विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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विविध तीर्थ-कल्प
११ ग्रन्थ समाप्ति स० १३८९ भा० सु० १० योगिनीपुर।
१२ कन्यायननीय महावीर कल्प परिशेष स० १३८९ आषाढ
का उल्लेख।
प्रस्तुत ग्रन्थ मे समकालीन कई ऐतिहासिक घटनाओ के सव-
तोल्लेख सह उल्लेख व कई राजवगो व मुस्लिम सम्राटादि का
उल्लेख ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण है।
इसमे श्वेताम्बर, दिगम्बर भेद भाव के बिना व उत्तर भारत
व दक्षिण भारत के तीर्थों का विश्वसनी वर्णन दिया है। कई
प्रमुख जैन श्रावको, जैनाचार्यो व उनके सुकृत्यो का उल्लेख भी
यथा प्रसग किया गया है। कुछ वातें पौराणिक भी है। कई वर्णन
केवल सम्बन्धित ही नही किन्तु बौद्धो, मनातनियो आदि के लिए
भी उपयोगी हैं। इस प्रकार यह ग्रन्थ ऐतिहासिक सास्कृतिक दृष्टि
से बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी इसका महत्त्व निर्विवाद है
क्योकि इसमे प्राकृत सस्कृत गद्य पद्य विविध शैली की रचनाएं
हैं जिनमे देश्य शब्दो का भी प्रयोग हुआ है। कई शब्दो का वास्त-
विक अर्थ तो समझना भी कठिन है, जिनका अनुमान से काम
निकालना पडा है। वास्तव मे कही-कही तो वर्णन अति सक्षिप्त
होने से उनके भावो का स्पष्टीकरण भी कठिन हो गया है। कोश
ग्रन्थो मे उन शब्दो के नाम भी नही मिलते वे भविष्य मे रचे जाने
वाले कोशो मे अवश्य आने चाहिए। अन्य ग्रन्थो मे वे शब्द किस
अर्थ मे प्रयुक्त हुए हैं इस विषय मे अनुसन्धान व विचार किया
जाना चाहिए।
प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम विविध तीर्थकल्प रखा गया है क्योकि
कल्प सज्ञक रचनाएँ अधिक हैं अवशिष्ट स्तव, स्तवन, स्तुति, चरित्र
और विचार सज्ञक कई रचनाएँ हैं। प्रशस्ति सह कुल ६२ रच-