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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

' प्रस्तावना ३३
प्रतिमा को महोत्सवपूर्वक उपयुक्त देवालय मे विराजमान किया।
सुलतान के प्रश्रय मे सुलतान सराय को 'भट्टारक सराय' नाम
दिया गया, एक पोषधशाला भी वहाँ स्थापित की गई और जैनी-
जन वहाँ वसाये गये। अपने तीर्थों के संरक्षण आदि के लिए
आचार्य ने सुलतान से कई फर्मान प्राप्त किये, हस्तिनापुर, मथुरा
आदि अनेक तीर्थों की संघसहित यात्रा की तथा अनेक धर्मोत्सव
किये। सुलतान जब दौलताबाद चला गया तो वहाँ भी उसने
आचार्य को बुला लिया और लगभग तीन वर्ष वह उक्त दक्षिण
देश मे रहे। दिल्ली आने' पर सुलतान ने उन्हे पुन दिल्ली
बुलवाया और १३३२ ई० मे वहाँ वह फिर से पधारे, विविध तीर्थ-
कल्प पूरा किया और थोड़े समय उपरान्त वही दिवंगत हुए प्रतीत
होते हैं। उनकी अनुपस्थिति में तथा उनके स्वर्गवास के पश्चात्
भी उनके पट्टधर जिनदेवसूरि दिल्ली मे रहते हुए सुलतान के कृपा-
भाजन बने रहे और धर्मोद्योत करते रहे। सुलतान की माँ
मखदूमेजहाँ बेगम भी जैन गुरुओ का आदर करती थी। जिनप्रभ
सूरि सम्बन्धी यह सब विवरण कल्प न० २२ एव ५१ मे विस्तार
के साथ दिया हुआ है। यति महेन्द्रसूरि का भी सुलतान ने सम्मान
किया बताया जाता है। राजधानी तुगलकाबाद के शाही किले के
परिकर मे ही 'दरवार चैत्यालय' नामका एक जिनालय विद्यमान
था, जिसमे १३४२ ई० मे उसके निकट ही रहने वाले पाटन
निवासी अग्रवाल जैन साहू सागिया के वंशजो ने एक महान
पूजोत्सव किया था। इन लोगो के गुरु काष्ठासघी माधवसेन के
प्रशिष्य और नयसेन के पट्टधर भट्टारक दुर्लभसेन थे। सुलतान
भी उनका आदर करता था। इस अवसर पर अनेक ग्रन्थो की
प्रतिलिपियाँ भी पडित गन्धर्व के पुत्र वाहडदेव से करायी गई थी।१


१ प्रशस्तिसग्रह (जयपुर १९५०) पृ० ९७; लिपिक वाहड ने उत्तर-
पुराण की अपनी १३३४ ई० की प्रशस्ति में भी सुलतान का
नामोल्लेख किया है, वही, पृ० ९२।