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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 246 of 505

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Page 246

२४६ बृहदारण्यकोपनिषद्
तब देवों ने प्राण से कहा कि आप हमारे लिए उद्गाता बन जाएँ। प्राण ने 'तथास्तु' कहकर इसे
स्वीकार कर लिया और उद्गीथ गायन सम्पन्न किया। उसने (प्राण ने) प्राण तत्त्व के भोग को देवताओं के
लिए और जिस (श्रेष्ठ) गंध को वह सूँघता है, उसे अपने लिए गाया। असुरों को विदित हो गया कि देवता
प्राण रूप उद्गाता द्वारा हमारा अतिक्रमण करेंगे। अस्तु, वे प्राण के पास गये और उसे पाप से बींध दिया।
घ्राण (प्राण शक्ति) जिस अनुपयुक्त अथवा निषिद्ध को सूँघता है, वही पाप है॥ ३॥
अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायद् यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४॥
तब देवों ने चक्षु से उद्गीथ गान करने के लिए निवेदन किया। उसे स्वीकार कर चक्षु इन्द्रिय ने
उद्गीथ गान किया। चक्षु में स्थित भोग सामर्थ्य को उसने देवों के निमित्त गाया और उसमें जो शुभ दर्शन
का गुण है, उसे अपने लिए गाया। इस तथ्य को असुरगण जान गये कि देवता चक्षुरूप उद्गाता के द्वारा
हमारा अतिक्रमण करेंगे, तब असुरों ने चक्षु के निकट जाकर (आक्रमण करके) उसे पाप से विद्ध कर
दिया। नेत्रेन्द्रिय जिस अनुचित को देखती है, वही पाप है॥ ४॥
अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुद्रायद्यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत्कल्याणःशृणोति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपःशृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५॥
इसके बाद देवताओं ने श्रोत्र (कर्णेन्द्रिय) से कहा कि आप हमारे लिए उद्गान करें। श्रोत्र ने स्वीकार करके
देवों के लिए उद्गान किया। श्रोत्रेन्द्रिय के भोग को उसने देवताओं के लिए और वह जो शुभ सुनता है, उसे अपने
लिए गाया। असुर यह जान गये कि श्रोत्र रूप उद्गाता के द्वारा देवता हमारे ऊपर आक्रमण करेंगे, तब उनने श्रोत्र पर
आक्रमण किया और उन्हें पाप- रूप अस्त्र से बींध दिया। अनुचित और अनुपयुक्त सुनना ही पाप है॥५॥
अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो मन उद्गायद्यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य
आगायद्यत् कल्याणः संकल्पयति तदात्मने ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य
पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपः संकल्पयति स एव स पाप्मैवमु खल्वेता
देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मेनाविध्यन् ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवताओं ने मन से उद्गान करने की प्रार्थना की। मन ने उसे स्वीकार कर लिया और
उद्गान सम्पन्न किया। मन के भोगों को उसने देवताओं के लिए और उसके शुभ संकल्पों का अपने लिए
गान किया। इससे असुर यह जान गये कि देवगण मनरूप उद्गाता द्वारा हमारा अतिक्रमण करेंगे। तब
उन्होंने (असुरों ने) मन पर आक्रमण करके उसे पाप से विद्ध कर दिया। अनुपयुक्त और अशुभ संकल्प
करना ही पाप है। अतः देवगण पाप का संसर्ग पाकर (असुरों द्वारा) पाप से विद्ध हुए ॥ ६ ॥
अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत्ते विदुरनेन
वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यत्सयन्स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वग्ंसे
तैवग्ं हैव विध्वग्ंसमाना विष्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य
द्विषन्भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥७॥