सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 54

भूमिका ३
वस्तुत· तीर्थकल्प के कर्त्ता श्रीजिनप्रभसूरिजी ने भी अपने कई
कल्पो मे यह उल्लेख किया है कि भद्रबाहु, वज्रस्वामी और
संघदास आदि प्राचीन आचार्यों के बनाये हुए कल्पो के आधार
से उन्होने कल्पों का निर्माण किया है।
१ शत्रुञ्जयकल्प मे इस प्रकार उल्लेख है —
कल्पप्राभृतत पूर्वं कृतः श्रीभद्रबाहुना ।
श्री वज्रेण ततः पादलिप्ताचार्यैस्तत परम् ॥१२२॥
२ सिरिवडरसीस भणिअ जहा य पालित्तएण च ॥१॥
३ सिरि संघदास मुणिणा लहुकप्पो निम्मिओ अ पडिमाए
गुरुकप्पाओ अ मया सवध लवे समुद्धरिओ ॥६९॥
खेद है कि उपरोक्त पूर्वाचार्यों द्वारा निर्मित प्राचीन कल्पादि
लुप्त हो गए। यहाँ केवल ऐसी रचनाओ की प्राचीन परम्परा
बतलाने के लिए उपर्युक्त उद्धरण दिए गए हैं।
श्रीजिनप्रभसूरिजो ने जितने अधिक तीर्थो के कल्प-स्तवनादि
रचे और उनका सग्रह कर के प्रस्तुत कल्पप्रदीप या विविध तीर्थ-
कल्प ग्रन्थ तैयार कर दिया है वह विश्वसाहित्य मे अजोड है ।
प्राकृत भाषा मे एक अपूर्ण तित्थकप्प की प्रति खभात के भण्डार
( विनयनेमिसूरि ) मे उपलब्ध है पर वह कब किसने रचा, ज्ञात
नही । रचना भी पुनरावृत्तियुक्त अस्तव्यस्त व विस्तृत है फिर भी
उसका सार प्रस्तुत ग्रन्थ के परिशिष्ट मे दिया जा रहा है। इसी
तरह की एक सस्कृत रचना सोमधर्म की उपदेश सप्तति प्राप्त है
जिसमे एक प्रकरण तीर्थो सम्बन्धी है जिसका सार परिशिष्ट न०
१ मे दिया है । परिशिष्ट न० २ मे तीर्थयात्रा का एक विवरण जो
जैन श्वे० पचायती मन्दिर मे कपडे पर लिखा मिला हैं जो अपनी
दृष्टि मे महत्त्वपूर्ण होने से दे दिया ।
वैसे तीर्थों के कुछ कल्प प्राचीन गूर्जर काव्य सग्रह आदि