विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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नमस्कार करके गुरु उपदेश से यथाश्रुत श्री कलिकुण्ड तीर्थ की
उत्पत्ति कहता हूँ।
चम्पानगरी के पास श्वापद श्रेणि से भयंकर और विकट
कादम्बरी नामक अटवी है। वहाँ कलि नामक एक बड़ा पहाड़
है जिसके नीचे के भू-भाग मे कुण्ड नामक सरोवर है। इन उभय
नामो को मिलाकर यह स्थान कलिकुण्ड नाम से प्रसिद्ध हो गया
और श्री पार्श्वनाथ भगवान के चरणो से पवित्र होकर तीर्थरूप में
प्रख्यात हुआ।
आगे कोई नगर मे एक वामन व्यक्ति रहता था जिसकी राजा
आदि सभी लोग स्थान-स्थान पर हँसी उडाते थे। वह उद्विग्न
होकर आत्मघात करने की इच्छा से वृक्ष पर लटकने लगा तो
सुप्रतिष्ठित नामक मित्र श्रावक ने उसे मना करते हुए कहा—
महाभाग ! व्यर्थ मरने से कोई लाभ नही, यदि सौभाग्य, आरोग्य
और रूप चाहते हो तो अहिंसा-संयम-तप रूप जैनधर्म का आराधन
करो ! वह उसे गुरु महाराज के पास ले गया और उनके धर्मोपदेग
से शुद्ध श्रावक वनाया। वह अनेक प्रकार के तप करके उच्च देह-
धारी वनने का नियाणा करके उस अटवी मे महावलवान यूथा-
धिपति महीधर नामक हाथी हुआ।
एक वार भगवान पार्श्वनाथ छद्मस्थावस्था में विचरते हुए
कुण्ड के पास कायोत्सर्ग स्थित रहे। महीधर हाथी भी जलपान
करने के लिए सरोवर पर आया और प्रभु को देख कर जातिस्मरण
को प्राप्त हुआ। उसने सोचा—मैंने अज्ञान से धर्म की विराधना कर
के पशु-योनि प्राप्त की, अब इन देवाधिदेव की पूजा कर अपना
जन्म सफल करूँ ! उसने कमलो से पार्श्वनाथ भगवान की पूजा
की और अनशन ले कर महर्द्धिक व्यन्तर देव उत्पन्न हुआ। यह
वृत्तान्त जब चम्पानगरी के राजा करकण्डु ने सुना तो वह विस्मय