विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनमें पच कल्याणक, अतिशय, पचकल्याणक (२४ जिन) स्तव,
पचपरमेष्ठि, ११ गणधर, समवशरण, आदि ६ कल्प तीर्थों के न
होकर गास्त्रीय विचार वाद देने से ४४ ही अवशिष्ट रहेगे। इनमे
भी १ अष्टापद महातीर्थ कल्प धर्मघोषसूरि का, २ पचकल्याणक
स्तवन सोमसूरि का एव ३ कल्यानयन महावीर कल्प परिशेष
आचार्य संघतिलकसूरि के आदेश से विद्यातिलक द्वारा रचित है।
इन कल्पो मे सभी एक-एक तीर्थ सम्बन्धी हैं परन्तु (४५) चतुर-
गीति महातीर्थ नाम सग्रह कल्प मे उस समय के अनेक तीर्थों का
उल्लेख चौबीस तीर्थंकरो के क्रम मे स्थानसूची सह किया है जो
ऐतिहासिक दृष्टि मे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह शाश्वत ती है।
यो तीर्थ मुनियो की परम्परा भ० ऋषभदेव के निर्वाणस्थल अष्टा-
पद से आरम्भ होती है जो हिमालय मे छिपा पडा है।
इस कल्प का अनुवाद प्रस्तुत ग्रन्थ के पृ० १९२ मे प्रकाशित
है। इनमें से बहुत से तीर्थों व मन्दिरो का आज कोई पता नही
चलता।
विविध तीर्थकल्प मे श्रीजिनप्रभसूरि जी ने ज्ञातव्य दिए हैं
उनसे तत्कालीन जैन तीर्थों की स्थिति पर अच्छा प्रकाश पडता
है। अनेक नवीन ऐतिहासिक तथ्य सामने आते हैं। गत सात सौ
वर्षों मे जो पट परिवर्त्तन हुआ है उसका लेखा जोखा चित्र की
भाँति सामने आ जाता है। अनेक मुस्लिम शासको द्वारा विध्वस
लोला हुई धर्म प्राण भक्त श्रावको ने जीर्णोद्धार व नवनिर्माण
कराया उसके विवरण अत्यन्त मूल्यवान हैं।
शत्रुञ्जयतीर्थ—मूलमन्दिर के दाहिनी ओर पुण्डरीक स्वामी
और बाँये तरफ जावड़ सहकारित बिंव था। वामपार्श्व मे सत्य-
पुरीयावतार जिनालय, दाहिनी ओर शकुनिका चैत्य के पीछे अष्टा-
पद मन्दिर, नन्दीश्वर, स्तभन तीर्थ, गिरनार, स्वर्गारोहण चैत्य मे