोक हैं (जीते हुए अथवा बिना जीते हुए) वे 'लोक' शब्द से एकीकृत हैं। यही गृहस्थ
का कर्त्तव्य है। पिता की इच्छा होती है कि पुत्र उसकी आज्ञा का पालन अवश्य करेगा। इसीलिए शिक्षित
पुत्र अनुशासन का पालन करते हुए लोक में पुण्य कृत्य करता है, अतः उसे 'लोक्य' कहते हैं। इस प्रकार
ज्ञान रखने वाला पिता जब इस मर्त्य लोक से गमन करता है, तो प्राणों (अंश) के माध्यम से पुत्र में प्रतिष्ठित
होता है (अर्थात् अपनी सम्पूर्ण जिम्मेदारी पुत्र को सौंपता है)। यदि किसी कारण (या प्रमादवश) पिता के
द्वारा कोई करणीय कार्य शेष रह जाता है, तो पुत्र उसे पूर्ण कर देता है। इस प्रकार इह लोक में पिता को
अपने पुत्र के माध्यम से ही प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। पिता के साथ उसके अमृत प्राण ही गमन करते हैं ॥ १७॥
पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥
मनुष्य की वाक् शक्ति पृथिवी और अग्नि से युक्त होती है। वह दिव्य वाणी कहलाती है; क्योंकि उस
वाक् (वाणी) के माध्यम से वह (पिता) जो भी कहता है, वह पूर्ण होता जाता है ॥ १८ ॥
दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥
द्युलोक और आदित्य के द्वारा इसमें दिव्य मन आवेशित हो जाता है। दिव्य मन से युक्त होने के कारण
यह सदैव आनन्दमग्न रहता है, कभी भी शोकग्रस्त नहीं होता ॥ १९ ॥
अद्द्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः संचरँश्चासंचरँश्च
न व्यथतेऽथो न रिष्यति स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति यथैषा देवतैवं स यथैतां
देवतां सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवं हैवंविद सर्वाणि भूतान्यवन्ति यदु किंचेमाः प्रजाः
शोचन्त्यमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥ २० ॥
जल और चन्द्रमा के माध्यम से यह प्राण तत्त्व इस तत्त्वद्रष्टा में आवेशित होता है। यह दिव्य प्राण ही
है, जो सञ्चरित होते हुए और न होते हुए भी कभी व्यथित नहीं होता और न ही कभी विनष्ट होता है। इस
तत्त्व को इस प्रकार जानने वाला सब प्राणियों में स्थित आत्मा प्राण देवता के समतुल्य हो जाता है। समस्त
प्राणी जैसे प्राण देवता को पोषित करते हैं, ठीक उसी तरह तत्त्वदर्शी को पोषित करते हैं। लौकिक दुःखों
में लिप्त रहकर ये सांसारिक प्राणी शोक ग्रस्त हो जाते हैं, किन्तु तत्त्व को जानने वाले पुरुष (दुःखों में भी)
कभी शोक नहीं करते और देवत्व प्राप्त कर लेने के कारण पाप भी कभी उनके समीप नहीं आता ॥ २० ॥
अथातो व्रतमीमांसा प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे तानि सृष्टान्यन्योन्येनास्पर्धन्त
वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दधे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः श्रोष्याम्यहमिति श्रोत्रमेवमन्यानि
कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत्तान्द्याप्त्वा मृत्युरवारुन्ध
तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाप्नोद्योऽयं मध्यमः
प्राणस्तानि ज्ञातुं दध्रिर अयं वै नः श्रेष्ठो यः संचरँश्चासंचरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति
हन्तास्यैव सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवँस्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा
इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा
स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥ २१॥