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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 442 में से

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पृष्ठ 343

२६० विविध तीर्थ-कल्प
उसके मन्दोदरी रानी थी। एक बार नारद के मुँह से उस प्रतिमा
का माहात्म्य सुनकर उसने रावण को प्रेरित किया। रावण ने
शक्रेन्द्र की आराधना की। शक्रेन्द्र ने प्रसन्न होकर मन्दोदरी
को वह प्रतिमा दी जो उसकी त्रिकालपूजा करने लगी।
एक वार रावण ने सीता का अपहरण किया और आता-
पुत्रादि के निवारण करने पर भी उसे न छोडा तो उस प्रतिमा के
अधिष्ठायक देव ने कहा—लका और लकापति का नाश होगा।
यह ज्ञात कर मन्दोदरी ने उस जिन-प्रतिमा को समुद्र में स्थापन
कर दी।
अथ कर्णाटक देश के कल्याणनगर में जिनेश्वर के चरण-
कमल में अनुरक्त मधुकर की भाँति अभग भाग्यशाली राजा
शकर हुआ। एक बार किसी मिथ्यादृष्टि देव ने वहाँ महामारी
फैला दी। राजा और मन्त्री आदि को चिन्तित देखकर पद्मावती
देवी ने स्वप्न में कहा कि—समुद्र में स्थित माणिक्य स्वामी की
प्रतिमा यदि यहाँ नगर में आवे तो शीघ्र उपद्रव शान्त हो जाय।
उपाय हस्तगत होने से शकर राजा ने भक्ति युक्ति से लवणसमुद्र
के अधिष्ठाता देव को प्रसन्न किया उसने मन्दोदरी से सम्बन्धित
उस प्रतिमा को राजा को समर्पित कर दिया। उसने कहा—तुम
अपनी पीठ पर भगवान को लेकर सानन्द जाओ, परन्तु जहाँ भी
सन्देह करोगे भगवान वही स्थिर हो जाएँगे।
देव के अदृश्य हो जाने पर राजा शकर अपनी पीठ पर
भगवान को विराजमान कर सैन्यसहित चला। जब वह तिलंग
देश के कुलपाक नगर में पहुचा तो प्रतिमा का भार अनुभव नही
होने से मन में सन्देह हो गया कि भगवान आते हैं कि नही ?
माणिक्य स्वामी वही स्थिर हो गए। राजा ने कुलपाक नगर में
एक सुन्दर जिनालय बनवाकर निर्मल मरकतमणिमय विम्ब को