विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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सर्वाङ्ग कुष्ठव्याधिपीडित था। राजवैद्यो ने सैकडो ओषधि-
प्रयोग किए पर उसके कोई लाभ नही हुआ। एक बार राजा उस
सरोवर पर क्रीडा करने लगा और थक कर तृषातुर होने से जल-
पान कर के विश्राम करने लगा। उसने हाथ-पैर धोये और अपने
को स्वस्थ अनुभव कर अपने नगर आया राजा के शरीर के अव-
यव एकदम कचन जैसे हुए देख कर प्रात काल रानी ने साश्चर्य
इसका कारण पूछा तो राजा ने सरोवर के जल से प्रक्षालन करने
और जलपान करने का वृत्तान्त कहा। रानी ने कहा—यहाँ
अवश्य कुछ सप्रभाव है ! राजा ने विस्मयपूर्वक उस सरोवर मे
स्नान किया जिससे राजा विल्कुल निरोग हो गया। तदनन्तर
धूप-दीप नैवेद्यादि चढा कर प्रार्थना की कि जो देव हो वे प्रगट
हो। राजा रात्रि मे वही सो गया। ब्राह्ममुहूर्त्त मे अधिष्ठाता देव ने
आ कर कहा—यहाँ भावि तीर्थङ्कर श्री पार्श्वनाथ की प्रतिमा है,
जिसके प्रभाव से तुम्हारा कुष्ठ रोग नष्ट हो गया है ! इसलिए
अब सात दिन पूर्व जन्मे हुए बछडो को रथ मे जोत कर भगवान
को विराजमान कर स्वय सारथी वन कर शीघ्र ले जाओ। जहाँ
भी पीछा मुँह कर के देखोगे वही भगवान स्थिर हो जायँगे।
राजा ने उठकर देव के निर्देशानुसार किया। कुछ दूर जाने
पर राजा के मन मे सन्देह हुआ कि भगवान आते हैं कि नही ?
उसने मुडकर देखा तो प्रतिमा वही आकाश मे स्थिर हो गई, रथ
आगे निकल गया। राजा ने सविस्मय वही पर श्रीपुर नामक
नगर बसाकर विशाल चैत्यालय मे प्रतिष्ठित की। स्थविर कहते
हैं कि आगे घटयुगलयुक्त पनिहारी उसके नीचे से निकल सकती
थी। राजा श्रीपाल ने चिरकाल उस प्रतिमा की पूजा कर अभीष्ट
प्राप्त किया और क्रमश. मोक्ष आवेगा। आज भी भगवान की
प्रतिमा और पृथ्वी के बीच कुछ अन्तर है, ऐसा वहाँ के अधिवासी
एव अन्य लोग कहते हैं।