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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 442 में से

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पृष्ठ 53

८ विविध तीर्थ-कल्प
“अट्ठावय-उज्जिंते, गयग्गप ए य धम्मचक्के य ।
पासरहावत्तनग, चमरुप्पाय च वदामि ॥”
गजाग्रपदे दशार्णकूटवर्तिनी तथा तक्षशिलाया धर्मचक्रे तथा
अहिच्छत्राया पाश्र्वनाथस्य धरणेन्द्र महिमास्थाने” ।
आचाराग नियुक्ति श्रुतकेवली भद्रबाहुस्वामी रचित होने से
२३५० वर्ष प्राचीन है । निशीथ चूर्णि मे भी तत्कालीन प्रसिद्ध
जैनतीर्थों के नामोल्लेख करते हुए लिखा है—
“उत्तरावहे धम्मचक्क मथुराए देवनिम्मिओ थूभो ।
कोसलाए जियत सामि पडिमा तित्थकराण वा जम्मभूमिओ ॥”
प्राचीन जैन तीर्थों के सम्बन्ध में डॉ० जगदीशचन्द्र जैन की
पुस्तक पठनीय है। जैन तीर्थों सम्बन्धी स्वतन्त्र साहित्य का निर्माण
भी बहुत लम्बे समय से होता रहा है । शुभशील रचित शत्रुञ्जय
कल्पवृत्ति के उल्लेखानुसार भगवान् महावीर के शिष्य सुधर्मा
स्वामी ने तीर्थ माहात्म्य विस्तार से लिखा था जिसका संक्षेप
भद्रबाहु स्वामी ने किया इसके बाद वज्रस्वामी, पादलिप्त सूरि,
धनेश्वर सूरि और धर्मघोष सूरि आदि ने शत्रुंजय कल्प लिखे ।
सुधर्मस्वामिना यस्य माहात्म्य ग्रन्थकोटिभि ।
वर्णितं तच्च संक्षिप्तं वर्ण्यंत तत्कथ मन्दबुद्धिभि ॥१०॥
तच्च वज्रर्षिणा भव्योपकाराय लघूकृतम् ।
तत श्रीपादलिप्तेन सूरिणापि हितेच्छुना ॥११॥
ततो धनेश्वरसूरीश्वर संक्षिप्तवांस्तदा ।
ततोऽन्येऽपि गुरुत्तसा सञ्चिक्षिपुश्च तत्पुन ॥१२॥
ततस्तपागणाधीशो धर्मघोषगुरुत्तम ।
श्री शत्रुञ्जयकल्पं तु चकारामु तमोऽपहम् ॥१३॥
शत्रुञ्जय कल्प की गाथा से भी इस बात की पुष्टि होती है, यत
इय भद्दवाहु रइआ, कप्पा सत्तुञ्ज तित्थ माहप्प ।
श्री वयर पहुद्धरिय, ज पालित्तेण सखविअ ॥३८॥