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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 442 में से

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पृष्ठ 49

३० विविध तीर्थ-कल्प

काल, चरित्र आदि पर विशेष प्रकाग नही पडता और यह लेखक
भी सुलतान से चिढा हुआ था। इसामी ने बहुत कुछ लिखा है,
किन्तु वह शत्रुपक्ष का लेखक था। सुलतान के आत्मचरित्र का
जो अत्यल्प अश उपलब्ध है उसमे सर्वाधिक उल्लेखनीय उसका
यह उद्गार है कि 'इससे तो अच्छा था कि मैं एक मूर्त्तिपूजक
होता !' जो स्पष्ट ही उसने अपने साधर्मियो (मुसल्मानो) की
धर्मान्धता से चिढकर किया था। उसके उत्तराधिकारी फीरोज
तुगलुक (१३५१-८८ ई०) के समय मे लिखी गई फ़ुतुहाते-
फीरोजशाही, सीराते फीरोजगाही, मुनगाते माहरू, बर्नी की
तारीखे फीरोजशाही एव फतवाए जहांदारी और अफीफ की
तारीखे फीरोजगाही मे मुहम्मद तुगलक के राज्यकाल का पूरा
विवरण है, किन्तु ये लेखक उसके कट्टर विरोधी थे और उसके
प्रति उन्होने उन्मुक्त विषवमन किया है। उत्तरवर्ती तवारीखो के
आधार भी प्राय ये ही ग्रंथ रहे हैं।
उक्त मध्यकालीन तवारीखो के अनेक अत्युक्तिपूर्ण, असंगत,
अर्धसत्य एव परस्परविरोधी कथनो को लेकर आधुनिक इतिहास-
कारो के लिए इस सुलतान का व्यक्तित्व, चरित्र और उसके
राज्यकाल की घटनाएँ विवादास्पद बन गई हैं। डा० आगा
मेहदी हुसैन की दोनो पुस्तको—'राइज एण्ड फाल आफ मुहम्मद
बिन तुग़लुक' (लन्दन, १९३८) तथा 'दी तुग़लुक डायनेस्टी'
(कलकत्ता १९६३)—का तो प्रधान नायक ही यह सुलतान है,
और विद्वान लेखक ने उसके विरोधी पक्ष के लेखको के कथनो
एव निष्कर्षो का खण्डन करने का यथागक्य प्रयत्न किया है।
बल्कि उससे भी आगे बढकर उन्होने उसे एक अत्यन्त उदार,
सर्वधर्मसहिष्णु, महान विद्याप्रेमी एव परम नीतिपरायण आदर्श
सुलतान सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। किन्तु अपनी युक्तियो
एव तर्को के अतिरिक्त जो कुछ वाह्य समर्थन उन्हे प्राप्त हो सका