विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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पूर्वक सोत्साह प्रभु वन्दनार्थ आया । भगवान तो विहार कर चुके
थे अत मन मे विषाद ला कर जिनदर्गन न पाने पर आत्म-निन्दा
व हाथो की प्रगसा करने लगा । राजा ने वहाँ जिनालय बनवा
कर नौ हाथ प्रमाण की पार्श्वनाथ-प्रतिमा स्थापित की ।
कुछ लोग कहते हैं कि धरणेन्द्र के प्रभाव से वहाँ तत्काल नौ
हाथ प्रमाण वाली पार्श्वनाथ प्रतिमा प्रगट हुई, राजा ने प्रमुदित
चित्त से पूजन कर उस अपने बनवाए हुए मन्दिर में हाथी की
प्रतिमा भी स्थापित की । वह व्यन्तर देव लोगो के मनोवाञ्छित
पूर्ण करने लगा जिससे कलिकुण्ड तीर्थ की प्रसिद्धि हुई । राजा
करकण्डु भी नानाविध भक्ति द्वारा परमप्रभावक श्रावक के रूप मे
प्रसिद्ध हुआ । व्यन्तर देव भी प्रभु-भक्तिरत रह कर अनुक्रम से
सद्गतिभाजन होगा ।
श्री अन्तरिक्ष तीर्थ-श्रीपाल राजा
जिनके अग स्पर्श से पवित्र जल का पान करने से श्रीपाल
राजा कुष्ठरोगरहित हुआ, वे श्री पार्श्वनाथ भगवान भव्य
प्राणियो के लिए कल्याणकारी हो ।
एक वार रावण द्वारा अपने निजी कार्य के लिए नियुक्त
मालि और सुमालि विद्याधर विमान मे आरूढ हो कर कही जा
रहे थे । उन्हे जिनपूजा किए विना भोजन न करने का दृढ नियम
था किन्तु जिन-प्रतिमा घर पर भूल गए । भोजन का समय होने
पर पवित्र वालुका के कणो से पार्श्वनाथ-प्रतिमा निर्माण कर पूजा
की और जाते समय उस प्रतिमा को सरोवर मे स्थापित कर दी ।
दिव्य प्रभाव से वह प्रतिमा स्थिर हो गई और उसके प्रभाव से
उस तालाब का जल सर्वदा निर्मल और अखूट रहने लगा ।
एक वार विगिल्लपुर मे श्रीपाल नामक राजा हुआ जिसका
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