विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
२६ विविध तीर्थ-कल्प
मेरे महल के नीचे, यमुना तट पर नित्य भजन कीर्त्तन होते हैं
और शंख-घडियाल बजते हैं—मै सुनता हू और देखता हूँ।
अतएव उनकी इन धार्मिक प्रवृत्तियो पर प्रतिबन्ध लगाना
अव्यावहारिक है।।"१ उसने तो सिदिमौला नामक एक मुल्ला को
उसकी धृष्टता से कुपित होकर मरवा भी डाला था।
उसका उत्तराधिकारी अलाउद्दीन खलजी (१२९६-१३१६ ई०)
बडा महत्त्वाकांक्षी, भारी विजेता, प्रतापी और कठोर शासक
था। उसके समय मे प्राय सम्पूर्ण भारत दिल्ली-सल्तनत के प्रभाव
क्षेत्र मे आ गया था। मुल्ला-मौलवियो के विरोध के बावजूद वह
राज्यकार्य मे स्वेच्छाचारी और मुसल्मानेतरो के प्रति अधिक
व्यावहारिक एव सहिष्णु रहा। विद्वानो का भी वह आदर करता
था। भारतभक्त एव समन्वयवादी सुप्रसिद्ध अमीर खुसरो उसका
राजकवि था, राघव और चेतन नाम के दो ब्राह्मण पडित उसके
दरबारी थे, माधव नामक हिन्दू उसका एक मन्त्री था, जैन
वैज्ञानिक ठक्कर फेरु राज्यसेवा मे नियुक्त था, दिल्ली का नगर
सेठ पूर्णचन्द्र नामक एक अग्रवाल जैन सुलतान का कृपापात्र था।
जिनप्रभसूरि के कथनानुसार माधव मन्त्री की प्रेरणा पर ही
सुलतान ने अपने भाई उलुगखाँ को गुजरात-विजय करने भेजा
था। गुजरात के प्राथमिक आक्रमण मे भडौच मे स्वय सुलतान
का जैन मुनि श्रुतवीर से साक्षात्कार हुआ बताया जाता है। सेठ
पूर्णचन्द्र से कहकर उसने दिगम्बराचार्य माधवसेन को दिल्ली
बुलवाया था, राघव एवं चेतन के साथ दर्बार मे शास्त्रार्थ कराया
था और उन्हे सम्मानित किया था—इन्ही आचार्य ने दिल्ली मे
काष्ठासघ की गद्दी स्थापित की थी और सुलतान से कई फरमान
१ आगा मेहदी हुसैन—राइज एण्ड फाल आफ मुहम्मद बिन तुगलक
( लन्दन, १९३८ ) प्रीफेस, पृ० १२।
प्राप्त किये बताये जाते है। कहा जाता है कि श्वेताम्बराचार्य
रामचन्द्रसूरि और जिनचन्द्रसूरि को भी उसने सम्मानित किया
था। सुलतान का फरमान एव सहायता प्राप्त करके सेठ पूर्णचन्द्र
गिरनार तीर्थ की यात्रा के लिए एक बडा सघ लेकर गया था।
उसी समय पेथडगाह के नेतृत्व मे वहाँ गुजरात का भी एक बडा
संघ आया था, और दोनो सघो ने सद्भावपूर्वक साथ-साथ तीर्थ
वन्दना की थी। गुजरात के सूबेदार अलपखाँ ने भी पाटन के सेठ
समरागाह को शत्रुजय तीर्थ का उद्धार करने और यात्रासघ ले
जाने के लिए सैनिक सहायता सहर्ष प्रदान की थी। अलाउद्दीन के
उत्तराधिकारी मुबारकशाह खलजी (१३१६-१३२० ई०) ने सेठ
समरागाह को दिल्ली 'बुलाकर एक उच्च पद पर नियुक्त किया
बताया जाता है। तुगलुक वश का सस्थापक गयासुद्दीन तुगलुक-
गाह (१३२१-१३२५ ई०), जिसको माँ एक हिन्दू जाटनी थी
और जो भारत मे ही जन्मा था, स्वभावत क्रूर और धर्मान्ध
नही था। सेठ समराशाह को वह पुत्रवत् मानता था और उसे
उसने एक उच्च पद देकर तेलगाना भेजा था। सोमचरित्रगणिकृत
'गुरुगुणरत्नाकर' (१४८५ ई०) के अनुसार सूर और वीर
(या नानक) नाम के प्राग्वाटजातीय दो जैन भ्राता भी इस
सुलतान के प्रतिष्ठित सरदार थे। दिल्लीनिवासी सेठ रथपति ने
शाही फरमान प्राप्त करके १३२३ ई० मे ससघ तीर्थ यात्रा की थी
जिसमे पाँच मास का समय लगा था। इन तथ्यो से स्पष्ट है कि
विजयार्थ या विद्रोहदमनार्थ किये गये युद्धो के अवसरो को छोडकर
इस काल मे भारतीयो को सामान्यतया स्वधर्मपालन की सीमित
स्वतन्त्रता प्राप्त थी और उन्हे यदा-कदा शासनकार्य मे उच्च पद
भी दिये जाने लगे थे।
गयासुद्दीन का पुत्र एव उत्तराधिकारी उलुगखाँ उर्फ जूनाखाँ
था जिसने मुहम्मद विन तुगलुक नाम से १३२५ से १३५१ ई०
२८ विविध तीर्थ-कल्प
पर्यन्त गासन किया । दिल्ली के सुलतानो मे उसका राज्य
सर्वाधिक विस्तृत एव शक्तिशाली था और पूर्व मुगलकालीन भारत
का वह सम्भवतया सर्वमहान मुसलमान नरेग था । उसका व्यक्तित्व
अनेक विरोधी तत्त्वो का मिश्रण, अतिविचित्र एव विवादास्पद
रहा है । जहाँ वह सुशिक्षित, वहुभाषाविज्ञ, दर्गन, न्याय, तर्क,
चिकित्सा शास्त्र आदि विविध विद्याओ और ज्ञान-विज्ञानो मे
पारंगत विद्यारसिक स्वतन्त्र विचारक, साधु-सन्तो और विद्वानो
का समादर करने वाला, परमतसहिष्णु, उदार, दानगील,
न्यायप्रिय, आविष्कारबुद्धि-सम्पन्न, सदाचारी और वीर योद्धा था,
वहाँ साथ-ही-साथ बहुत क्रोधी, उतावला, अधीर, अदूरदर्गी
अव्यावहारिक, निरंकुश, क्रूर, निर्दयी और कुछ सनकी भी था ।
स्वय अपने पिता की मृत्यु मे उसका हाथ रहा माना जाता है,
और उसी के सचित धन से उसने विरोधी सरदारो का मुह वन्द
किया । अपराधियो, विशेषकर विद्रोहियो को वह अत्यन्त कठोर
एव अमानुषिक दण्ड देता था, और इस विपय मे पद, वर्ग या
सम्बन्ध का भी लिहाज नही करता था । अपने सगे भानजा, कई
उच्च पदाधिकारियो और एक काजी को भी उसने खुले आम
मृत्यु-दण्ड दिया था । उसके सनकी स्वभाव और राजधानी का
परिवर्तन, तावे के सिक्के चलाना, चीन का आक्रमण प्रभृति
विचित्र योजनाओ एव अभियानो के कारण उसके मरते ही
सल्तनत का द्रुत वेग से पतन होने लगा और एक-एक करके प्राय
सभी प्रान्तीय सूवेदार स्वतन्त्र हो गये ।
इस सुलतान की विफलता एक सबसे वडा कारण |मुल्ला-
मौलवियो का क्षोभ एव विरोध था, जो उससे डरते भी थे,
चिढ़ते भी थे और उसके विरुद्ध विद्रोहो को उभारते रहते थे ।
मध्यकालीन मुसलमानी तवारीखे ( इतिहास-ग्रन्थ ) भी अधि-
काशत मुल्ला-मौलवियो द्वारा ही लिखी गयी, और उनमे उन्होने
प्रस्तावना २९
उसकी भरसक निन्दा भर्त्सना ही की है तथा उमके विद्याप्रेम,
भारतीय धर्मों (हिन्दू, जैन आदि) के साधु-सतो, जोगियो (योगियो
विद्वानो के साथ सत्संग, उदारता, सहिष्णुता, स्वतन्त्र विचार-
गीललता आदि सद्गुणो को भयकर दुर्गुणो के रूप मे चित्रित
किया है । उनसे यह् तो स्पष्ट हो जाता है कि इस सुलतान ने
अस्पताल और दानगालाएं खोली, विद्वानो को मुक्त हस्त से वह
धन देता था, सूफी फकीर शेख रुकनुद्दीन का भक्त था, अरस्तु
के दर्गन का मर्मज्ञ था जोगियो और पडितो का सत्सग करता
था, दरवार मे वुलाकर उनके भाषण और वादविवाद चाव से
सुनता था, स्वयं भी उनसे वादविवाद करता था, उनका सम्मान
करता था, संस्कृत का अभ्यास करता था और काफिरो को
राज्यकार्य मे भी नियुक्त करता था, किन्तु उक्त साधु-सन्तो एव
विद्वानो मे से प्राय किसी का भी कही नामोल्लेख नही किया,
उनके धर्म, आम्नाय, जाति, वर्ग आदि का भी नामोल्लेख नही
किया उनके स्वयं के या उनके धर्म, तीर्थो, साधर्मियो आदि के
हित मे सुलतान द्वारा किये गये कार्यों का भी कोई उल्लेख
नही किया ।
मुहम्मद बिन तुगलुक के स्वयं के जीवन-काल मे रचित हैं
अमीर खुसरो का तुगलकनामा, किरमानी का सियार-उल-
औलिया, छांछी के गीत, कमाल करीम नागौरी का मजमुअ-ए-
खानी, अहमद हसन दवीर का वसातीन-उल-उन्स, अब्बास
दमिश्की का मसालिक-उल-अवसार, इसामी की फुत्तूह-उस्सलातीन,
इब्न बतूता की 'रिहला' तथा स्वयं सुलतान का आत्मचरित्र
जिसके केवल चार पृष्ठ ही सयोग से बच रहे, शेष नष्ट हो गया ।
यात्री इब्न बतूता, जो भारत मे १३३३ से १३४९ ई० तक रहा,
को छोडकर अन्य किसी उपरोक्त रचना मे इस सुलतान के राज्य-
३० विविध तीर्थ-कल्प
काल, चरित्र आदि पर विशेष प्रकाग नही पडता और यह लेखक
भी सुलतान से चिढा हुआ था। इसामी ने बहुत कुछ लिखा है,
किन्तु वह शत्रुपक्ष का लेखक था। सुलतान के आत्मचरित्र का
जो अत्यल्प अश उपलब्ध है उसमे सर्वाधिक उल्लेखनीय उसका
यह उद्गार है कि 'इससे तो अच्छा था कि मैं एक मूर्त्तिपूजक
होता !' जो स्पष्ट ही उसने अपने साधर्मियो (मुसल्मानो) की
धर्मान्धता से चिढकर किया था। उसके उत्तराधिकारी फीरोज
तुगलुक (१३५१-८८ ई०) के समय मे लिखी गई फ़ुतुहाते-
फीरोजशाही, सीराते फीरोजगाही, मुनगाते माहरू, बर्नी की
तारीखे फीरोजशाही एव फतवाए जहांदारी और अफीफ की
तारीखे फीरोजगाही मे मुहम्मद तुगलक के राज्यकाल का पूरा
विवरण है, किन्तु ये लेखक उसके कट्टर विरोधी थे और उसके
प्रति उन्होने उन्मुक्त विषवमन किया है। उत्तरवर्ती तवारीखो के
आधार भी प्राय ये ही ग्रंथ रहे हैं।
उक्त मध्यकालीन तवारीखो के अनेक अत्युक्तिपूर्ण, असंगत,
अर्धसत्य एव परस्परविरोधी कथनो को लेकर आधुनिक इतिहास-
कारो के लिए इस सुलतान का व्यक्तित्व, चरित्र और उसके
राज्यकाल की घटनाएँ विवादास्पद बन गई हैं। डा० आगा
मेहदी हुसैन की दोनो पुस्तको—'राइज एण्ड फाल आफ मुहम्मद
बिन तुग़लुक' (लन्दन, १९३८) तथा 'दी तुग़लुक डायनेस्टी'
(कलकत्ता १९६३)—का तो प्रधान नायक ही यह सुलतान है,
और विद्वान लेखक ने उसके विरोधी पक्ष के लेखको के कथनो
एव निष्कर्षो का खण्डन करने का यथागक्य प्रयत्न किया है।
बल्कि उससे भी आगे बढकर उन्होने उसे एक अत्यन्त उदार,
सर्वधर्मसहिष्णु, महान विद्याप्रेमी एव परम नीतिपरायण आदर्श
सुलतान सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। किन्तु अपनी युक्तियो
एव तर्को के अतिरिक्त जो कुछ वाह्य समर्थन उन्हे प्राप्त हो सका
प्रस्तावना ३१
हैं वह ( प्रथम पुस्तक मे तो ) मात्र दो सस्कृत शिलालेखो का है
जो दो वैश्यो ने दिल्ली नगर से नातिदूर अपने ग्रामो मे कुँए
खुदवाकर उनपर अकित करा दिए थे। दूसरी पुस्तक मे १३२५
ई० मे सयूरगान को दिया फर्मान तथा विविधतीर्थ-कल्प का भी
उल्लेख है और उसके ही आधार पर सुलतान द्वारा जिनप्रभसूरि
का सम्मान करने एव फरमान देने का उल्लेख है। किन्तु इसके
समर्थन मे तत्कालीन तवारीखो आदि का वह कोई सदर्भ दे नही
सके—क्योकि ऐसा कोई सकेत वहाँ सभवतया है ही नही। गायद
भाषा की अनभिज्ञता के कारण विविधतीर्थ-कल्प का भी आगा
साहव समुचित उपयोग नही कर पाये। कही उनकी दृष्टि मे
आचार्य के स्वय तथा उनके प्रशिष्य विद्यातिलक सूरि के ये कथन
आ जाते कि “श्री महम्मदशाह द्वारा की गई गासनोन्नति देखकर
इस पचम काल मे भी लोग चौथे काल की कल्पना करते है, तथा
‘पचम काल मे चौथे आरे जैसी प्रवृत्ति हो रही थी”, तो न जाने
वह इस सुलतान की प्रगसा मे कितना कुछ और लिख डालते ।
इसके अतिरिक्त अन्य जैन स्रोत,, यथा धनपालकृत बाहुबलि
चरित्र, तत्कालीन ग्रंथप्रशस्तियाँ, पट्टावलियाँ, गुर्वावलियाँ,
विविधतीर्थ-कल्प की परम्परा का उत्तरवर्ती साहित्य—भी आगा
साहव के दृष्टिगोचर नही हुए। चाहे वे वैष्णव शिलालेख हो,
या ये जैन स्रोत, अथवा प्रोफेसर आगा जैसे पक्षसाधक आधुनिक
विद्वान, सभी अतिशयोक्तियो से ग्रस्त हैं। सतुलित दृष्टि तो वैसी
अतिशयोक्तियो मे से तथ्याश खोजने का प्रयत्न करती है।
इस सब विवेचन से एक और तथ्य उजागर होता है, जिस पर
हम बराबर बल देते रहे है, कि मध्यकालीन या मुस्लिम शासन-
कालीन भारत का इतिहास मात्र वही नही है जो मुसल्मानी
तवारीखो मे निबद्ध है—उसके अतिरिक्त भी वह बहुत कुछ है,
जो जैन और हिन्दू साधन-स्रोतो से प्राप्त होता है। इसमे सन्देह
३२ विविध तीर्थ-कल्प
नही है कि मध्यकालीन इतिहास के भी जैन साधन-स्रोत उसको
महत्त्वपूर्ण पूरक सामग्री प्रदान करते हैं और उस काल के इतिहास-
लेखन मे उनका समुचित उपयोग किया जाना चाहिये ।
जहाँ तक सुलतान मुहम्मद बिन तुगलुक का सम्बन्ध है, जैन
स्रोतो से विदित है कि अपने शासन के प्रथम वर्ष (१३२५ ई०)
मे ही इस सुलतान ने अपने राज्य के जैनियो (सयूरगान =
सरावोगान, श्रावको )¹ के हितार्थ एक शाही फर्मान जारी किया
था जिसमे इन 'सयूरगान' की प्रशसा करते हुए उन्हे राज्य
सम्मान, प्रश्रय एव भेट पुरस्कार आदि देने का आश्वासन दिया
था तथा प्रशासकीय विभागो को आदेश दिये गये थे कि उन्हे इस
सम्बन्ध मे क्या करना है । राजधानी दिल्ली और गुजरात, धार,
नागौर आदि प्रदेशो के खानो एव अमीर-सदह को भी तत्सम्बन्धी
सूचनाएँ भेजी गई थी। पाटन के सेठ समराशाह को सुलतान
भाई जैसा मानता था और उसने उसे तेलिगाने का शासक भी
नियुक्त किया बताया जाता है। अपने कृपापात्र ज्योतिषी
धराधर, जो सम्भवतया जैन था, की प्रेरणा से सुलतान ने
१३२८ ई० मे आचार्य जिनप्रभसूरि को दरबार मे आमन्त्रित
किया, उनका प्रभूत सम्मान किया, यथासभव उनका सत्सग
किया, अन्य धर्मों के विद्वानो के साथ उनके शास्त्रार्थ भी कराये,
आचार्य के अनुरोध पर उसने उन्हे कन्नान की सातिशय महावीर-
प्रतिमा को, जो कुछ काल तक तुगलकाबाद के शाही खजाने मे
रखी रही थी, उन्हे दे दिया। आचार्य के नेतृत्व मे श्रावको ने
१ देखिए हमारा लेख-'तुगलुक कालीन सयूरगान', जैनसन्देश-
शोधाङ्क-१९ (९ जौलाई १९६४), पृ० ३२४-३२५, तथा
डा० आगा मे० हु०-'तुगलुक डायनेस्टी' (कलकत्ता, १९६३)
पृ० ३६३-३६४ ।
' प्रस्तावना ३३
प्रतिमा को महोत्सवपूर्वक उपयुक्त देवालय मे विराजमान किया।
सुलतान के प्रश्रय मे सुलतान सराय को 'भट्टारक सराय' नाम
दिया गया, एक पोषधशाला भी वहाँ स्थापित की गई और जैनी-
जन वहाँ वसाये गये। अपने तीर्थों के संरक्षण आदि के लिए
आचार्य ने सुलतान से कई फर्मान प्राप्त किये, हस्तिनापुर, मथुरा
आदि अनेक तीर्थों की संघसहित यात्रा की तथा अनेक धर्मोत्सव
किये। सुलतान जब दौलताबाद चला गया तो वहाँ भी उसने
आचार्य को बुला लिया और लगभग तीन वर्ष वह उक्त दक्षिण
देश मे रहे। दिल्ली आने' पर सुलतान ने उन्हे पुन दिल्ली
बुलवाया और १३३२ ई० मे वहाँ वह फिर से पधारे, विविध तीर्थ-
कल्प पूरा किया और थोड़े समय उपरान्त वही दिवंगत हुए प्रतीत
होते हैं। उनकी अनुपस्थिति में तथा उनके स्वर्गवास के पश्चात्
भी उनके पट्टधर जिनदेवसूरि दिल्ली मे रहते हुए सुलतान के कृपा-
भाजन बने रहे और धर्मोद्योत करते रहे। सुलतान की माँ
मखदूमेजहाँ बेगम भी जैन गुरुओ का आदर करती थी। जिनप्रभ
सूरि सम्बन्धी यह सब विवरण कल्प न० २२ एव ५१ मे विस्तार
के साथ दिया हुआ है। यति महेन्द्रसूरि का भी सुलतान ने सम्मान
किया बताया जाता है। राजधानी तुगलकाबाद के शाही किले के
परिकर मे ही 'दरवार चैत्यालय' नामका एक जिनालय विद्यमान
था, जिसमे १३४२ ई० मे उसके निकट ही रहने वाले पाटन
निवासी अग्रवाल जैन साहू सागिया के वंशजो ने एक महान
पूजोत्सव किया था। इन लोगो के गुरु काष्ठासघी माधवसेन के
प्रशिष्य और नयसेन के पट्टधर भट्टारक दुर्लभसेन थे। सुलतान
भी उनका आदर करता था। इस अवसर पर अनेक ग्रन्थो की
प्रतिलिपियाँ भी पडित गन्धर्व के पुत्र वाहडदेव से करायी गई थी।१
१ प्रशस्तिसग्रह (जयपुर १९५०) पृ० ९७; लिपिक वाहड ने उत्तर-
पुराण की अपनी १३३४ ई० की प्रशस्ति में भी सुलतान का
नामोल्लेख किया है, वही, पृ० ९२।
८ विविध तीर्थ-कल्प
“अट्ठावय-उज्जिंते, गयग्गप ए य धम्मचक्के य ।
पासरहावत्तनग, चमरुप्पाय च वदामि ॥”
गजाग्रपदे दशार्णकूटवर्तिनी तथा तक्षशिलाया धर्मचक्रे तथा
अहिच्छत्राया पाश्र्वनाथस्य धरणेन्द्र महिमास्थाने” ।
आचाराग नियुक्ति श्रुतकेवली भद्रबाहुस्वामी रचित होने से
२३५० वर्ष प्राचीन है । निशीथ चूर्णि मे भी तत्कालीन प्रसिद्ध
जैनतीर्थों के नामोल्लेख करते हुए लिखा है—
“उत्तरावहे धम्मचक्क मथुराए देवनिम्मिओ थूभो ।
कोसलाए जियत सामि पडिमा तित्थकराण वा जम्मभूमिओ ॥”
प्राचीन जैन तीर्थों के सम्बन्ध में डॉ० जगदीशचन्द्र जैन की
पुस्तक पठनीय है। जैन तीर्थों सम्बन्धी स्वतन्त्र साहित्य का निर्माण
भी बहुत लम्बे समय से होता रहा है । शुभशील रचित शत्रुञ्जय
कल्पवृत्ति के उल्लेखानुसार भगवान् महावीर के शिष्य सुधर्मा
स्वामी ने तीर्थ माहात्म्य विस्तार से लिखा था जिसका संक्षेप
भद्रबाहु स्वामी ने किया इसके बाद वज्रस्वामी, पादलिप्त सूरि,
धनेश्वर सूरि और धर्मघोष सूरि आदि ने शत्रुंजय कल्प लिखे ।
सुधर्मस्वामिना यस्य माहात्म्य ग्रन्थकोटिभि ।
वर्णितं तच्च संक्षिप्तं वर्ण्यंत तत्कथ मन्दबुद्धिभि ॥१०॥
तच्च वज्रर्षिणा भव्योपकाराय लघूकृतम् ।
तत श्रीपादलिप्तेन सूरिणापि हितेच्छुना ॥११॥
ततो धनेश्वरसूरीश्वर संक्षिप्तवांस्तदा ।
ततोऽन्येऽपि गुरुत्तसा सञ्चिक्षिपुश्च तत्पुन ॥१२॥
ततस्तपागणाधीशो धर्मघोषगुरुत्तम ।
श्री शत्रुञ्जयकल्पं तु चकारामु तमोऽपहम् ॥१३॥
शत्रुञ्जय कल्प की गाथा से भी इस बात की पुष्टि होती है, यत
इय भद्दवाहु रइआ, कप्पा सत्तुञ्ज तित्थ माहप्प ।
श्री वयर पहुद्धरिय, ज पालित्तेण सखविअ ॥३८॥
भूमिका ३
वस्तुत· तीर्थकल्प के कर्त्ता श्रीजिनप्रभसूरिजी ने भी अपने कई
कल्पो मे यह उल्लेख किया है कि भद्रबाहु, वज्रस्वामी और
संघदास आदि प्राचीन आचार्यों के बनाये हुए कल्पो के आधार
से उन्होने कल्पों का निर्माण किया है।
१ शत्रुञ्जयकल्प मे इस प्रकार उल्लेख है —
कल्पप्राभृतत पूर्वं कृतः श्रीभद्रबाहुना ।
श्री वज्रेण ततः पादलिप्ताचार्यैस्तत परम् ॥१२२॥
२ सिरिवडरसीस भणिअ जहा य पालित्तएण च ॥१॥
३ सिरि संघदास मुणिणा लहुकप्पो निम्मिओ अ पडिमाए
गुरुकप्पाओ अ मया सवध लवे समुद्धरिओ ॥६९॥
खेद है कि उपरोक्त पूर्वाचार्यों द्वारा निर्मित प्राचीन कल्पादि
लुप्त हो गए। यहाँ केवल ऐसी रचनाओ की प्राचीन परम्परा
बतलाने के लिए उपर्युक्त उद्धरण दिए गए हैं।
श्रीजिनप्रभसूरिजो ने जितने अधिक तीर्थो के कल्प-स्तवनादि
रचे और उनका सग्रह कर के प्रस्तुत कल्पप्रदीप या विविध तीर्थ-
कल्प ग्रन्थ तैयार कर दिया है वह विश्वसाहित्य मे अजोड है ।
प्राकृत भाषा मे एक अपूर्ण तित्थकप्प की प्रति खभात के भण्डार
( विनयनेमिसूरि ) मे उपलब्ध है पर वह कब किसने रचा, ज्ञात
नही । रचना भी पुनरावृत्तियुक्त अस्तव्यस्त व विस्तृत है फिर भी
उसका सार प्रस्तुत ग्रन्थ के परिशिष्ट मे दिया जा रहा है। इसी
तरह की एक सस्कृत रचना सोमधर्म की उपदेश सप्तति प्राप्त है
जिसमे एक प्रकरण तीर्थो सम्बन्धी है जिसका सार परिशिष्ट न०
१ मे दिया है । परिशिष्ट न० २ मे तीर्थयात्रा का एक विवरण जो
जैन श्वे० पचायती मन्दिर मे कपडे पर लिखा मिला हैं जो अपनी
दृष्टि मे महत्त्वपूर्ण होने से दे दिया ।
वैसे तीर्थों के कुछ कल्प प्राचीन गूर्जर काव्य सग्रह आदि
ग्रन्थो मे भी छप चुके हैं। जैन तीर्थों सम्बन्धी सामग्री इतना
अधिक प्राप्त है जिनमे से कुछ तीर्थयात्राएँ आदि प्राचीन तीर्थ-
माला सग्रह मे प्रकाशित हैं पर अप्रकाशित सामग्री इतनी अधिक
उपलब्ध है कि जिसके अनेक खण्ड तैयार हो सकते हैं। गत पचास
वर्षों मे हमने भी अनेक स्थानो से ऐसी प्रकाशित सामग्री का
सग्रह करना चालू रखा है जिसके फलस्वरूप बहुत वडी सामग्री
एकत्र हो चुकी है इनमे से कुछ तीर्थमालाएँ आदि कई पत्र-पत्रि-
काओ मे प्रकाशित करते रहे हैं। कुछ सामग्री एल० डी० भारतीय
सस्कृति विद्यामदिर, अहमदाबाद से एक सग्रह के रूप मे प्रकाश-
नार्थ प्रेषित है।
तीर्थों सम्बन्धी साहित्य का प्रकाशन
दिगम्बर और श्वेताम्बर उभय सम्प्रदायो के सैकडो तीर्थ
भारत के कोने कोने मे विद्यमान हैं। प्राचीन काल से उन तीर्थों
की यात्रा साधु-साध्वी एवं चतुर्विध सघ तथा श्रावक सघ करते
आ रहे हैं। ऐसे बहुत से यात्री सघो का विवरण समय समय पर
लिखा जाता रहा है। यो तीर्थों के माहात्म्य और ऐतिहासिक
वृत्तान्त काफी लिखे गए। ऐसे साहित्य का प्रकाशन बहुत वर्ष पूर्व
कुछ हुआ था पर इधर मे प्राचीन सामग्री विशेष प्रकाश मे नही
आ रही है।
आवागमन की सुविधा पूर्वापेक्षा बहुत अधिक बढ चुकी है
अत यात्री सघ खूब निकलने लगे पर स्थिरता के अभाव मे जैसा
चाहिए लाभ नही उठाया जा रहा है। तीर्थों की यात्रा के लिए व
प्राचीन इतिहास जानने के लिए लोगो की बहुत उत्सुकता है पर
जिस ढग का और जितने परिमाण मे साहित्य प्रकाशन व प्रचार
होना चाहिए, नही हो रहा है। तीर्थों सम्बन्धी प्रकाशित साहित्य
की एक सूची लगभग ३० वर्ष पूर्व प्रेमी अभिनन्दन ग्रन्थ मे हमने
भूमिका ५
प्रकाशित की थी। उसके बाद भी बहुत से महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित
हुए हैं। यशोविजय जैन ग्रन्थमाला, भावनगर से प्रकाशित और
मुनि जयन्तविजय जी व विशालविजय जी लिखित साहित्य विशेष
रूप से उल्लेखनीय हैं। आनंद जी कल्याण जी की पेढी श्वे० तीर्थ-
मदिरो की सबसे बडी व्यवस्थापिका है उसकी ओर से जैन तीर्थ
सर्व सग्रह नाम ग्रंथ की ३ जिल्दे स० २०१० मे गुजराती मे प्रका-
शित हुईं जिनमे भारत भर के जैनमन्दिरादि की सूची व मुख्य
तीर्थ स्थानो का इतिहास सब तीर्थों के नक्शे के साथ दिया गया
है। इत पूर्व स० २००५ मे मुनि श्री न्यायविजय जी (त्रिपुटी) ने
जैन तीर्थों नो इतिहास नामक ग्रन्थ प्रकाशित करवाया था। ये
दोनो ग्रन्थ श्वेताम्बर तीर्थों की जानकारी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण
हैं पर गुजराती मे हैं। हिन्दी मे जैन तीर्थों का एक बडा सचित्र
ग्रन्थ मद्रास के जैन सघ द्वारा शीघ्र ही प्रकाशित होने जा
रहा है।
दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी, बम्बई द्वारा भगवान् महावीर
के २५०० निर्वाण शताब्दी के समय भारत के दिगम्बर जैन तीर्थ
ग्रन्थ प्रकाशन की योजना बनी थी। इस ग्रन्थ का पहला भाग सन्
१९७४ मे, दूसरा सन् १९७५ और तीसरा सन् १९७६ मे प्रकाशित
हो चुका है। चौथा भाग शीघ्र ही प्रकाशित हो रहा है और
पाचवा तैयारी मे है। यो तो श्वेताम्बरो की अपेक्षा दिगम्बर तीर्थों
सबधी साहित्य बहुत कम प्रकाशित हुआ है पर इन पाचो भागो से
अवश्य ही एक अभाव की पूर्ति होगी। प० बलभद्र जैन ने वर्षों के
परिश्रम से यह ग्रन्थ तैयार किया है एव सचित्र व सुन्दर रूप में
छपा है। आनंद जी कल्याण जी की पेढी को भी २५०० वें निर्वाण
महोत्सव के प्रसग पर हमने प्रेरणा दी थी कि श्वे० तीर्थों के सचित्र
इतिहास भी हिन्दी मे इसी तरह के प्रकाशित किये जाए पर खेद
६ विविध तीर्थ-कल्प
है कि उन्होने इसके महत्त्व और आवश्यकता-उपयोगिता पर ध्यान
नही दिया ।
कलकत्ता के श्री महेन्द्र सिंघी ने हिन्दी मे पूर्वांचल के जैन
तीर्थों के सचित्र इतिहास प्रकाशित करने का प्रयत्न किया है।
कुशल निर्देशन मे हमने भी तीर्थकल्प के कुछ कल्पो का अनुवाद व
कुछ तीर्थों का इतिहास प्रकाशित किया है। जैन भवन कलकत्ता
ने जैन जर्नल के विशेषांक रूप मे शत्रुजय तीर्थ सम्बन्धी शताब्दी
पूर्व प्रकाशित अग्रेजी सचित्र ग्रन्थ प्रकाशित किया है जो विशेष
उल्लेखनीय है। यद्यपि पेढी ने भी स्वतन्त्र प्रकाशन इस ग्रथ का
किया है पर उसका मूल्य अधिक है। प्रत्येक तीर्थ की व्यवस्थापक
समिति को अपने अपने तीर्थों का खोज पूर्ण सचित्र इतिहास हिन्दी-
गुजराती और अग्रेजी तीनो भाषाओ मे प्रकाशित-प्रचारित करना
चाहिए। दक्षिण भारत के जैन तीर्थों के इतिहास कन्नड-तामिल
तेलगु आदि भाषाओ मे प्रकाशित करना चाहिए।
प्रस्तुत तीर्थकल्प का महत्त्व
चौदहवी शताब्दी के महान् विद्वान् और शासन प्रभावक
आचार्य श्री जिनप्रभसूरि भारत के अनेक प्रान्तो मे विचरण करते
रहे हैं। पद्मावती देवी इनके गुरुजी और इनके प्रत्यक्ष थी अत
केवल विद्वता ही नही, अनेक चमत्कार पूर्ण कार्यों से इन्होने जैन
शासन की महान् सेवा की है। तत्कालीन मुस्लिम सम्राट् कुतुबु-
द्दीन और मुहम्मद तुगलक को रंजित एव चमत्कृत करके जैन
शासन के प्रति आकृष्ट किया था। बहुत से तीर्थों की रक्षा कराने
के साथ-साथ कन्नाणा की महावीर प्रतिमा को शाही कैदखाने से
मुक्ति दिलाकर नव्य जिनालय मे प्रतिष्ठित किया था जिसका
निर्माण सुल्तान सराय और भट्टारक सराय नाम से बादशाह ने
ही कराया था। बादशाह ने इनके रहने के लिए तथा श्रावको के
आवाम के हेतु नई बस्ती प्रदान की थी। इन सब सुकृतो का
उल्लेख प्रस्तुत तीर्थकल्प के "कन्यानयनीय महावीर कल्प और
कल्प परिशेष मे विस्तार से आया है जो समकालीन और विश्वस-
नीय है। सूरिजी की जीवनी और उनकी साहित्य सेवा के सम्बन्ध
मे विस्तृत जानने के लिए हमारे प्रकाशित व महो० विनयसागर
जी लिखित "शासन प्रभावक जिनप्रभसूरि" ग्रंथ द्रष्टव्य है।
आचार्य श्री ने अपने विचरण काल मे अनेक तीर्थो की
यात्राएँ की थी उनमे से शत्रुञ्जय, गिरनार, स्तभ तीर्थ आदि कई
तीर्थों के तो प्राचीन कल्प उपलब्ध थे, उनके आधार से तथा
अपने सुने हुए देखे हुए वृत्तान्तो के आधार से बहुत से तीर्थकल्पो
की रचनाएँ की थी इनमे से सवतोल्लेख वाले व आनुमानिक
निर्णीत संवतो वाले कल्पो की नामावली यहाँ दी जा रही है—
१ वैभारगिरि कल्प सं० १३६४।
२ चम्पापुरी कल्प सं० १३६० की घटना का उल्लेख।
३ सत्यपुर तीर्थ कल्प सं० १३६७ की घटना का उल्लेख।
४ अर्बुदगिरि कल्प सं० १३७८ (शक सं० १२४३) मे लल्ल
और पीठड के उद्धारका उल्लेख।
५ शत्रुञ्जय तीर्थ कल्प सं० १३८५ ज्येष्ठ सुदि ७।
६ ढिपुरी स्तव सं० १३८६ (शक सं० १२५१)।
७ अपापा वृहत्कल्प सं० १३८७ भाद्रपद गु० १२ पुष्यार्क देव-
गिरि नगरे।
८ कन्यानयनीय महावीर प्रतिमा कल्प सं० १३८५ का
उल्लेख।
९ हस्तिनापुर तीर्थ स्तव सं० १३८८ (शक सं० १२५३) वै०
सु० ६।
१० महावीर गणधर कल्प सं० १३८९ ज्ये० सु० ५।
८
विविध तीर्थ-कल्प
११ ग्रन्थ समाप्ति स० १३८९ भा० सु० १० योगिनीपुर।
१२ कन्यायननीय महावीर कल्प परिशेष स० १३८९ आषाढ
का उल्लेख।
प्रस्तुत ग्रन्थ मे समकालीन कई ऐतिहासिक घटनाओ के सव-
तोल्लेख सह उल्लेख व कई राजवगो व मुस्लिम सम्राटादि का
उल्लेख ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण है।
इसमे श्वेताम्बर, दिगम्बर भेद भाव के बिना व उत्तर भारत
व दक्षिण भारत के तीर्थों का विश्वसनी वर्णन दिया है। कई
प्रमुख जैन श्रावको, जैनाचार्यो व उनके सुकृत्यो का उल्लेख भी
यथा प्रसग किया गया है। कुछ वातें पौराणिक भी है। कई वर्णन
केवल सम्बन्धित ही नही किन्तु बौद्धो, मनातनियो आदि के लिए
भी उपयोगी हैं। इस प्रकार यह ग्रन्थ ऐतिहासिक सास्कृतिक दृष्टि
से बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी इसका महत्त्व निर्विवाद है
क्योकि इसमे प्राकृत सस्कृत गद्य पद्य विविध शैली की रचनाएं
हैं जिनमे देश्य शब्दो का भी प्रयोग हुआ है। कई शब्दो का वास्त-
विक अर्थ तो समझना भी कठिन है, जिनका अनुमान से काम
निकालना पडा है। वास्तव मे कही-कही तो वर्णन अति सक्षिप्त
होने से उनके भावो का स्पष्टीकरण भी कठिन हो गया है। कोश
ग्रन्थो मे उन शब्दो के नाम भी नही मिलते वे भविष्य मे रचे जाने
वाले कोशो मे अवश्य आने चाहिए। अन्य ग्रन्थो मे वे शब्द किस
अर्थ मे प्रयुक्त हुए हैं इस विषय मे अनुसन्धान व विचार किया
जाना चाहिए।
प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम विविध तीर्थकल्प रखा गया है क्योकि
कल्प सज्ञक रचनाएँ अधिक हैं अवशिष्ट स्तव, स्तवन, स्तुति, चरित्र
और विचार सज्ञक कई रचनाएँ हैं। प्रशस्ति सह कुल ६२ रच-
भमिका ९
नाओ में भाषा और गद्य-पद्यादि की दृष्टि से इस प्रकार वर्गीकरण
किया जा सकता है। संस्कृत की कुल २७ रचनाओ मे १४ पद्य
और १३ गद्यमय है। एवं प्राकृत की ६ पद्य और ३० गद्य रच-
नाएँ हैं।
विविध तीर्थकल्प के ६२ कल्पो मे निम्नोक्त तीर्थों सम्बन्धी
रचनाएँ हैं—
१ अणहिलपुर अरिष्टनेमि कल्प
२ अपापापुरी कल्प,
३ अयोध्याकल्प,
४ अर्बुदाद्रिकल्प,
५ अवन्तिदेश अभिनन्दन कल्प,
६ अश्वावबोध कल्प
७ अष्टापदगिरि कल्प,
८ अहिच्छत्रा नगरी कल्प,
९ उज्ज्यन्त (गिरनार-रैवतगिरि)
१० कन्यानयनीय महावीर कल्प,
११ कालिकुण्ड कुर्कुटेश्वर कल्प,
१२ काम्पिल्यपुर तीर्थ कल्प,
१३ कुड्डु गेश्वर नामेयदेव कल्प,
१४ कुलपाकऋषभ-माणिक्यस्वामी कल्प,
१५ कोकावसति पार्श्वनाथ कल्प,
१६ कोटिशिला तीर्थ कल्प,
१७ कौशाम्बी नगरी कल्प,
१८ चौरासी महातीर्थ नाम संग्रह कल्प,
१९ चम्पापुरी कल्प,
२० ढीपुरी तीर्थ कल्प,
१० विविध तीर्थ-कल्प
२१ नन्दीश्वरद्वीप कल्प,
२२ नाशिकपुर कल्प,
२३ पाटलिपुत्र कल्प,
२४ पार्श्वनाथ (स्तम्भन) कल्प
२५ प्रतिष्ठानपुर कल्प,
२६ फलवर्द्धि पार्श्वनाथ कल्प
२७ मथुगपुरी कल्प
२८ मिथिला नाथ कल्प,
२९ रत्नवाहपुर कल्प
३० वागणसी नगरी कल्प
३१ वैभारगिरि कल्प
३२ शग्वपुर पार्श्व कल्प
३३ शत्रुञ्जय तीर्थ कल्प,
३४ गृद्धदन्ती पार्श्व कल्प,
३५ श्रावस्ती नगरी कल्प
३६ श्रीपुर अन्तगेक्ष कल्प
३७ सत्यपुर तीर्थ कल्प
३८ हरिकेली पार्श्व कल्प,
३९ हस्तिनापुर कल्प,
४० आमेर कुण्ड पद्मावती कल्प,
४१ व्याघ्री कल्प,
४२ कपर्दि कल्प,
४३ अम्बिका कल्प,
४४ वस्तुपाल तेजपाल कल्प,
इनमे पावापुरी, अष्टापद, कन्यानयन, ढिंपुरी, हस्तिनापुर के
दो-दो हैं, प्रतिष्ठान के तीन हैं, गिरनार के चार हैं व पार्श्वनाथ
(स्तंभन) के दो हैं। अत ६२ मे १२ बाद जाने से ५० रहे और
उनमें पच कल्याणक, अतिशय, पचकल्याणक (२४ जिन) स्तव,
पचपरमेष्ठि, ११ गणधर, समवशरण, आदि ६ कल्प तीर्थों के न
होकर गास्त्रीय विचार वाद देने से ४४ ही अवशिष्ट रहेगे। इनमे
भी १ अष्टापद महातीर्थ कल्प धर्मघोषसूरि का, २ पचकल्याणक
स्तवन सोमसूरि का एव ३ कल्यानयन महावीर कल्प परिशेष
आचार्य संघतिलकसूरि के आदेश से विद्यातिलक द्वारा रचित है।
इन कल्पो मे सभी एक-एक तीर्थ सम्बन्धी हैं परन्तु (४५) चतुर-
गीति महातीर्थ नाम सग्रह कल्प मे उस समय के अनेक तीर्थों का
उल्लेख चौबीस तीर्थंकरो के क्रम मे स्थानसूची सह किया है जो
ऐतिहासिक दृष्टि मे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह शाश्वत ती है।
यो तीर्थ मुनियो की परम्परा भ० ऋषभदेव के निर्वाणस्थल अष्टा-
पद से आरम्भ होती है जो हिमालय मे छिपा पडा है।
इस कल्प का अनुवाद प्रस्तुत ग्रन्थ के पृ० १९२ मे प्रकाशित
है। इनमें से बहुत से तीर्थों व मन्दिरो का आज कोई पता नही
चलता।
विविध तीर्थकल्प मे श्रीजिनप्रभसूरि जी ने ज्ञातव्य दिए हैं
उनसे तत्कालीन जैन तीर्थों की स्थिति पर अच्छा प्रकाश पडता
है। अनेक नवीन ऐतिहासिक तथ्य सामने आते हैं। गत सात सौ
वर्षों मे जो पट परिवर्त्तन हुआ है उसका लेखा जोखा चित्र की
भाँति सामने आ जाता है। अनेक मुस्लिम शासको द्वारा विध्वस
लोला हुई धर्म प्राण भक्त श्रावको ने जीर्णोद्धार व नवनिर्माण
कराया उसके विवरण अत्यन्त मूल्यवान हैं।
शत्रुञ्जयतीर्थ—मूलमन्दिर के दाहिनी ओर पुण्डरीक स्वामी
और बाँये तरफ जावड़ सहकारित बिंव था। वामपार्श्व मे सत्य-
पुरीयावतार जिनालय, दाहिनी ओर शकुनिका चैत्य के पीछे अष्टा-
पद मन्दिर, नन्दीश्वर, स्तभन तीर्थ, गिरनार, स्वर्गारोहण चैत्य मे
१२ विविध तीर्थ-कल्प
नमि-विनमि सेवित ऋषभ दूसरे शृंग पर श्रेयासनाथ, गान्तिनाथ,
नमिनाथ ऋषभदेव व महावीर सुशोभित थे । कुन्ती और पाँच
पाण्डवो के बिम्ब लेप्यमय थे जो आज भी हैं । संप्रति, विक्रम,
वाग्भट, पादलिप्त, आम, दत्त के उद्धार का उल्लेख । जावड साह
के बिम्बोद्धार के अजिता यनन स्थानपर अनुपमा सरोवर हुआ ।
जावड का उद्धार स० १०८ मे वज्रस्वामी के उपदेश से हुआ वह
मधुमती (महुवा) निवासी था । वस्तुपाल और पीठड ने भी उद्धार
कराया । वस्तुपाल ने म्लेच्छो द्वारा भग्न होने की संभावना से
ऋषभदेव व पुण्डरीक प्रतिमाओ को भूमिगृह मे रखा । स० १३६९
मे जात्रड स्थापित बिम्बो का म्लेच्छो द्वारा भग्न हुआ । तब समरा-
साह ने स० १३७१ मे मूल नायकोद्धार किया ।
२ गिरनार तीर्थ—गिरनार जी की उपत्यका मे खगान्गढ
और तेजलपुर थे । वहाँ ऋषभदेव व पार्श्वनाथ के मन्दिर थे ।
कल्याणक त्रय मन्दिर वस्तुपाल मन्त्री ने ओर शत्रुजयावतार
कपर्दी मरुदेवी प्रासाद एव ऋषभदेव, पुण्डरीक, अष्टापद, नन्दीश्वर-
द्वीप के जिनालय भी वनवाये थे । काश्मीर के रत्न और अजित
श्रावक के समय लेप्यमय विम्व स्नान से गल जाने पर देवी ने
उन्हे रत्नमय बिम्ब दिया । गुजरात के जयसिंह देव ने खगार को
मार कर सज्जन को दण्डनायक स्थापित किया । स० ११८४ मे
उसने जिनालय बनाया, मालवा के भावड साह ने स्वर्णमय आमाल-
सार कराया । कुमारगल के श्रीमालवंशीय दण्डनायक ने स० १२००
मे पाज बनवाई व धवल ने प्रणाएं (प्याऊ) कराई। वस्तुपाल तेजपाल
वीरधवल के मन्त्री थे । तेजपाल ने तेजलपुर वसाया और पिता
के नाम से आसराज विहार पार्श्व जिनालय कराया । माता कुमार
देवी के नाम से कुमार सरोवर कराया । तेजलपुर से पूर्व दिगा मे
उग्रसेनगढ मे ऋषभदेवादि के मन्दिर हैं । उग्रसेनगढ, खगारगढ
और जूनागढ एक ही है । गढ के बाहर दक्षिणगा दि मे चँवरी-
भूमिका १३
वेदी, लड्दुओ के ओरे, पगुवाड़ा आदि स्थान हैं। उत्तर दिशा मे
दगारमंडप है। तेजपाल ने तीन कल्याणक चैत्य व देपाल मंत्री ने
इन्द्रमण्डप का उद्धार कराया था।
३ स्तभनतीर्थ—इसका लघुकल्प सघदास मुनि ने बनाया
था। जिनप्रभमूरि ने सक्षिप्त रचना की। अभयदेवसूरि द्वारा जयति-
हुअण स्तोत्र रचना का उल्लेख है। न० ५९ कल्पशिलोछ मे विशेष
वर्णन है।
४ अहिच्छत्रा तीर्थ—यह पार्श्वनाथ भगवान् के कमठोपसर्ग
का तीर्थ है। धरगेन्द्र की सर्पणगति के अनुसार दुर्ग का निर्माण
हुआ जो उस समय मौजूद था। चमत्कारी जलकुण्डो व मिट्टी सो
धातु सिद्धि होने के साथ-साथ सकृपिका, सवा लाख कुँए-वापिकाएँ,
मन्दिर मे धरणेन्द्रपद्मावती सेवित पार्श्वनाथ किले के पास नेमि-
नाथ व अम्बिका मूर्ति विद्यमान थी। उत्तरावापी का जल रोग-
नाशक था एव अनेक प्रकार की औषधियो व लौकिक तीर्थो का
भी वर्णन किया है।
५ अर्बुद गिरि—चन्द्रावती के विमलदण्डनायक ने स० १०८८
मे विमलवसही और स, १०८८ मे वस्तुपाल तेजपाल ने लूणि-
गवसही बनाई थी। म्लेच्छो द्वारा भग कर देने पर महणसिह के
पुत्र लल्ल ने विमलवसही का और चण्डसिंह के पुत्र पीथड ने
स० १३९८ मे लूणगवसही का जीर्णोद्धार कराया था। कुमारपाल
ने ऊंचे शिखर पर वीरचैत्य बनवाया जिसका उल्लेख है। जैनेतर
स्थानो का वर्णन भी महत्त्वपूर्ण हैं।
६ मथुरा तीर्थ—पुरातत्त्व की दृष्टि से मथुरा का अत्यधिक
महत्त्व है। वहाँ के सुपार्श्वनाथ स्वामी के कुबेरादेवी निर्मित बौद्ध
स्तूप जिनप्रभसूरि जी के समय मे अच्छी स्थिति मे और प्रसिद्ध
तीर्थ था। वहाँ के अनेक वृत्तान्त और स० ८२६ वोप्रभहिसूरि द्वारा