विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 51, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ विविध तीर्थ-कल्प
नही है कि मध्यकालीन इतिहास के भी जैन साधन-स्रोत उसको
महत्त्वपूर्ण पूरक सामग्री प्रदान करते हैं और उस काल के इतिहास-
लेखन मे उनका समुचित उपयोग किया जाना चाहिये ।
जहाँ तक सुलतान मुहम्मद बिन तुगलुक का सम्बन्ध है, जैन
स्रोतो से विदित है कि अपने शासन के प्रथम वर्ष (१३२५ ई०)
मे ही इस सुलतान ने अपने राज्य के जैनियो (सयूरगान =
सरावोगान, श्रावको )¹ के हितार्थ एक शाही फर्मान जारी किया
था जिसमे इन 'सयूरगान' की प्रशसा करते हुए उन्हे राज्य
सम्मान, प्रश्रय एव भेट पुरस्कार आदि देने का आश्वासन दिया
था तथा प्रशासकीय विभागो को आदेश दिये गये थे कि उन्हे इस
सम्बन्ध मे क्या करना है । राजधानी दिल्ली और गुजरात, धार,
नागौर आदि प्रदेशो के खानो एव अमीर-सदह को भी तत्सम्बन्धी
सूचनाएँ भेजी गई थी। पाटन के सेठ समराशाह को सुलतान
भाई जैसा मानता था और उसने उसे तेलिगाने का शासक भी
नियुक्त किया बताया जाता है। अपने कृपापात्र ज्योतिषी
धराधर, जो सम्भवतया जैन था, की प्रेरणा से सुलतान ने
१३२८ ई० मे आचार्य जिनप्रभसूरि को दरबार मे आमन्त्रित
किया, उनका प्रभूत सम्मान किया, यथासभव उनका सत्सग
किया, अन्य धर्मों के विद्वानो के साथ उनके शास्त्रार्थ भी कराये,
आचार्य के अनुरोध पर उसने उन्हे कन्नान की सातिशय महावीर-
प्रतिमा को, जो कुछ काल तक तुगलकाबाद के शाही खजाने मे
रखी रही थी, उन्हे दे दिया। आचार्य के नेतृत्व मे श्रावको ने
१ देखिए हमारा लेख-'तुगलुक कालीन सयूरगान', जैनसन्देश-
शोधाङ्क-१९ (९ जौलाई १९६४), पृ० ३२४-३२५, तथा
डा० आगा मे० हु०-'तुगलुक डायनेस्टी' (कलकत्ता, १९६३)
पृ० ३६३-३६४ ।