विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ३१
हैं वह ( प्रथम पुस्तक मे तो ) मात्र दो सस्कृत शिलालेखो का है
जो दो वैश्यो ने दिल्ली नगर से नातिदूर अपने ग्रामो मे कुँए
खुदवाकर उनपर अकित करा दिए थे। दूसरी पुस्तक मे १३२५
ई० मे सयूरगान को दिया फर्मान तथा विविधतीर्थ-कल्प का भी
उल्लेख है और उसके ही आधार पर सुलतान द्वारा जिनप्रभसूरि
का सम्मान करने एव फरमान देने का उल्लेख है। किन्तु इसके
समर्थन मे तत्कालीन तवारीखो आदि का वह कोई सदर्भ दे नही
सके—क्योकि ऐसा कोई सकेत वहाँ सभवतया है ही नही। गायद
भाषा की अनभिज्ञता के कारण विविधतीर्थ-कल्प का भी आगा
साहव समुचित उपयोग नही कर पाये। कही उनकी दृष्टि मे
आचार्य के स्वय तथा उनके प्रशिष्य विद्यातिलक सूरि के ये कथन
आ जाते कि “श्री महम्मदशाह द्वारा की गई गासनोन्नति देखकर
इस पचम काल मे भी लोग चौथे काल की कल्पना करते है, तथा
‘पचम काल मे चौथे आरे जैसी प्रवृत्ति हो रही थी”, तो न जाने
वह इस सुलतान की प्रगसा मे कितना कुछ और लिख डालते ।
इसके अतिरिक्त अन्य जैन स्रोत,, यथा धनपालकृत बाहुबलि
चरित्र, तत्कालीन ग्रंथप्रशस्तियाँ, पट्टावलियाँ, गुर्वावलियाँ,
विविधतीर्थ-कल्प की परम्परा का उत्तरवर्ती साहित्य—भी आगा
साहव के दृष्टिगोचर नही हुए। चाहे वे वैष्णव शिलालेख हो,
या ये जैन स्रोत, अथवा प्रोफेसर आगा जैसे पक्षसाधक आधुनिक
विद्वान, सभी अतिशयोक्तियो से ग्रस्त हैं। सतुलित दृष्टि तो वैसी
अतिशयोक्तियो मे से तथ्याश खोजने का प्रयत्न करती है।
इस सब विवेचन से एक और तथ्य उजागर होता है, जिस पर
हम बराबर बल देते रहे है, कि मध्यकालीन या मुस्लिम शासन-
कालीन भारत का इतिहास मात्र वही नही है जो मुसल्मानी
तवारीखो मे निबद्ध है—उसके अतिरिक्त भी वह बहुत कुछ है,
जो जैन और हिन्दू साधन-स्रोतो से प्राप्त होता है। इसमे सन्देह