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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 442 में से

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पृष्ठ 337

२५४ विविध तीर्थ-कल्प

किसी ने रेखा का उल्लघन नही किया । योगी ने उदास हो कर
दूसरा प्रयोग प्रारम्भ किया । उसने कदलीपत्र पर नालिका मे से
एक साँप छोडा जिससे वह पत्र तुरन्त भस्म हो गया । दुष्ट योगी
ने कहा—सुनो लोगो, यह रक्ताक्ष पन्नग शीघ्र अन्त करने वाला
है। यह कहते हुए महाजनो के देखते-देखते सर्प को छोड़ा । फिर
दूसरे सर्प को छोडा जो उसका वाहन हो गया । योगी द्वारा प्रेरित
वह सिहासन पर चढने लगा । आचार्य महाराज तो स्वस्थचित्त से
ध्यानारूढ हो गए । सब लोग हाहाकार करने लगे और योगी
मुस्कुराने लगा । गुरु महाराज के माहात्म्य से वह दृष्टिविष सर्प
हतप्रभ हो गया । तप के प्रभाव से एक शकुनिका आई और उसने
सर्प युगल को उठा कर तुरन्त नर्मदा-तट पर छोड दिया । योगी
दीनतापूर्वक गुरु महाराज के चरणो मे गिर कर निरहकार हो
कर चला गया । सघ को अपार हर्ष हुआ । राजा ने महोत्सव-
पूर्वक गुरु महाराज को स्वस्थान पहुँचाया ।
उसी रात्रि मे एक देवी ने आकर कहा—भगवन् इस सामने
वाले वट वृक्ष पर रहने वाली यक्षिणी ने आपकी धर्मदेशना सुनी,
वही मैं वहाँ से मर के कुरुकुल्ला देवी हुई हूँ । मैंने ही शकुनिका
बन कर साँपो को हटाया है । गुरु महाराज ने कुरुकुल्ला-स्तव की
नव्य रचना की जिसके पाठ द्वारा भव्यजन साँपो को दूर कर
सकते हैं । गुरु महाराज ने पारण की ओर विहार किया ।
उस समय आरासण गाँव मे गोगा मंत्री का पुत्र पासिल
नामक श्रावक रहता था जो पवित्र आशय वाला, पर निर्धन था ।
एक बार वह घृत-तेल आदि विक्रय करने के लिए पाटण गया ।
जब वह गुरु महाराज को वदन करने आया तब छाडा की पुत्री
हासी ने उपहासपूर्वक उसे कहा—यह जो ९९ लक्ष स्वर्णमुद्रा के
व्यय से राजा ने मन्दिर बनवाया है, वैसा तुम्हे भी बनाने की