विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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स्पृहा है ? पासिल ने कहा—बहिन ! मेरे जैसे से यह कार्य होना
कठिन है, क्या बालक मे मेरु पर्वत तोलने की शक्ति कभी होती
है ? फिर भी यदि मन्दिर बनवाऊँ तो तुम वहाँ अवश्य आना ।
पासिल अपने स्थान गया और उसने गुरु महाराज की बताई
हुई विधि से अम्बा देवी का आराधन किया । दस उपवास होनेपर
देवी ने प्रगट होकर कहा—मेरे प्रभाव से सीसे की खान चाँदी
की हो जायगी । तुम उसे ग्रहण करके प्रासाद का निर्माण कराओ ।
उसने देवी के आदेश से नेमिनाथ जिनालय का निर्माण-कार्य
प्रारम्भ कर दिया ।
एक बार उस गाँव मे कोई गुरु महाराज आये । उन्होंने
पासिल से पूछा—चैत्य का कार्य निर्विघ्नता से चलता है ? उसने
कहा—देव ! गुरु के प्रसाद ठीक से चलता है । अम्बिका देवी ने
सोचा, यह तो कृतघ्न है, मेरा उपकार नही मानता ! सीसे की
खान की चाँदी से चैत्य शिखर तक काम चला बाद मे बन्द हो गया ।
पाटण से गुरु महाराज और उस बहिन को बुलाकर नेमिनाथ
जिनालय की प्रतिष्ठा कराई । उस बहिन ने भाई से वस्त्र याचना-
पूर्वक मन्दिर का मण्डप बनवाने की आज्ञा माँगी । सेठ के स्वीकार
करने पर उसने नौ लाख रुपये व्यय करके मेघनाद मण्डप
बनवाया । फिर दूसरे व्यापारियो ने भी वहाँ मन्दिर बनवाए ।
इस प्रकार आरासण एक तीर्थरूप मे प्रसिद्ध हो गया ।
अन्य ग्रन्थ मे भी कहा है कि—गोगा मंत्री के चतुर और
श्रद्धालु पुत्र पासिल ने श्री नेमिनाथ भगवान का यह उत्तुंग जिनालय
निर्माण कराया जिसकी प्रतिष्ठा श्री मुनिचन्द्रसूरि के शिष्य वादीन्द्र
श्री देवसूरि ने करवाई ।
कलिकुण्ड तीर्थोत्पत्ति
महत्तर माहात्म्य लक्ष्मी से मनोहर श्री पार्श्वनाथ प्रभु को