विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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इस प्रकार जैसे श्रीपाल राजा अतरिक्ष पार्श्वनाथ की पूजा
करके निरोग हुआ वैसे ही हे भव्य जीवो ! तुम लोग भी जिनेश्वर
की आराधना करके परम सुखी वनो ।
माणिक्यदेव (कुल्पाक)
माणिक्य की जिनेन्द्र-प्रतिमा का पूजन करने से शकर राजा
की भाँति श्री देवाधिदेव का अर्चन करने से दुर्वार महामारि आदि
उपसर्ग नष्ट होते हैं ।
भरत महाराजा ने अष्टापद के चैत्य मे वर्णादि युक्त सर्व
तीर्थंकरो की प्रतिमाएँ स्थापित की। वहाँ उदीयमान किरणो से
युक्त एक नीलरत्न की आदिनाथप्रतिमा भी उसने पृथक् स्थापित की
थी इसलिए उस प्रतिमा को लोग माणिक्यदेव नाम से पहिचानते
हैं वह अत्यन्त प्रभावशाली है । कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि—
“भरतेश्वर की मुद्रिका मे स्थित पाचरत्न की यह प्रतिमा बनाई
हुई है इस प्रतिमा की पूजा वहाँ चिरकाल पर्यन्त हुई ।
एक बार कितने ही विद्याधर वहाँ यात्रार्थ आये और इस
अपूर्व प्रतिमा को प्रसन्नतापूर्वक दक्षिण श्रेणी मे ले गए । वे वहाँ
प्रतिदिन पूजा करने लगे । एक बार नारद ऋषि वहाँ अतिथि रूप
मे आये और प्रतिमा को देखकर पूछा—यह प्रतिमा तुम्हारे यहाँ
कैसे ? उन्होने कहा—हम इस प्रतिमा को वैताढ्य पर्वत से लाए
हैं, इनके शुभागमन से हमारे राज्य-राष्ट्रादि से हमारी वृद्धि हुई
है । मेरु पर्वत पर शास्वत चैत्यों को वन्दनार्थ आने पर नारद ने
इन्द्र से इस प्रतिमा का माहात्म्य बतलाया, उसने देवो द्वारा उसे
देवलोक मे मगवा ली और अत्यन्त भक्तिपूर्वक वहाँ कई सागरोपम
पर्यन्त इन्द्रादि देवो ने उसकी पूजा की ।
भरतक्षेत्र मे जब त्रैलोक्यकटक राक्षसराज रावण हुआ,