विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका १३
वेदी, लड्दुओ के ओरे, पगुवाड़ा आदि स्थान हैं। उत्तर दिशा मे
दगारमंडप है। तेजपाल ने तीन कल्याणक चैत्य व देपाल मंत्री ने
इन्द्रमण्डप का उद्धार कराया था।
३ स्तभनतीर्थ—इसका लघुकल्प सघदास मुनि ने बनाया
था। जिनप्रभमूरि ने सक्षिप्त रचना की। अभयदेवसूरि द्वारा जयति-
हुअण स्तोत्र रचना का उल्लेख है। न० ५९ कल्पशिलोछ मे विशेष
वर्णन है।
४ अहिच्छत्रा तीर्थ—यह पार्श्वनाथ भगवान् के कमठोपसर्ग
का तीर्थ है। धरगेन्द्र की सर्पणगति के अनुसार दुर्ग का निर्माण
हुआ जो उस समय मौजूद था। चमत्कारी जलकुण्डो व मिट्टी सो
धातु सिद्धि होने के साथ-साथ सकृपिका, सवा लाख कुँए-वापिकाएँ,
मन्दिर मे धरणेन्द्रपद्मावती सेवित पार्श्वनाथ किले के पास नेमि-
नाथ व अम्बिका मूर्ति विद्यमान थी। उत्तरावापी का जल रोग-
नाशक था एव अनेक प्रकार की औषधियो व लौकिक तीर्थो का
भी वर्णन किया है।
५ अर्बुद गिरि—चन्द्रावती के विमलदण्डनायक ने स० १०८८
मे विमलवसही और स, १०८८ मे वस्तुपाल तेजपाल ने लूणि-
गवसही बनाई थी। म्लेच्छो द्वारा भग कर देने पर महणसिह के
पुत्र लल्ल ने विमलवसही का और चण्डसिंह के पुत्र पीथड ने
स० १३९८ मे लूणगवसही का जीर्णोद्धार कराया था। कुमारपाल
ने ऊंचे शिखर पर वीरचैत्य बनवाया जिसका उल्लेख है। जैनेतर
स्थानो का वर्णन भी महत्त्वपूर्ण हैं।
६ मथुरा तीर्थ—पुरातत्त्व की दृष्टि से मथुरा का अत्यधिक
महत्त्व है। वहाँ के सुपार्श्वनाथ स्वामी के कुबेरादेवी निर्मित बौद्ध
स्तूप जिनप्रभसूरि जी के समय मे अच्छी स्थिति मे और प्रसिद्ध
तीर्थ था। वहाँ के अनेक वृत्तान्त और स० ८२६ वोप्रभहिसूरि द्वारा