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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 248 of 505

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Page 248

२४८ बृहदारण्यकापानषद
अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स आदित्योऽभवत् सोऽसावादित्यः परेण
मृत्युमतिक्रान्तास्तपति ॥ १४॥
तत्पश्चात् वह प्राण चक्षु को मृत्यु के पार ले गया। मृत्यु बन्धन से विमुक्त हुआ चक्षु आदित्य रूप
हो गया। अब वही चक्षु पाप (मृत्यु) बन्धन से मुक्त होकर आदित्य रूप से तपता है-प्रकाशित होता है॥
अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशोऽभवंस्ता इमा दिशः परेण
मृत्युमतिक्रान्ताः॥ १५॥
इसके बाद प्राण ने श्रोत्र को मृत्यु से पार किया। मृत्यु से मुक्त होकर श्रोत्र दिशारूप हो गये। इस
प्रकार दिशारूप होकर श्रोत्र मृत्यु बन्धन से छूट गये॥ १५॥
अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमा अभवत्सोऽसौ परेण
मृत्युमतिक्रान्तो भात्येवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद ॥ १६ ॥
तब उस प्राण ने मन को मृत्यु से पार किया। मृत्यु से पार होकर मन चन्द्रमा हो गया। पाप अथवा
मृत्यु से मुक्त होकर वह मन ही चन्द्रमा होकर प्रकाशित हो रहा है। इस रहस्यात्मक तथ्य को जानने वाले
(तत्त्वज्ञानी) के प्राण उसे मृत्यु से मुक्त कर देता है॥ १६॥
अथात्मनेऽन्नाद्यमागायद्यद्धि किंचान्न मद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७॥
तदुपरान्त प्राण ने अपने निमित्त अन्न का गायन (गुणगान) किया, क्योंकि जो भी अन्न ग्रहण किया
जाता है, वह प्राण द्वारा ही भक्षण किया जाता है और अन्न से ही प्राण प्रतिष्ठित होता है॥ १७॥
ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा इदं सर्वं यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति
ते वै माभिसंविशतेति तथेति तं समन्तं परिण्यविशन्त तस्माद्यदनेनान्नमत्ति
तेनैतास्तृप्यन्त्येवं ह वा एनं स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानां श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादो-
ऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविदं स्वेषु प्रति प्रतिबुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य
एवैतमनुभवति यो वै तमनु भार्यान् बुभूर्षति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८॥
इसके पश्चात् देवों ने प्राण से कहा कि आपने सम्पूर्ण अन्न का उद्गान अपने निमित्त ही किया है,
अतः अपने उपभोग से अवशिष्ट अन्न में हमें भी भागीदार बनाएँ। प्राण ने कहा कि आप लोग अपना भाग
ग्रहण करने हेतु चारों ओर से हममें प्रवेश करें। 'ऐसा ही करेंगे'- यह कहकर वे समस्त (इन्द्रियरूप)
देवगण प्राण में प्रवेश कर गये। इस प्रकार प्राण द्वारा अन्न (भोज्य-पदार्थ) ग्रहण किये जाने पर इन्द्रियरूप
देवता भी तृप्ति अनुभव करते हैं। इस प्रकार से जानने वाले का ज्ञानीजन आश्रय ग्रहण करते हैं। वह
स्वजनों का पोषक, उनमें श्रेष्ठ और अग्रगामी होता है। ज्ञानीजनों में से भी; जो इस प्रकार के ज्ञाता के
विपरीत होना चाहते हैं, वे अपने आश्रित जनो का भरण-पोषण नहीं कर पाते और जो उनके अनुकूल होते
हैं, वे अपने स्वजनों-आश्रितों का भरण-पोषण करने में सक्षम होते हैं॥ १८॥
सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः प्राणो वा अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गानां
रसस्तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष हि वा अङ्गानां रसः॥
उस प्राण तत्त्व को अयास्य तथा आङ्गिरस कहा गया है, क्योंकि वह मुख में स्थित अङ्गों का
(रस) सार होता है। निश्चित ही प्राण अङ्गों का रस है, क्योंकि जब शरीर के किसी भी अङ्ग से प्राण
निकल जाता है, तो वह अङ्ग सूख जाता है॥ १९॥