विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ विविध तीर्थ-कल्प
है कि उन्होने इसके महत्त्व और आवश्यकता-उपयोगिता पर ध्यान
नही दिया ।
कलकत्ता के श्री महेन्द्र सिंघी ने हिन्दी मे पूर्वांचल के जैन
तीर्थों के सचित्र इतिहास प्रकाशित करने का प्रयत्न किया है।
कुशल निर्देशन मे हमने भी तीर्थकल्प के कुछ कल्पो का अनुवाद व
कुछ तीर्थों का इतिहास प्रकाशित किया है। जैन भवन कलकत्ता
ने जैन जर्नल के विशेषांक रूप मे शत्रुजय तीर्थ सम्बन्धी शताब्दी
पूर्व प्रकाशित अग्रेजी सचित्र ग्रन्थ प्रकाशित किया है जो विशेष
उल्लेखनीय है। यद्यपि पेढी ने भी स्वतन्त्र प्रकाशन इस ग्रथ का
किया है पर उसका मूल्य अधिक है। प्रत्येक तीर्थ की व्यवस्थापक
समिति को अपने अपने तीर्थों का खोज पूर्ण सचित्र इतिहास हिन्दी-
गुजराती और अग्रेजी तीनो भाषाओ मे प्रकाशित-प्रचारित करना
चाहिए। दक्षिण भारत के जैन तीर्थों के इतिहास कन्नड-तामिल
तेलगु आदि भाषाओ मे प्रकाशित करना चाहिए।
प्रस्तुत तीर्थकल्प का महत्त्व
चौदहवी शताब्दी के महान् विद्वान् और शासन प्रभावक
आचार्य श्री जिनप्रभसूरि भारत के अनेक प्रान्तो मे विचरण करते
रहे हैं। पद्मावती देवी इनके गुरुजी और इनके प्रत्यक्ष थी अत
केवल विद्वता ही नही, अनेक चमत्कार पूर्ण कार्यों से इन्होने जैन
शासन की महान् सेवा की है। तत्कालीन मुस्लिम सम्राट् कुतुबु-
द्दीन और मुहम्मद तुगलक को रंजित एव चमत्कृत करके जैन
शासन के प्रति आकृष्ट किया था। बहुत से तीर्थों की रक्षा कराने
के साथ-साथ कन्नाणा की महावीर प्रतिमा को शाही कैदखाने से
मुक्ति दिलाकर नव्य जिनालय मे प्रतिष्ठित किया था जिसका
निर्माण सुल्तान सराय और भट्टारक सराय नाम से बादशाह ने
ही कराया था। बादशाह ने इनके रहने के लिए तथा श्रावको के