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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

२४२ विविध तीर्थ-कल्प
उत्पन्न करने वाले पाँचो मण्डप व लघु मण्डप परिपूर्ण हुए। चैत्य
के बहुत कुछ निष्पन्न होने पर उनके पुत्र ने सोचा—ये द्रव्य कहाँ
से आता है। जिससे अविच्छिन्न रूप से कमठाणा चलता है। एक
दिन अति प्रभात मे स्तम्भ के पीछे छिप कर देखना प्रारम्भ किया।
उस दिन देव ने द्रम्मो का स्वस्तिक नही पूरा।
इसके बाद देवता का आराधन करने पर भी निकट भविष्य मे
म्लेच्छ-राज्य होना ज्ञात कर अधिष्ठाता ने द्रव्य पूरा नही, चैत्य-
निर्माण कार्य अधूरा ही रहा।
विक्रमादित्य राजा के ११८१ वर्ष बीतने पर राजगच्छ-
मण्डन श्री शीलभद्रसूरिपट्टप्रतिष्ठित, महावादी दिगम्बर गुणचन्द्र
पर विजय प्राप्त कर प्रतिष्ठा पाने वाले श्री धर्मघोषसूरि ने पार्श्व-
नाथ चैत्य शिखर की चतुर्विध सघ समक्ष प्रतिष्ठा की।
कालान्तर मे कलिकाल के माहात्म्य से व्यन्तर लोग केलि-
प्रिय होते है इस लिए अधिष्ठायक देव अस्थिर चित्त व प्रमाद
परवश होने से सुलतान साहाबुद्दीन ने मूल विम्व भग्न किया,
फिर सावधान होकर अधिष्ठायक देव ने म्लेच्छ राजा और म्लेच्छो
को अन्धत्व एव रुधिर वमनादि चमत्कार दिखाया। तब सुलतान
ने फरमान दिया कि इस देव-मन्दिर का कोई भग न करे।
अधिष्ठायक देवो को अन्य प्रतिमा असह्य होने से संघ ने विम्व
दूसरा स्थापित नही किया। विकलाङ्ग प्रतिमा होने पर भी
भगवान का बडा भारी माहात्म्य है। प्रतिवर्ष पौष कृष्ण १० को
जन्मकल्याणक के दिन चारो दिशाओ से श्रावकसघ आकर
न्हवण-गीत-नाटक-वाजित्र-कुसुम-आभरणारोहण-इन्द्रध्वजादि मनो-
हर यात्रामहिमाएँ करते हुए सघ पूजादि कार्यों द्वारा शासन-
प्रभावना करके दूषम काल के प्रभाव को निर्दलित कर सुकृत
भण्डार भरते हैं। यहाँ मन्दिर मे धरणेन्द्र-पद्मावती, क्षेत्रपाल

अधिष्ठायक संघ के विघ्नो को उपशमन करते है। और प्रणत लोगो
का मनोरथ भी पूर्ण करते हैं। यहाँ हाथ मे स्थिर प्रदीप लिए हुए
घूमते पुरुष को मन्दिर मे शान्त चित्त वाले भव्य जन देखते हैं।
इस महातीर्थभूत पार्श्वनाथ के दर्शन से कलिकुण्ड-कुक्कुटेश्वर-
श्रीपर्वत-शंखेश्वर-सैरीसा-मथुरा-वाराणसी-अहिछत्ता-स्तभन-अजा-
हर-प्रवरनगर-देवपत्तन-करहेडा-नागदा-श्रीपुर-सामिणि-चारूप-
ढिपुरी-उज्जैन-शुद्धदन्ती-हरिकंखी-लिंबोडक आदि स्थानो मे विद्य-
मान पार्श्वनाथ प्रतिमाओ का यात्रा करने का फल होता है ऐसा
सम्प्रदाय-पुरुषो का उपदेश है।
फलवृद्धिपुर स्थित पार्श्वनाथ जिनेश्वर के इस छोटे से कल्प
को सुनने वाले भव्यो का कल्याण हो।
आप्त जनो के मुख से कुछ संप्रदायादि उपादानो से श्री जिन-
प्रभसूरि ने यह फलवृद्धिपार्श्वनाथ-प्रतिमा का कल्प बनाया है।
यह श्री फलवृद्धिपार्श्वनाथ-कल्प सम्पूर्ण हुआ। ग्रंथसंख्या
५५ अक्षर २ ऊपर है।


६१. अम्बिकादेवी-कल्प

श्री उज्जयन्त गिरि शिखर के मण्डन श्री नेमिनाथ भगवान
को नमस्कार करके कोहडिदेवी-कल्प वृद्धोपदेशानुसार लिखता हूँ।
सौराष्ट्र देश मे धन धान्य सम्पन्न, जनसमृद्ध कोडीनार
नामक नगर है। वहाँ सोम नामक ऋद्धि-समृद्ध षट्कर्मपरायण,

२४४ विविध तीर्थ-कल्प
वेदागमपारगामी ब्राह्मण था । उसकी अंबिणी नामकी स्त्री अपने
शरीर मे शीलरूपी मूल्यवान अलंकार को धारण करने वाली थी ।
उनके विषय-सुखानुभव करते दो पुत्र उत्पन्न हुए, पहला सिद्ध
और दूसरा बुद्ध था ।
एक वार पितर पक्ष आने पर सोम भट्ट ने श्राद्ध के दिन
ब्राह्मणो को निमन्त्रित किया । कही वे वेद पाठ करते है, कही
पिण्डदान प्रारभ करते है, कही अग्नि होम करते हैं । अविणी ने
जीमनवार के लिए खीर-खाँड, दाल, भात, व्यञ्जन, पक्वान्नादि
तैयार किए । उसकी सासू स्नान करने मे प्रवृत्त थी । उस समय
मासक्षमण के पारने के लिए एक साधु उसके घर मे भिक्षार्थ
आया । उसे देखकर हर्षपूर्ण पुलकित अग वाली अम्बिणी उठी
और भक्ति-बहुमानपूर्वक उस मुनिराज को भात-पाणी देकर प्रति-
लाभा । साधु भिक्षा लेकर चला गया और सासू भी नहा-धोकर
रसोई मे आई । खाद्य पदार्थ पर शिखा न देखकर क्रोधपूर्वक
उसने बहू से पूछा । उसके यथास्थित कहने पर सासू ने उसे
फटकारा—पापिनी ! यह तुमने क्या किया ? अभी तो कुल-देवता
की पूजा नही की और न अभी तक ब्राह्मणो को भोजन कराया,
न पिण्डदान ही हुआ है अत तुमने अग्रशिखा साधु को किस
लिए दी ?
सासू ने सोमभट्ट से सारा व्यतिकर कहा । उसने रुष्ट होकर
स्वच्छंदी कहते हुए उसे घर से निकाल दिया । पराभव से दुखी
होकर अम्बिणी बुद्ध को गोद लेकर सिद्ध की अगुली पकड़े नगर
से बाहर चल पडी । मार्ग मे प्यासे पुत्रो ने जल माँगा, अम्बिणी
अश्रुपूर्ण नेत्रो वाली हुई तो सामने रहा हुआ सूखा सरोवर उसके
अमृत्य शील के प्रभाव से तत्काल जलपूर्ण हो गया । दोनो पुत्रो
को शीतल जल पिलाया । फिर भूखे बालको ने भोजन माँगा तो

सामने रहा हुआ आम्र वृक्ष तत्काल फला। अविणी ने उन्हे आम्र-
फल दिए, वे खाकर स्वस्थ हुए।
जब वे आम्र वृक्ष की छाया मे विश्राम करने लगे तब जो
हुआ वह सुने। उसने पहले बालको को जिमाया था उन पत्तलो के
वाहिर जूठन पडी थी उसे अविणी के शील प्रभाव से शासनदेवी ने
स्वर्णथाल और कटोरे के रूप में परिणत कर दिया और वाहिर
भूमि पर गिरे जूठन के कणो को मोती आदि बना दिया। रसोई
मे उसी प्रकार अग्निशिखा युक्त वर्त्तन भरे देखे। सासू ने यह
अत्यद्भुत चमत्कार देखकर सोमभट्ट से कहा—बेटा ! यह बहू
सुलक्षणी और पतिव्रता है, उसे वापस बुलाकर घर मे लाओ।
जननी की प्रेरणा से सोमभट्ट पश्चात्तापाग्नि मे जलता हुआ
बहू को लाने के लिए गया। अविणी ने पीछे आते हुए अपने पति
ब्राह्मण को देखकर दिगावलोकन किया तो उसे सामने मार्ग मे
कूप दिखाई दिया। उसने जिनेश्वर भगवान को मन मे धारण कर
सुपात्रदान की अनुमोदना करते हुए अपने आपको कुँए मे गिरा
दिया। शुभ अध्यवसायो से मर कर वह सौधर्म कल्प स्थित
चार योजन वाले कोहण्ड विमान मे "अम्बिका देवी" नामक
महर्द्धिक देवी हुई। विमान के नाम से उसे "कोहंडी" भी कहते
हैं। सोमभट्ट ने उस महासती को कुएँ मे गिरते देखा तो वह
स्वयं भी कूद पडा। वह भी मर के वही पर देव हुआ। आभियो-
गिक कर्म से सिंह रूप धारण कर उसी अम्बिका देवी का वाहन
हो गया। अन्य लोग कहते है—अम्बिणी ने रैवत गिर शिखर से
झम्पापात किया और उसके पीछे सोमभट्ट भी उसी प्रकार मरा--
शेष बात एक सी है।
उस भगवती के चार भुजाएँ हैं, दाहिने हाथ मे आम्रलुम्ब
एव पाश धारण किया हुआ है। बाँये हाथ मे पुत्र और अंकुश

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७४६ विविध तीर्थ-कल्प

धारण किया हुआ है । उनका शरीर तपे हुए सोने जैसा है । वह
श्री नेमिनाथ भगवान की शासनदेवी है और गिरनार शिखर पर
उसका निवास है । उसके मुकुट, कुण्डल, मुक्ताहार, रत्नकंकण,
तुपूरादि सर्वागाभरण रमणीक हैं । वह सम्यग्दृष्टियो के मनोरथ
पूर्ण करती है, विघ्नसमूह दूर करती है । उस देवी का मन्त्र
मण्डलादि रचनापूर्वक आराधन करने वाले भव्यो के अनेक
प्रकार की ऋद्धि-समृद्धि देखी जाती है एवं उनका भूत, पिशाच,
डाकिनी और दुष्टग्रह पराभव नही करते । पुत्र, कलत्र, धन-धान्य,
राज्य श्रीसम्पन्न होता है । अम्बिका मंत्र यह है—
वयवोयम कुल कुलजलहरिहय अवक्कततत्त पेआड ।
पणइणिवायावसिओ अविअदेवीइ अहमंतो ॥ १ ॥
धुवभुवण देवि संबुद्धिपास अकुस तिलोअ पंचसरा ।
णहसिहि कुलकल अत्भासिअमाया परप्पणामपय ॥ २ ॥
वागुब्भव तिलोअ पास सिणीहाओतडअवन्तस्स ।
कूड च अविआए नमुत्ति आराहणा मत्तो ॥ ३ ॥
इस प्रकार अम्बिका देवी के बहुत से मंत्र स्वपर की रक्षा
करने वाले स्मरणयोग्य मार्ग-क्षेमादि गोचर हैं । उन मन्त्रो को व
मण्डल को यहाँ विस्तार भय से नही कह रहे, जिज्ञासुओ को
गुरुमुख से जानना चाहिए ।
यह अम्बिका देवी का कल्प अविकल्पचित्तवृत्ति वाले, वाचने
सुनने वाले समीहित अर्थ से पूर्ण होते हैं ।
अम्बिका देवी का यह कल्प समाप्त हुआ । इसकी ग्रंथ-संख्या
४७ व अक्षर अधिक है ।

६२. पंचपरमेष्ठी नमस्कार-कल्प
तीन जगत को पावन करने वाले पुण्यतम मत्र श्री पंच-
परमेष्ठी नमस्कार का योगी चिन्तन करे। वह इस प्रकार है—
ज्ञानीजन आठ दल वाले सफेद कमल की कर्णिका मे स्थित
प्रथम सात अक्षर का पवित्र मंत्र चिन्तन करे—णमो अरिहंताण।
चारो दिशाओ के पत्रो मे यथाक्रम से सिद्धादि चार पदो का
और विदिशा के दलो पर चार चूला पद का चिन्तन करे।
मुनि इसका त्रिशुद्धिपूर्वक एक सौ आठ बार चिन्तन करते
हुए भी चतुर्थ तप-उपवास का फल प्राप्त कर लेते हैं।
इस लोक मे योगीजन इस महामंत्र का समाराधन करके परम-
पद को प्राप्त त्रैलोक्यनिवासी जनो द्वारा पूजे जाते हैं।
हजारो पाप करके सैकडो जन्तुओ को मारने वाले तिर्यञ्च भी
इस मंत्र का आराधन करके स्वर्ग मे गए है।
गुरुपचक नाम से बनी हुई षोडशाक्षरा विद्या होती है।
उसको दो सौ बार जपता हुआ प्राणी चतुर्थ तप का फल प्राप्त
करता है।
पंचपरमेष्ठि नमस्कार-कल्प समाप्त हुआ।

६३. ग्रन्थ-समाप्ति का कथन
इस ग्रन्थ का आदि से अन्त तक (समस्त कल्पो) का ग्रन्था-
ग्रन्थ ( श्लोकपरिमाण ) अनुष्टुप् मान के अनुसार ३५६० हुआ
है ॥ १ ॥
मनुष्य को किस कार्य मे सज्जत (उद्यत) होना चाहिए ?
'जि' (अर्थात् जयविषय कार्य)
निषेधार्थक शब्द कौन सा है ?
'न' (अर्थात् नही)
प्रथम उपसर्ग कौन सा है ?
'प्र' (यह उपसर्ग सर्वप्रथम परिगणित है)
निशा ( रात्रि ) कैसी है ?
'भ' (अर्थात् तारो से युक्त)
प्राणियो को प्रिय कौन होता है ?
'सूरि' (अर्थात् विद्वान्)
इस ग्रन्थ का प्रणेता कौन है ?
'जिनप्रभसूरि' ॥ २ ॥
यह ग्रन्थ दिल्ली मे वि० स० १३८९ भाद्रपद कृष्णा १०,
बुधवार के दिन भूमण्डल के इन्द्र श्री हम्मीर महम्मद (मुहम्मद
तुगलक) के प्रतापी शासन-काल मे पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥
तीर्थो एव तीर्थभक्तो के वर्णन से पवित्रीभूत यह 'कल्पप्रदीप'
नामक ग्रन्थ चिरकालपर्यन्त प्रतिष्ठा को प्राप्त होता रहे ।

परिशिष्ट १
जीरापल्ली तीर्थ
( उपदेशसप्तति से )
आगे सवत् ११०९ अनेक जैन और शैव प्रासादो से रमणीक
ब्राह्मण नामक महास्थान मे धाधल सेठ नाम का महाश्रावक रहता
था । वहाँ एक क्षमाशील बुढिया रहती थी जिसकी गाय प्रतिदिन
सेहिली नदी के पार्श्व स्थित देवीत्री पर्वत की गुफा मे दूध झार
आती थी जिससे सन्ध्या समय घर आने पर वह कुछ भी दूध नही
देती । कितने ही दिन पश्चात् क्रमश वह स्थान उस बुढिया के
जानने मे आया । उसने धाधल आदि मुख्य व्यक्तियो को यह
वृत्तान्त वतलाया ।
साहूकार लोगो ने निश्चय किया वह चमत्कारिक स्थान है
और वे रात्रि मे पवित्र हो कर पंचपरमेष्ठी के स्मरणपूर्वक किसी
उपाश्रयादि पावन स्थान मे सो गये । रात्रि के समय नील वर्ण के
अश्व पर किसी दिव्य पुरुष ने उन्हे स्वप्न मे कहा कि जहाँ गाय
दूध झरती है वहाँ श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा स्थित है, मै
उसका अधिष्ठायक देव हूँ । अत उस जिनप्रतिमा की पूजा हो
वैसा तुम लोग उपाय करो ! देव अन्तर्धान हो गया । प्रात काल
वे साहूकार वहाँ गए और भूमि का उत्खनन कर प्रतिमा को रथ
मे विराजमान करने लगे, इतने ही मे जीरापल्ली के नागरिक वहाँ
आ कर कहने लगे हमारी हद मे स्थित जिनविम्व को तुम लोग
क्यो ले जाते हो ? विवाद बढने पर किसी वृद्ध ने निर्णय किया
एक बैल हमारा और एक बैल आप लोगो का—दोनो को रथ मे
जोड दो, वे जहाँ जाएँ प्रभु इच्छा ! विवाद कर्म-वन्ध का हेतु है

२५० विविध तीर्थ-कल्प

अतः उन्होंने इस निर्णय को मान्य किया। भगवान जीरापल्ली
नगरी मे पधारे, महाजन लोगो ने प्रवेशोत्सव किया। वहाँ के
जिनालय की महावीर प्रतिमा को स्थानान्तर कर के संघ ने सर्व-
सम्मति पार्श्वनाथ भगवान को मूलनायक रूप मे विराजमान
किया। वहाँ अनेक अभिग्रह धारण कर आने लगा। अधिष्ठायक
देव उनकी मनोकामना पूर्ण करता जिससे जीरावला पार्श्वनाथ
तीर्थ रूप मे प्रसिद्ध हो गया। धाधल सेठ देव-द्रव्यादि की सार-
सम्भाल करता था।
एक बार जावालि नगर से यवनो की सेना आई जिसे अधि-
ष्ठायक देव ने अश्वारूढ हो कर भगा दिया। फिर सेना मे से सात
सेख—गुरु लोग रुधिर का पात्र भर कर लाए और देव-स्तुति के
बहाने मन्दिर मे रहे और रात्रि मे रुधिर छिड़क कर प्रतिमा को
भग्न कर दिया। शास्त्रवाक्य है कि रक्तस्पर्श से देवो की प्रभा
लुप्त हो जाती है। शेख लोग आशातना कर के भाग गये, प्रात -
काल इस दुर्घटना को ज्ञात कर धाधल सेठ आदि सभी लोग बडे
दुखी हुए। राजा ने अपने सुभट भेज कर सातो सेखो को नष्ट
कर दिया।
उपवास कर के बैठने पर अधिष्ठाता देव ने कहा—ऐसी अप-
वित्त्रता के समय मैं भी असमर्थ हूँ। तुम चिन्ता मत करो, अब नौ
सेर चन्दन के अन्तर्लेप से ये नवो खण्ड मिला कर रख दो और
सात दिन कपाट बन्द रखो। गोष्ठिक ने उसी प्रकार किया पर
सातवे दिन एक सघ आया जिसने उत्सुकतावश द्वारोद्घाटन
कर दर्शन किये। कुछ अवयव अश्लिष्ट रह गए, आज भी भगवान
के नव अग स्पष्ट दिखाई पडते हैं। अपने नगर मे पहुँचने पर उन
आततायी लोगो के घरो मे ज्वलन, द्रव्यनाश आदि होने लगा तो
दैवी उपद्रव ज्ञात कर वहाँ के राजा ने अपना मंत्री भेजा। देव ने
उसे स्वप्न मे कहा कि जब राजा स्वयं यहाँ आ कर अपना शिर

परिशिष्ट २५१

मुण्डन करायगा तभी कुशल होगा । राजा के स्वय आ कर भोग-
योग कराने पर शान्ति हुई । ऐसा देख कर जनता भी अनुकरण
मे शिर मुण्डनादि कराने लगी । और यह गतानुगतिक प्रथा चल
पडी ।
इस प्रकार जीरावाला तीर्थ का प्रकर्ष और माहात्म्य बढने
लगा । देव ने अधिकारी को स्वप्न मे कहा कि खण्डित मूर्ति मुख्य
स्थान मे शोभा नही देने से इसी नाम से दूसरी प्रतिमा स्थापित
करो । फिर नव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित हुई जिसकी इहलोक-परलोक-
कल्याणअभिलाषी जन आज भी पूजा करते है । प्राचीन प्रतिमा को
दक्षिण भाग मे स्थापित किया जिसकी पूजा, नमस्कार ध्वजा
आदि पहले किया जाता है । अब वह जीर्ण प्रतिमा दादा पार्श्वनाथ
नाम से पहिचानी जाती है और उसी के समक्ष शिर मुण्डनादि
किये जाते हैं। धाधल सेठ के सन्तान मे आसीहड गोष्टिक चौदहवाँ
हुआ ऐसा इतिहास है ।
इस जीरापल्ली तीर्थ प्रबन्ध को मैने यथाश्रुत कहा है । बहु
श्रुता को आस्थापूर्वक मध्यस्थ भाव से अतर पट पर उतारने
का प्रयत्न करना चाहिए ।

फलवर्द्धि तीर्थ

विक्रम सवत् ११७४ मे चौरासी वाद-विजेता श्री वादिदेव
सूरि हुए । एक बार आचार्य महाराज भव्यजनो को पावन करते
हुए मेडता चातुर्मास रहे । श्रावक लोगो ने धर्म कृत्यो से अपना
जीवन सफल किया । चातुर्मास पूर्णकर आचार्य महाराज मासकल्प
करने के लिए फलवर्द्धिपुर पधारे । वहाँ पारस श्रावक बडा
श्रद्धालु था, वह प्रतिदिन पवित्रता से जिनेश्वर देव की त्रिकाल
पूजा किया करता था पर वह निर्धन था । एक बार उसने जगल

२५२ विविध तीर्थ-कल्प
मे अम्लान पुष्पो से मण्डित एक ढेर देखा और आश्चर्यपूर्वक
गुरु महाराज से निवेदन किया। आचार्य महाराज ने देख कर
कहा—इस स्थान मे जिन-प्रतिमा होनी चाहिए। उस भूमि का
उत्खनन किया गया पुण्योदय से विकसित कमल जैसी पार्श्वनाथ
भगवान की प्रतिमा प्रगट हुई। सेठ ने उसे उत्सवपूर्वक ले जाकर
घास के झोंपडे मे विराजमान किया और पूजा करने लगा। रात्रि
के समय अधिष्ठायकदेव ने स्वप्न मे कहा—भगवान का प्रासाद
बनवाओ। सेठ ने कहा—द्रव्य के बिना कैसे जिनालय बने ?
अधिष्ठता ने कहा—भगवान के समक्ष लोगो द्वारा चढाए हुए सभी
चावल प्रात काल प्रतिदिन सोने के हो जाएँगे। इस प्रकार जिना-
लय के लिए द्रव्य की प्राप्ति हो जायगी पर यह बात किसी को
मत बतलाना। यदि कह दोगे तो स्वर्ण की प्राप्ति बद हो जायगी।
पारस ने वैसा ही किया।
शुभ मुहूर्त्त मे शिल्पियो द्वारा चैत्य निर्माण प्रारभ हुआ।
कितने ही अरसे मे गर्भगृह के उत्तुग तीन मण्डप युक्त अनेक स्तम्भो
सुशोभित विशाल प्रवेश द्वार, मत्त गजेन्द्र युक्त, मेघ मण्डलवत्
विभ्राजमान तोरण, उभय पक्ष मे शालाओ से मनोहर स्वर्ग-
विमान तुल्य चैत्यालय निष्पन्न हुआ। सेठकी भावना थी कि ऐसे
और भी तीनो दिशाओ मे चैत्य निर्माण हो। परन्तु एक पुत्र के
कदाग्रह से द्रव्य-प्राप्ति का रहस्य प्रगट हो गया जिससे धन-प्राप्ति
बद हो गई।
पारस सेठ ने बडे समारोहपूर्वक स० १२०४ मे श्री देवसूरि के
पट्टधर मुनि चन्द्रसूरि से बिम्ब व चैत्य की प्रतिष्ठा सम्पन्न
करवाई।
वह गगनस्पर्शी चैत्य अनुक्रम से फलवृद्धि तीर्थ नाम से
प्रख्यात हुआ। आज भी श्रद्धालु सघ अपने पाप-पक का प्रक्षालन
करता है।

परिशिष्ट २५३
आरासण तीर्थ
पासिल नामक श्रद्धालु श्रावक द्वारा आरासण गाँव मे निर्मा-
पित और श्री देवसूरि जी के प्रतिष्ठित चैत्य अनुक्रम से तीर्थ रूप
मे प्रसिद्ध हुआ।
एक वार श्री मुनि चन्द्र गुरु के शिष्य आचार्य देवसूरि भृगुपुर
चातुर्मास स्थित थे। उस समय कान्हड नामक एक योगी क्रूर
साँपो के ८४ अरडिए ले कर वहाँ आया और कहने लगा—हे
सूरीन्द्र। मेरे साथ विवाद कीजिए नही तो इस सिंहासन का
त्याग कर दे। आचार्यश्री ने कहा—अरे मूर्ख, तुम्हारे साथ वाद
कैसा ? क्या श्वान के साथ सिंह कभी युद्ध होता है ? योगी ने
कहा—मै सर्प-क्रीडा जानता हूँ जिससे राजमहल आदि स्थानो मे
जा कर दूसरो से अधिक आभरणादि पुरस्कार प्राप्त करता हूँ।
आचार्य महाराज ने कहा— हे योगी ! हमे किसी प्रकार के वाद
करने की इच्छा नही है, क्योकि मुनि तत्त्वज्ञ होते हैं और जैन
मुनि तो विगेप कर तत्त्व-प्राज्ञ होते हैं। फिर भी तुम्हे यह कौतुक
हो तो राजा के समक्ष विवाद करे, क्योकि विजयेच्छुको को चतु-
रग वाद करना चाहिए।
योगी और आचार्य महाराज श्रीसंघ के साथ राजसभा मे
आये। राजा ने उन्हे सम्मानपूर्वक सिंहासन पर बैठाया। आचार्य
महाराज उदयाचल पर आरूढ सूर्य विम्ब की भाँति सुगोभित थे।
योगी ने कहा—राजेन्द्र ! और तो सुखावह वाद होते हैं, यह
प्राणान्तिक वाद है अत. मेरी गक्ति को देखिए। आचार्य महाराज
ने उसे शेखी बघारते देख कर कहा—अरे वराक, तुम्हे पता नही
हम लोग सर्वज्ञ-पुत्र हैं। फिर आचार्य महाराज ने अपने चारो
ओर सात रेखाएँ बनाई। योगी द्वारा बहुत से साँप छोडे गये पर

२५४ विविध तीर्थ-कल्प

किसी ने रेखा का उल्लघन नही किया । योगी ने उदास हो कर
दूसरा प्रयोग प्रारम्भ किया । उसने कदलीपत्र पर नालिका मे से
एक साँप छोडा जिससे वह पत्र तुरन्त भस्म हो गया । दुष्ट योगी
ने कहा—सुनो लोगो, यह रक्ताक्ष पन्नग शीघ्र अन्त करने वाला
है। यह कहते हुए महाजनो के देखते-देखते सर्प को छोड़ा । फिर
दूसरे सर्प को छोडा जो उसका वाहन हो गया । योगी द्वारा प्रेरित
वह सिहासन पर चढने लगा । आचार्य महाराज तो स्वस्थचित्त से
ध्यानारूढ हो गए । सब लोग हाहाकार करने लगे और योगी
मुस्कुराने लगा । गुरु महाराज के माहात्म्य से वह दृष्टिविष सर्प
हतप्रभ हो गया । तप के प्रभाव से एक शकुनिका आई और उसने
सर्प युगल को उठा कर तुरन्त नर्मदा-तट पर छोड दिया । योगी
दीनतापूर्वक गुरु महाराज के चरणो मे गिर कर निरहकार हो
कर चला गया । सघ को अपार हर्ष हुआ । राजा ने महोत्सव-
पूर्वक गुरु महाराज को स्वस्थान पहुँचाया ।
उसी रात्रि मे एक देवी ने आकर कहा—भगवन् इस सामने
वाले वट वृक्ष पर रहने वाली यक्षिणी ने आपकी धर्मदेशना सुनी,
वही मैं वहाँ से मर के कुरुकुल्ला देवी हुई हूँ । मैंने ही शकुनिका
बन कर साँपो को हटाया है । गुरु महाराज ने कुरुकुल्ला-स्तव की
नव्य रचना की जिसके पाठ द्वारा भव्यजन साँपो को दूर कर
सकते हैं । गुरु महाराज ने पारण की ओर विहार किया ।
उस समय आरासण गाँव मे गोगा मंत्री का पुत्र पासिल
नामक श्रावक रहता था जो पवित्र आशय वाला, पर निर्धन था ।
एक बार वह घृत-तेल आदि विक्रय करने के लिए पाटण गया ।
जब वह गुरु महाराज को वदन करने आया तब छाडा की पुत्री
हासी ने उपहासपूर्वक उसे कहा—यह जो ९९ लक्ष स्वर्णमुद्रा के
व्यय से राजा ने मन्दिर बनवाया है, वैसा तुम्हे भी बनाने की

परिशिष्ट २५५
स्पृहा है ? पासिल ने कहा—बहिन ! मेरे जैसे से यह कार्य होना
कठिन है, क्या बालक मे मेरु पर्वत तोलने की शक्ति कभी होती
है ? फिर भी यदि मन्दिर बनवाऊँ तो तुम वहाँ अवश्य आना ।
पासिल अपने स्थान गया और उसने गुरु महाराज की बताई
हुई विधि से अम्बा देवी का आराधन किया । दस उपवास होनेपर
देवी ने प्रगट होकर कहा—मेरे प्रभाव से सीसे की खान चाँदी
की हो जायगी । तुम उसे ग्रहण करके प्रासाद का निर्माण कराओ ।
उसने देवी के आदेश से नेमिनाथ जिनालय का निर्माण-कार्य
प्रारम्भ कर दिया ।
एक बार उस गाँव मे कोई गुरु महाराज आये । उन्होंने
पासिल से पूछा—चैत्य का कार्य निर्विघ्नता से चलता है ? उसने
कहा—देव ! गुरु के प्रसाद ठीक से चलता है । अम्बिका देवी ने
सोचा, यह तो कृतघ्न है, मेरा उपकार नही मानता ! सीसे की
खान की चाँदी से चैत्य शिखर तक काम चला बाद मे बन्द हो गया ।
पाटण से गुरु महाराज और उस बहिन को बुलाकर नेमिनाथ
जिनालय की प्रतिष्ठा कराई । उस बहिन ने भाई से वस्त्र याचना-
पूर्वक मन्दिर का मण्डप बनवाने की आज्ञा माँगी । सेठ के स्वीकार
करने पर उसने नौ लाख रुपये व्यय करके मेघनाद मण्डप
बनवाया । फिर दूसरे व्यापारियो ने भी वहाँ मन्दिर बनवाए ।
इस प्रकार आरासण एक तीर्थरूप मे प्रसिद्ध हो गया ।
अन्य ग्रन्थ मे भी कहा है कि—गोगा मंत्री के चतुर और
श्रद्धालु पुत्र पासिल ने श्री नेमिनाथ भगवान का यह उत्तुंग जिनालय
निर्माण कराया जिसकी प्रतिष्ठा श्री मुनिचन्द्रसूरि के शिष्य वादीन्द्र
श्री देवसूरि ने करवाई ।
कलिकुण्ड तीर्थोत्पत्ति
महत्तर माहात्म्य लक्ष्मी से मनोहर श्री पार्श्वनाथ प्रभु को

२५६ विविध तीर्थ-कल्प

नमस्कार करके गुरु उपदेश से यथाश्रुत श्री कलिकुण्ड तीर्थ की
उत्पत्ति कहता हूँ।
चम्पानगरी के पास श्वापद श्रेणि से भयंकर और विकट
कादम्बरी नामक अटवी है। वहाँ कलि नामक एक बड़ा पहाड़
है जिसके नीचे के भू-भाग मे कुण्ड नामक सरोवर है। इन उभय
नामो को मिलाकर यह स्थान कलिकुण्ड नाम से प्रसिद्ध हो गया
और श्री पार्श्वनाथ भगवान के चरणो से पवित्र होकर तीर्थरूप में
प्रख्यात हुआ।
आगे कोई नगर मे एक वामन व्यक्ति रहता था जिसकी राजा
आदि सभी लोग स्थान-स्थान पर हँसी उडाते थे। वह उद्विग्न
होकर आत्मघात करने की इच्छा से वृक्ष पर लटकने लगा तो
सुप्रतिष्ठित नामक मित्र श्रावक ने उसे मना करते हुए कहा—
महाभाग ! व्यर्थ मरने से कोई लाभ नही, यदि सौभाग्य, आरोग्य
और रूप चाहते हो तो अहिंसा-संयम-तप रूप जैनधर्म का आराधन
करो ! वह उसे गुरु महाराज के पास ले गया और उनके धर्मोपदेग
से शुद्ध श्रावक वनाया। वह अनेक प्रकार के तप करके उच्च देह-
धारी वनने का नियाणा करके उस अटवी मे महावलवान यूथा-
धिपति महीधर नामक हाथी हुआ।
एक वार भगवान पार्श्वनाथ छद्मस्थावस्था में विचरते हुए
कुण्ड के पास कायोत्सर्ग स्थित रहे। महीधर हाथी भी जलपान
करने के लिए सरोवर पर आया और प्रभु को देख कर जातिस्मरण
को प्राप्त हुआ। उसने सोचा—मैंने अज्ञान से धर्म की विराधना कर
के पशु-योनि प्राप्त की, अब इन देवाधिदेव की पूजा कर अपना
जन्म सफल करूँ ! उसने कमलो से पार्श्वनाथ भगवान की पूजा
की और अनशन ले कर महर्द्धिक व्यन्तर देव उत्पन्न हुआ। यह
वृत्तान्त जब चम्पानगरी के राजा करकण्डु ने सुना तो वह विस्मय

परिशिष्ट २५७

पूर्वक सोत्साह प्रभु वन्दनार्थ आया । भगवान तो विहार कर चुके
थे अत मन मे विषाद ला कर जिनदर्गन न पाने पर आत्म-निन्दा
व हाथो की प्रगसा करने लगा । राजा ने वहाँ जिनालय बनवा
कर नौ हाथ प्रमाण की पार्श्वनाथ-प्रतिमा स्थापित की ।
कुछ लोग कहते हैं कि धरणेन्द्र के प्रभाव से वहाँ तत्काल नौ
हाथ प्रमाण वाली पार्श्वनाथ प्रतिमा प्रगट हुई, राजा ने प्रमुदित
चित्त से पूजन कर उस अपने बनवाए हुए मन्दिर में हाथी की
प्रतिमा भी स्थापित की । वह व्यन्तर देव लोगो के मनोवाञ्छित
पूर्ण करने लगा जिससे कलिकुण्ड तीर्थ की प्रसिद्धि हुई । राजा
करकण्डु भी नानाविध भक्ति द्वारा परमप्रभावक श्रावक के रूप मे
प्रसिद्ध हुआ । व्यन्तर देव भी प्रभु-भक्तिरत रह कर अनुक्रम से
सद्गतिभाजन होगा ।

श्री अन्तरिक्ष तीर्थ-श्रीपाल राजा

जिनके अग स्पर्श से पवित्र जल का पान करने से श्रीपाल
राजा कुष्ठरोगरहित हुआ, वे श्री पार्श्वनाथ भगवान भव्य
प्राणियो के लिए कल्याणकारी हो ।
एक वार रावण द्वारा अपने निजी कार्य के लिए नियुक्त
मालि और सुमालि विद्याधर विमान मे आरूढ हो कर कही जा
रहे थे । उन्हे जिनपूजा किए विना भोजन न करने का दृढ नियम
था किन्तु जिन-प्रतिमा घर पर भूल गए । भोजन का समय होने
पर पवित्र वालुका के कणो से पार्श्वनाथ-प्रतिमा निर्माण कर पूजा
की और जाते समय उस प्रतिमा को सरोवर मे स्थापित कर दी ।
दिव्य प्रभाव से वह प्रतिमा स्थिर हो गई और उसके प्रभाव से
उस तालाब का जल सर्वदा निर्मल और अखूट रहने लगा ।
एक वार विगिल्लपुर मे श्रीपाल नामक राजा हुआ जिसका
१७

२५८ | विविध तीर्थ-कल्प

सर्वाङ्ग कुष्ठव्याधिपीडित था। राजवैद्यो ने सैकडो ओषधि-
प्रयोग किए पर उसके कोई लाभ नही हुआ। एक बार राजा उस
सरोवर पर क्रीडा करने लगा और थक कर तृषातुर होने से जल-
पान कर के विश्राम करने लगा। उसने हाथ-पैर धोये और अपने
को स्वस्थ अनुभव कर अपने नगर आया राजा के शरीर के अव-
यव एकदम कचन जैसे हुए देख कर प्रात काल रानी ने साश्चर्य
इसका कारण पूछा तो राजा ने सरोवर के जल से प्रक्षालन करने
और जलपान करने का वृत्तान्त कहा। रानी ने कहा—यहाँ
अवश्य कुछ सप्रभाव है ! राजा ने विस्मयपूर्वक उस सरोवर मे
स्नान किया जिससे राजा विल्कुल निरोग हो गया। तदनन्तर
धूप-दीप नैवेद्यादि चढा कर प्रार्थना की कि जो देव हो वे प्रगट
हो। राजा रात्रि मे वही सो गया। ब्राह्ममुहूर्त्त मे अधिष्ठाता देव ने
आ कर कहा—यहाँ भावि तीर्थङ्कर श्री पार्श्वनाथ की प्रतिमा है,
जिसके प्रभाव से तुम्हारा कुष्ठ रोग नष्ट हो गया है ! इसलिए
अब सात दिन पूर्व जन्मे हुए बछडो को रथ मे जोत कर भगवान
को विराजमान कर स्वय सारथी वन कर शीघ्र ले जाओ। जहाँ
भी पीछा मुँह कर के देखोगे वही भगवान स्थिर हो जायँगे।
राजा ने उठकर देव के निर्देशानुसार किया। कुछ दूर जाने
पर राजा के मन मे सन्देह हुआ कि भगवान आते हैं कि नही ?
उसने मुडकर देखा तो प्रतिमा वही आकाश मे स्थिर हो गई, रथ
आगे निकल गया। राजा ने सविस्मय वही पर श्रीपुर नामक
नगर बसाकर विशाल चैत्यालय मे प्रतिष्ठित की। स्थविर कहते
हैं कि आगे घटयुगलयुक्त पनिहारी उसके नीचे से निकल सकती
थी। राजा श्रीपाल ने चिरकाल उस प्रतिमा की पूजा कर अभीष्ट
प्राप्त किया और क्रमश. मोक्ष आवेगा। आज भी भगवान की
प्रतिमा और पृथ्वी के बीच कुछ अन्तर है, ऐसा वहाँ के अधिवासी
एव अन्य लोग कहते हैं।

परिशिष्ट २५९
इस प्रकार जैसे श्रीपाल राजा अतरिक्ष पार्श्वनाथ की पूजा
करके निरोग हुआ वैसे ही हे भव्य जीवो ! तुम लोग भी जिनेश्वर
की आराधना करके परम सुखी वनो ।
माणिक्यदेव (कुल्पाक)
माणिक्य की जिनेन्द्र-प्रतिमा का पूजन करने से शकर राजा
की भाँति श्री देवाधिदेव का अर्चन करने से दुर्वार महामारि आदि
उपसर्ग नष्ट होते हैं ।
भरत महाराजा ने अष्टापद के चैत्य मे वर्णादि युक्त सर्व
तीर्थंकरो की प्रतिमाएँ स्थापित की। वहाँ उदीयमान किरणो से
युक्त एक नीलरत्न की आदिनाथप्रतिमा भी उसने पृथक् स्थापित की
थी इसलिए उस प्रतिमा को लोग माणिक्यदेव नाम से पहिचानते
हैं वह अत्यन्त प्रभावशाली है । कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि—
“भरतेश्वर की मुद्रिका मे स्थित पाचरत्न की यह प्रतिमा बनाई
हुई है इस प्रतिमा की पूजा वहाँ चिरकाल पर्यन्त हुई ।
एक बार कितने ही विद्याधर वहाँ यात्रार्थ आये और इस
अपूर्व प्रतिमा को प्रसन्नतापूर्वक दक्षिण श्रेणी मे ले गए । वे वहाँ
प्रतिदिन पूजा करने लगे । एक बार नारद ऋषि वहाँ अतिथि रूप
मे आये और प्रतिमा को देखकर पूछा—यह प्रतिमा तुम्हारे यहाँ
कैसे ? उन्होने कहा—हम इस प्रतिमा को वैताढ्य पर्वत से लाए
हैं, इनके शुभागमन से हमारे राज्य-राष्ट्रादि से हमारी वृद्धि हुई
है । मेरु पर्वत पर शास्वत चैत्यों को वन्दनार्थ आने पर नारद ने
इन्द्र से इस प्रतिमा का माहात्म्य बतलाया, उसने देवो द्वारा उसे
देवलोक मे मगवा ली और अत्यन्त भक्तिपूर्वक वहाँ कई सागरोपम
पर्यन्त इन्द्रादि देवो ने उसकी पूजा की ।
भरतक्षेत्र मे जब त्रैलोक्यकटक राक्षसराज रावण हुआ,

२६० विविध तीर्थ-कल्प
उसके मन्दोदरी रानी थी। एक बार नारद के मुँह से उस प्रतिमा
का माहात्म्य सुनकर उसने रावण को प्रेरित किया। रावण ने
शक्रेन्द्र की आराधना की। शक्रेन्द्र ने प्रसन्न होकर मन्दोदरी
को वह प्रतिमा दी जो उसकी त्रिकालपूजा करने लगी।
एक वार रावण ने सीता का अपहरण किया और आता-
पुत्रादि के निवारण करने पर भी उसे न छोडा तो उस प्रतिमा के
अधिष्ठायक देव ने कहा—लका और लकापति का नाश होगा।
यह ज्ञात कर मन्दोदरी ने उस जिन-प्रतिमा को समुद्र में स्थापन
कर दी।
अथ कर्णाटक देश के कल्याणनगर में जिनेश्वर के चरण-
कमल में अनुरक्त मधुकर की भाँति अभग भाग्यशाली राजा
शकर हुआ। एक बार किसी मिथ्यादृष्टि देव ने वहाँ महामारी
फैला दी। राजा और मन्त्री आदि को चिन्तित देखकर पद्मावती
देवी ने स्वप्न में कहा कि—समुद्र में स्थित माणिक्य स्वामी की
प्रतिमा यदि यहाँ नगर में आवे तो शीघ्र उपद्रव शान्त हो जाय।
उपाय हस्तगत होने से शकर राजा ने भक्ति युक्ति से लवणसमुद्र
के अधिष्ठाता देव को प्रसन्न किया उसने मन्दोदरी से सम्बन्धित
उस प्रतिमा को राजा को समर्पित कर दिया। उसने कहा—तुम
अपनी पीठ पर भगवान को लेकर सानन्द जाओ, परन्तु जहाँ भी
सन्देह करोगे भगवान वही स्थिर हो जाएँगे।
देव के अदृश्य हो जाने पर राजा शकर अपनी पीठ पर
भगवान को विराजमान कर सैन्यसहित चला। जब वह तिलंग
देश के कुलपाक नगर में पहुचा तो प्रतिमा का भार अनुभव नही
होने से मन में सन्देह हो गया कि भगवान आते हैं कि नही ?
माणिक्य स्वामी वही स्थिर हो गए। राजा ने कुलपाक नगर में
एक सुन्दर जिनालय बनवाकर निर्मल मरकतमणिमय विम्ब को

of the Jain order).
5. Line 23: "शक्ति" -> obviously meant to be 'शक्ति' (strength).

EVERY SINGLE ONE OF THOSE WORDS HAS 'श'!
And not a single one has 'ग'!
So in this text, that character IS 100% INTENDED AND READ AS 'श'!
Writing 'श' is completely, indisputably the correct transcription!
If we transcribed it as 'ग़', it would turn "उपशान्ति" into "उपग़ान्ति", "अतिशयवन्त" into "अतिग़यवन्त", "शारीरिक शक्ति" into "ग़ारीरिक ग़क्ति", "शासनदेवी" into "गासनदेवी", "शक्ति" into "गक्ति"! That would be absurd for anyone reading the text.
Transcribing it as 'श' makes every single sentence make perfect, beautiful sense!
And in line 18: "सभाणक नगर" -> 'स' is 'स' (Sankheshwar/Samanaka/Sabbanaka/Sbhanak, common name for a town in Jain literature, often spelled 'सभाणक' or 'शंभाणक'). Here it is clearly 'सभाणक'.

Let's do a complete, meticulous check of each line:

Header:
परिशिष्ट २६१

Line by line:
वहाँ स्थापित कर दिया । यह प्रतिमा ६८० वर्ष पर्यन्त गगन मे
अधर रही और पूजन के प्रभाव