विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना २९
उसकी भरसक निन्दा भर्त्सना ही की है तथा उमके विद्याप्रेम,
भारतीय धर्मों (हिन्दू, जैन आदि) के साधु-सतो, जोगियो (योगियो
विद्वानो के साथ सत्संग, उदारता, सहिष्णुता, स्वतन्त्र विचार-
गीललता आदि सद्गुणो को भयकर दुर्गुणो के रूप मे चित्रित
किया है । उनसे यह् तो स्पष्ट हो जाता है कि इस सुलतान ने
अस्पताल और दानगालाएं खोली, विद्वानो को मुक्त हस्त से वह
धन देता था, सूफी फकीर शेख रुकनुद्दीन का भक्त था, अरस्तु
के दर्गन का मर्मज्ञ था जोगियो और पडितो का सत्सग करता
था, दरवार मे वुलाकर उनके भाषण और वादविवाद चाव से
सुनता था, स्वयं भी उनसे वादविवाद करता था, उनका सम्मान
करता था, संस्कृत का अभ्यास करता था और काफिरो को
राज्यकार्य मे भी नियुक्त करता था, किन्तु उक्त साधु-सन्तो एव
विद्वानो मे से प्राय किसी का भी कही नामोल्लेख नही किया,
उनके धर्म, आम्नाय, जाति, वर्ग आदि का भी नामोल्लेख नही
किया उनके स्वयं के या उनके धर्म, तीर्थो, साधर्मियो आदि के
हित मे सुलतान द्वारा किये गये कार्यों का भी कोई उल्लेख
नही किया ।
मुहम्मद बिन तुगलुक के स्वयं के जीवन-काल मे रचित हैं
अमीर खुसरो का तुगलकनामा, किरमानी का सियार-उल-
औलिया, छांछी के गीत, कमाल करीम नागौरी का मजमुअ-ए-
खानी, अहमद हसन दवीर का वसातीन-उल-उन्स, अब्बास
दमिश्की का मसालिक-उल-अवसार, इसामी की फुत्तूह-उस्सलातीन,
इब्न बतूता की 'रिहला' तथा स्वयं सुलतान का आत्मचरित्र
जिसके केवल चार पृष्ठ ही सयोग से बच रहे, शेष नष्ट हो गया ।
यात्री इब्न बतूता, जो भारत मे १३३३ से १३४९ ई० तक रहा,
को छोडकर अन्य किसी उपरोक्त रचना मे इस सुलतान के राज्य-