विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
समवशरण रचना-कल्प १९९
हुए जो जिनेश्वरदेव कहते हैं उसे यदि सारी आयु तक (आजीवन)
सुनना पडे तो वे सुनने की इच्छा रखते हैं।
साढे बारह लाख और उतने करोड सोनइयो का प्रीतिदान
भगवान का आगमन कहने वाले को चक्रवर्ती देते हैं।
वासुदेव इतने ही प्रमाण के रजत का दान देते हैं। लाख और
हजार का दान मण्डलीक राजा (प्रान्तपति) देते हैं।
इभ्य—श्रेष्ठी आदि भी जिनेश्वर भगवान का आगमन सुनकर
नियुक्त पुरुषो को अपनी-अपनी भक्ति और वैभव के अनुसार दान
देते हैं।
राजा, युवराज, अमात्य द्वारा शासित प्रवर जनपद मे कोई
दुर्वलाखण्डित पूजायोग्य आढक कलमा शालि विना तुले अखण्ड
फलक जैसे वलि किए जाते हैं, जिनसे देवता भी स्तब्ध हो जाते हैं।
पूर्व द्वार से एक साथ ही पूजा की जाती है। तिगुनी पूर्व द्वार
पर उसकी आधी अन्य द्वार स्थित देवो को दी जाती है।
आधी-आधी अधिपतियो की और अवशेष याचक जनो की
होती है। यह सर्व रोगो का प्रशमन करने वाली होती है, छः
मास तक कोई व्याधि नही आती।
पादपीठ पर राजोपनीत सिंहासन पर बैठे हुए ज्येष्ठ गणधर
अथवा दूसरे गणधर दूसरे प्रहर मे देशना देते हैं।
श्री जिनप्रभसूरि ने यह समवशरण रचना-कल्प सक्षेप से
सूत्रानुसार लिखा है। इसे पढना चाहिए।
श्री समवशरण रचना-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ सख्या
४३ हैं।
४७. कुडुँङ्गेश्वर नाभेय (ऋषभ) देव-कल्प
श्वेताम्बराचार्य चारणमुनि वज्रसेन द्वारा चक्रावतार तीर्थ
मे प्रतिष्ठित श्री ऋषभदेव जयवन्त हो ।
विशेष तेजस्वी भगवान कुडुङ्गेश्वर ऋषभदेव का सङ्क्षिप्त कल्प
देखकर कहता हूँ ।
पूर्व काल मे लाट देश मण्डन भरोच नगर के अलङ्कार
शकुनिकाविहार स्थित श्री वृद्धवादीसूरि ने "जो जिससे हारेगा
वह उसका शिष्य होगा" इस प्रतिज्ञा को लेकर दक्षिणापथ से
आये हुए कर्णाट भट्ट दिवाकर को जीत कर उसे व्रत ग्रहण
कराया, सिद्धसेन दिवाकर नाम रखा गया । फिर कितने ही दिनो
मे उसने समस्त आगमो का अध्ययन कर लिया । एक दिन
उन्होने—सभी आगमो को मैं संस्कृत मे कर दूंगा—कहा तो
पूज्यश्री ने कहा—क्या तीर्थङ्कर-गणधर संस्कृत नही जानते थे जो
अर्द्धमागधी मे आगमो को कहा । ऐसा बोलने से तुम्हे प्रायश्चित्त
लगा है । तुम्हे क्या कहा जाय, तुम स्वय जानते हो ।
उन्होने विचार कर कहा—भगवन् ! मौन धारण करके बारह
वर्षीय पाराञ्चित नामक प्रायश्चित्त लेकर रजोहरण मुखवस्त्रिकादि
साधु लिंग को गुप्त रखकर अवधूत के वेश मे विचरण करना
आवश्यक है । गुरु महाराज के मुख से—"यह उपयुक्त है" ऐसा
सुन कर ग्राम नगरादि देशान्तर मे पर्यटन करते हुए बारहवे वर्ष
उज्जैन मे कुडुङ्गेश्वर देवालय मे शेफालिका के कुसुम से रञ्जित वस्त्र
धारण किए हुए आकर बैठ गए । लोगो द्वारा "देव को क्यो नही
नमस्कार करते हो ?" ऐसा कहने पर भी कुछ नही बोले । इस
प्रकार जन-परम्परा से सुनकर सबको ऋण मुक्त करके अपना
कुडुंगेश्वर नाभेयदेव-कल्प २०१
सवत्सर प्रवर्त्तन करने वाले महाराजा श्री विक्रमादित्यदेव ने
आकर कहा—क्षीर चाटने वाले भिक्षु ! क्या तुम देव को नमस्कार
नही करते ? तब उन्होने कहा—मेरे नमस्कार करने से देव का
लिंग भग्न हो जायगा ! जो आपके अप्रीति का कारण हो जायगा ।
राजा ने कहा—होने दो । आप नमस्कार तो कीजिये । उन्होने
कहा—तब सुनिये । फिर उन्होने पद्मासनस्थ होकर द्वात्रिंशद्
द्वात्रिंशिकाओ से देव की स्तुति करना प्रारम्भ किया । यथा—
“अव्यक्त, प्रव्याहत, विश्वलोक स्वरूप अनादि-मध्य-अन्त
रहित पुण्य-पापविहीन स्वयभू और सहस्रनेत्रभूत अनेक रूप वाले
एकाक्षर भावलिंग को · ।
इत्यादि प्रथम श्लोक से ही प्रासाद स्थित शिखि के शिखाग्र
से धुआँ निकलने लगा । तब लोगो ने कहा—'आठ विद्याओ के
अधीश्वर ये कालाग्नि रुद्र हैं । भगवान अपने तीसरे नेत्र की अग्नि
से इस साधु को भस्म कर डालेगे !” इतने मे ही बिजली के तेज
समान तडतडाहट करते हुए प्रथम ज्योति निकलकर अप्रतिचक्रा—
चक्रेश्वरी देवी द्वारा मिथ्यादृष्टि देवता को ताड्यमान करते लिंग-
मूल से दो टुकडे होकर पद्मासनस्थ स्वयभू भगवान ऋषभदेव
प्रादुर्भूत हुए ।
इस धर्मप्रभावना द्वारा पाराञ्चित समुद्र से उत्तीर्ण होकर
उन्होने रक्ताम्बर त्याग कर रजोहरण मुखवस्त्रादि युक्त साधुलिंग
मे प्रकट होकर महाराजा को धर्मलाभ आशीर्वाद दिया । “दूर से
ही हाथ उठाए हुए आशीर्वादरूप 'धर्मलाभ' बोलने पर आचार्य
सिद्धसेन को राजा ने करोड दिए ।” फिर प्रभु से क्षमा-याचना
कर राजा ने स्तुति की ।
पाराञ्चित प्रायश्चित वहन करने वाले सिद्धसेन दिवाकराचार्य
प्रतिष्ठित श्रीमान् कुडुङ्गेश्वर नाभिराजाङ्गज ऋषभदेव जिनेश्वर
आपका कल्याण करे ।
श्व or श् + व?
Look at line 11: "श्वेताम्बरोपासक" - it is 'श्वेताम्बरोपासक'.
Wait, if you read Hindi, would someone transcribe it as "वनाकर" or "बनाकर"?
Wait, why would a Hindi text write "वनाकर" and "वनाया"?
Wait, look at line 4:
"स्वीकार" -> 'स्व' has a distinct 'व'.
Look at "वसाड" in line 6: 'व' has a loop.
Is "वनाकर" a typo by the typesetter who used 'व' for 'ब'?
Yes! In many Hindi presses of the early 20th century (especially in Gujarat/Rajasthan, like Ahmedabad or Bombay presses printing Hindi), typesetters often confused 'व' and 'ब', or the font didn't distinguish them well, OR they literally set 'व' instead of 'ब' because Gujarati/Marwari speakers often pronounce/write 'व' and 'ब' interchangeably!
Wait, look at:
"दार्शनिक लोगो को श्वेताम्बर वनाकर मिथ्यादृष्टि देव-गुरु से"
"परिमूक्त कर सारी पृथ्वी को जैन मुद्राङ्कित वनाया।"
Yes, it literally has 'वनाकर' and 'वनाया'!
Wait, let's provide the exact characters printed, or if it's 'व', write 'व' (or 'ब'? Wait, the
४८ व्याघ्री-कल्प
जो जीव-जन्तु आराधक होते हैं, उनका कीर्त्तन करने से
निश्चय ही कल्याण होता है, यह हृदय मे आलोचना-विचार करके
मै किञ्चित् रूप मे व्याघ्री-कल्प कहता हू ।
श्री शत्रुञ्जय पर आदिनाथ चैत्य दुर्ग के प्रतोली द्वार को रोक
कर कभी कोई व्याघ्री आ बैठी । उसे निश्चलाङ्गी देखकर उससे
आतङ्कित चिन्तित मन वाले श्रावक लोग जिनेश्वर को नमन
बाहर से ही कर लेते, पर आगे नही जाते ।
कोई साहसी ठाकुर उसके पास गया, पर वह न तो उसके प्रति
आकृष्ट हुई और न उसको किञ्चित् भी मारने की चेष्टा की ।
तब उस क्षत्रिय ने कही से मास लाकर उसके आगे रखा, पर
उसने उस ओर आँख उठाकर भी नही देखा ।
अब निर्भय होकर श्रावको ने भी उसके आगे आकर क्रमश˙
उत्तम भक्ष्य और पानी रखा । तो भी उसे अनिच्छुक देखकर
जनता ने हृदय मे सोचा—अवश्य ही इसने जातिस्मृति पाकर
तीर्थ पर अनशन स्वीकार किया है ।
इसका तिर्यंच भव भी प्रससनीय है, जिसने चारो प्रकार का
आहार छोड दिया । यह एकाग्र नेत्रो से देव को ही निरीक्षण
करती है ।
साधर्मी की बुद्धि से श्रावको ने उसकी चन्दन-पुष्पादि से पूजा
की और संगीत उत्सवादि मे भावना-भक्ति मे लग गए ।
निरागार प्रत्याख्यान करवाया और हर्षपूर्वक मन से ही
उसने श्रद्धा करके उसे स्वीकार किया ।
२०४ विविध तीर्थ-कल्प
इस प्रकार वह तीर्थ के माहात्म्य से ही गुद्ध वासना-भावना
समृद्ध हुई । सात आठ दिन अनगन पालन कर पापो को नष्ट कर
वह स्वर्ग गई ।
अगर-चन्दन मे उसके गरीर का अग्नि-सस्कार करके प्रतोली
के दक्षिण तरफ उसकी पाषाणमूर्त्ति स्थापित की ।
तीर्थचूडामणि श्री विमलाचल की चिरकाल जय हो, जहाँ
तिर्यंच भी आराधकाग्रणी हुए ।
श्री जिनप्रभसूरि ने यह व्याघ्री-कल्प रच कर जो पुण्य उपार्जन
किया वह श्रीसघ को सुखकारी हो ।
यह व्याघ्री-कल्प समाप्त हुआ, इसकी ग्रन्थ सख्या १४ है ।
४९. अष्टापदगिरि-कल्प
अष्टापद-स्वर्ण के समान देह की कान्ति वाले भवरूपी हस्ती
के लिए अष्टापद के समान श्री ऋषभदेव को नमस्कार करके
अष्टापद गिरि का कल्प सक्षेप से कहता हूँ ।
इसी जम्बूद्वीप नामक द्वीप मे दक्षिण भरतार्द्ध मे भारतवर्ष में
नौ योजन चौडी और बारह योजन लवी अयोध्या नामक नगरी
है । यही श्री ऋषभ-अजित-अभिनदन-सुमति-अनन्तादि जिनेश्वरो
की जन्मभूमि है । इस के उत्तर दिगा मे बारह योजन पर अष्टा-
पद नामक कैलाग अपर नाम वाला रम्य गिरिश्रेष्ठ आठ योजन
ऊँचा, स्वच्छ स्फटिक गिलामय है । इसी से लोगो मे धवल गिरि
अष्टापदगिरि-कल्प [२०५]
नाम भी प्रसिद्ध है। आज भी अयोध्या के निकटवर्ती उड्डयकूट पर
स्थित होने पर आकाश निर्मल हो तो उसकी धवल शिखर
पंक्तियाँ दीखती हैं। फिर वह महासरोवर, घने सरस वृक्ष, पानी
के पूर वाले झरनो से युक्त, परिपार्श्व मे सचरण करते जलधर,
मत्त मोर आदि पक्षियो के कोलाहल युक्त, किन्नर-विद्याधररमणियो
से रमणीक, चैत्यो को वदन करने के लिए आने वाले चारण-
श्रमणादि लोगो के दर्शनमात्र से भूख प्यास हरण करने वाला,
निकटवर्त्ती मानसरोवर विराजित है। इसकी उपत्यका मे साकेत-
वासी लोग नाना प्रकार की क्रीडाएँ कराते हैं।
इसी के शिखर पर ऋषभदेव स्वामी चतुर्दश भक्त से पर्यंकासन
स्थित, दस हजार अणगारो के साथ माघी कृष्ण त्रयोदशी के दिन
अभिजित नक्षत्र मे पूर्वाह्लि मे निर्वाण प्राप्त हुए। शक्रादि ने वहाँ
स्वामी का देह-सस्कार किया। पूर्व दिशा मे स्वामी की चिता,
दक्षिण दिशा मे इक्ष्वाकुवंशियो की और पश्चिम दिशा मे शेष
साधुओ की थी। उन तीन चितास्थानो पर देवो ने तीन स्तूप
किये। भरत चक्रवर्ती ने स्वामी के सस्कार के निकटवर्ती भूतल
पर एक योजन लंबा, आधा योजन चौडा, तीन कोश ऊँचा सिंह-
निषद्या नामक प्रासाद रत्नोपल-वार्द्धकि रत्न के द्वारा बनवाया।
उसके स्फटिक रत्नमय चार द्वार हैं। उभय पक्ष मे सोलह रत्न
चदन कलश हैं। प्रत्येक द्वार पर सोलह रत्नमय तोरण हैं। द्वार-
द्वार पर सोलह अष्टमंगल हैं। उन द्वारो मे चार विशाल मुख्य
मण्डप हैं। उन मुख्य मण्डपो के आगे चार प्रेक्षामण्डप हैं। उन
प्रेक्षामण्डपो के मध्य भाग मे वज्रमय अक्षवाटक हैं। प्रत्येक
अखाडे के बीच मे रत्नसिंहासन हैं। प्रत्येक प्रेक्षा-मण्डप के आगे
मणिपीठिकाएँ हैं। उनके ऊपर रत्नमय चैत्य-स्तूप हैं। उन चैत्य-
स्तूपो के आगे प्रत्येक के प्रतिदिशा मे वडी विशाल पूजा-मणि-
२०६ विविध तीर्थ-कल्प
पीठिका हैं। उन प्रत्येक के ऊपर चैत्य वृक्ष है। चैत्य स्तूप के
सम्मुख पाँच सौ धनुष प्रमाण वाली सर्वांग रत्न निर्मित ऋषभ-
वर्द्धमान-चन्द्रानन-वारिषेण नामक पर्यंकासन विराजित मनोहर
गास्वत जिनप्रतिमाएँ नन्दीश्वर द्वीप चैत्य मध्य स्थित की
भाँति है। उन चैत्य-स्तूपो के आगे प्रत्येक चैत्य-पादप है। उन
चैत्य-वृक्षो के आगे मणिपीठिकाएँ है। उन प्रत्येक के ऊपर इन्द्र-
ध्वजाओ के आगे तोरण और सोपान युक्त, स्वच्छ शीतल जल से
पूर्ण, विचित्र कमल शालिनी, मनोहर दधि मुखाधार पुष्करिणी
के सदृश नन्दा पुष्करिणी है।
सिंह-निषद्या महाचैत्य के मध्य भाग मे विशाल मणिपीठिका
है। उनके ऊपर चित्र रत्नमय देवच्छदक है। उसके ऊपर नाना
वर्ण के सुगम उल्लोच हैं। उल्लोचो के अन्तर पार्श्व मे वज्रमय
अंकुश हैं। उन अंकुशो से अवलम्बित घडे मे आने योग्य आँवले
जैसे प्रमाण के मुक्ताओ के हार हैं। हार-पक्तियो मे विमल मणि-
मालिकाएँ है। मणिमालिकाओ के नीचे वज्रमालिकाएँ है।
चैत्य भित्ती में विचित्र मणिमय गवाक्ष हैं, जिनमें जलते हुए अगर-
धूप समूह की मालिकाएँ हैं।
उस देवच्छदक मे रत्नमय ऋषभादि चौवीस जिनप्रतिमाएँ
अपने-अपने सस्थान, प्रमाण और वर्ण वाली भरत चक्रवर्तीकारित
हैं। उनमे सोलह प्रतिमाएँ ऋषभ, अजित, संभव, अभिनन्दन,
सुमति, सुपार्श्व, शीतल, श्रेयास, विमल, अनन्त, शान्ति, कुन्थु,
अर, नमि और महावीर भगवान की स्वर्णमय हैं। मुनिसुव्रत और
नेमिनाथ की लाजवर्तमय है। चन्द्रप्रभ और सुविधिनाथ की
स्फटिक रत्नमय हैं। मल्लि और पार्श्वनाथ की वैडूर्यमय हैं। पद्म-
प्रभ और वासुपूज्य भगवान की पद्मरागमय हैं। उन सब प्रतिमाओ
के लोहिताक्ष प्रतिपेक पूर्ण अंक रत्नमय नख हैं। नखपर्यन्त
जावयर के जैसे लोहिताक्ष मणि रस का जो सिंचन किया जाता
अष्टापदगिरि-कल्प [पृष्ठ २०७]
है उसे प्रतिषेक कहते हैं । नाभि, केशान्तभूमि, जिह्वा, तालु,
श्रीवत्स, चुचुक, हाथ और पाँवो के तले तपनीय स्वर्णमय हैं।
नयनपद्म, कनीनिकाएँ, मगु, भौंहे, रोम और गिरके केश अरिष्ट-
रत्नमय हैं। ओष्ठ विद्रुममय हैं, दन्त स्फटिकमय हैं, गीर्षघटिका
वज्रमय हैं। अन्दर लोहिताक्ष प्रतिषेक वाली स्वर्णमय नासिकाएँ
हैं। लोहिताक्ष प्रतिषेक प्रान्त वाले अंकमय लोचन हैं। उन
प्रतिमाओ के पृष्ठ भाग मे प्रत्येक के एक-एक मुक्ताप्रवाल जाल
कस कोरट मल्ल दाम वाली, स्फटिक मणि-रत्न के दण्ड वाली,
श्वेत छत्र के धारण करने वाली छत्रधर प्रतिमाएँ हैं। उनके
दोनो ओर प्रत्येक उठाए हुए मणिचामरो वाली रत्नमयी चामर-
धारिणी प्रतिमाएँ हैं। प्रतिमाओ के आगे दो-दो नागप्रतिमाएँ,
दो-दो यक्षप्रतिमाएँ, दो-दो भूतप्रतिमाएँ, दो-दो कुण्डधारिणी
प्रतिमाएँ सर्वाङ्गोज्ज्वल रत्नमयी कृताञ्जलि हो पर्युपासना करती
हैं। तथा देवछंदा मे चौवीस रत्न घण्टे, चौवीस माणिक्य दर्पण और
वैसे ही स्वर्णमयी स्थान स्थित दीपिकाएँ है। तथा रत्नकरण्डक
पुष्प चगेरियाँ, लोमहस्त, पटलिकाएँ, आभरणकरण्डक कनकमय
हैं। धूपदहनक, आरतियाँ, रत्नमय मगलदीप, रत्नमय भृगार,
रत्नमय स्थाल, सोने के प्रतिग्रह, रत्नचन्दन के कलश, रत्नमय
सिहासन, रत्नमय अष्टमङ्गल, स्वर्णमय तेल के डब्बे, कनकमय
धूपभाण्ड और स्वर्णमय कमलहस्तक हैं। ये सब प्रत्येक प्रतिमा के
आगे होते हैं। वह चैत्य चन्द्रकान्त गाल से शोभित है। ईहामृग,
वृषभ, मकर, तुरगम, नर-किन्नर, विहग, वालग, रुरु, गरभ,
चमरी, गज, वनलताओ से विचित्रित रत्नस्तम्भो से समाकुल है।
स्वर्ण के ध्वज-दण्डमण्डित पताका है। उपरिस्थित किकिणी शब्द
से मुखर ऊपर पद्मराग कलश से विराजित और गोशीर्ष चन्दनरस
के हस्तको से लांछित है। विचित्र चेष्टाओ वाली, अधिष्ठित
नितम्ब वाली माणिक्य की गालभजिकाएँ, चन्दनरस से लिप्त
२०८ विविध तीर्थ-कल्प
कलशयुग से अलंकृत द्वारदेश के उभय पक्ष मे शोभायमान हैं।
तिरछी बाँध के लटकाई हुई धूपित-सुगन्धित सुन्दर मालाएँ,
पंचवर्ण कुसुम रचित गृहतल, कर्पूर, अगर, कस्तूरी, धूपधूम-
धारित अप्सरागण संकीर्ण, विद्याधरी-परिवृत, आगे-पीछे और
पार्श्व मे चारु चैत्य पादपो, मणिपीठिकाओ से विभूषित भरत की
आज्ञा से यथाविधि वार्धकिरत्न के द्वारा निष्पादित है। वही
दिव्य रत्न-शिलामय ९९ भाइयो की प्रतिमाएँ बनवाईं। सुश्रूषा
करती हुई अपनी प्रतिमा भी बनवाई। चैत्य के बाहर भगवान
ऋषभदेव स्वामी का एक स्तूप और ९९ भाइयो के स्तूप करवाए।
मनुष्य लोग यहाँ आवागमन करके आशातना न करे इसलिए
लोहयंत्रमय आरक्षक पुरुष बनवाए जिससे वह अगम्य हो गया।
पर्वत की चोटियाँ भी दण्डरत्न से तोड दी, अत वह गिरिराज
अनारोहणीय हो गया। योजन-योजन के अन्तर मे मेखलारूप
आठ सीढियाँ—पदो द्वारा मनुष्यो के लिए अलंघ्य कर दिया।
जिससे अष्टापद नाम प्रसिद्ध हो गया।
फिर काल-क्रम से चैत्यरक्षण के निमित्त सगर चक्रवर्ती के
साठ हजार पुत्रो ने दण्डरत्न से पृथ्वी को खोद कर सहस्र योजन
की परिखा की। दण्डरत्न से गगातट को विदीर्ण कर जल से
पूर्ण किया। तब गगा को खाई मे भरने से अष्टापदासन्न ग्राम-
नगर, पुरादि डूबने लगे। अत उसे दण्ड-रत्न से निकाल कर
कुरु देश के बीच से, हस्तिनापुर के दक्षिण से कोशल देश के
पश्चिम, प्रयाग से उत्तर, काशी देश से दक्षिण, वत्सदेश मे दक्षिण
से मगध के उत्तर से नदी का मार्ग काटते हुए सगरादिष्ट जन्हुपुत्र
भागीरथ कुमार ने पूर्वी समुद्र मे उतार दिया। तब से गगासागर
तीर्थ हो गया।
इसी पर्वत पर ऋषभदेव स्वामी के आठ पौत्र, और वाहुबलि-
प्रमुख निनानवें पुत्र भी स्वामी के साथ सिद्ध हुए। इस प्रकार
अष्टापदगिरि-कल्प २०९
एक सौ आठ उत्कृष्ट अवगाहना से एक समय मे आश्चर्यभूत
सिद्ध हुए।
श्री वर्द्धमान स्वामी ने स्वयं कहा कि "जो मनुष्य इस पर्वत
पर स्वशक्ति से चढ कर चैत्यो की वन्दना करेगा वह इसी भव मे
मोक्ष प्राप्त होगा।" यह सुन कर लब्धिनिधान भगवान गौतम
स्वामी इस पर्वतश्रेष्ठ पर चढे। चैत्यो की वन्दना कर अशोक
वृक्ष के नीचे वैश्रमण के आगे तप से कृश अग का वखान करते हुए
स्वय उपचित गरीर वाले अन्यथा वादकारी है—ऐसे उसके
विकल्प को निवारण करने के लिए पुण्डरीक अध्ययन प्रणीत
किया। पुष्ट देह वाला पुण्डरीक भावशुद्धि से सर्वार्थसिद्ध गया
और दुर्बल शरीर वाला कण्डरीक सातवी नरक गया। यह
पुण्डरीक अध्ययन सामानिक देव वैश्रमण ने गौतम स्वामी के मुख
से सुनकर अवधारित किया। वे ही तुववण सन्निवेश मे धनगिरि
की पत्नी सुनंदा के गर्भ मे उत्पन्न होकर दश पूर्वधर श्री वज्र
स्वामी हुए। अष्टापद से उतरते हुए गौतम स्वामी ने कौडिन्य-
दिन्न-सेवालि तापसो को पन्द्रह सौ तीन की सख्या मे दीक्षित
किया। उन्होने जनपरम्परा से "इस तीर्थ के चैत्यो की वदना
करने वाला इसी भव मे मोक्ष प्राप्त करेगा"—ऐसे वीर-वचनो को
सुनकर प्रथम, दूसरी और तीसरी मेखला सख्यानुसार कौडिन्यादि
चढे और इससे आगे जाने मे असमर्थ थे। उन्होने गौतम स्वामी
को अप्रतिहत उतरते देखकर विस्मित हो प्रतिबोध पाया और
उनके पास दीक्षित हो गए।
इसी पर्वत पर भरत चक्रवर्ती आदि अनेक महर्षि कोटि सिद्ध
हुए। वही सगर चक्रवर्ती के सुबुद्धि नामक महामात्य ने जन्हु
आदि सगर के पुत्रो के समक्ष आदित्ययशा से लेकर पचास लाख
कोटि सागरोपम काल मे भरत महाराजा के वश मे समुद्भूत
१४
२१० विविध तीर्थ-कल्प
राजर्षियो को चित्रान्तर गण्डिका से सर्वार्थसिद्धगति और मोक्ष गए
बतलाया है ।
इसी गिरिराज पर प्रवचन देवनानीत वीरमती ने चौबीस
जिन-प्रतिमाओ के भाल-स्थल पर रत्नजटित स्वर्णतिलक
चढाए । उसके तब धूसरी भव, युगलिया भव और देव भव प्राप्त
कर दमयन्ती के भव मे अन्धकार को दूर करने वाला भाल-स्थान
मे स्वाभाविक तिलक हुआ ।
इसी पर्वत पर बालि महर्षि कायोत्सर्ग करके स्थित थे ।
विमानस्खलन से कुपित रावण ने पूर्व वैर को स्मरण कर नीचे की
भूमि खोदकर, उसमे प्रविष्ट होकर अपने वैरी सहित अष्टापद
गिरि को उठाकर लवण समुद्र मे फेकने की बुद्धि से हजारो
विद्याओ का स्मरण कर पर्वत को उठाया । उन राजर्षि ने अवधि-
ज्ञान से यह जान कर चैत्य-रक्षा के निमित्त पैर के अगूठे से गिरि-
शिखर को दबाया । तब इससे सकुचितगात्र दशानन मुह से
रुधिर वमन करते हुए चीखने लगा । जिससे वह रावण नाम से
प्रसिद्ध हुआ । जब दयालु महर्षि ने छोडा तो वह चरणो मे गिर
कर क्षमायाचना कर स्वस्थान गया ।
यही लंकाधिपति ने जिनेश्वरदेव के समक्ष नाटक करते हुए
दैवयोग से वीणा की तांत टूटने पर नाट्य-भङ्ग न हो इस विचार
से अपनी भुजा की तात काट कर वीणा मे जोड दिया । इस
प्रकार वीणावादन और भक्त-साहस से सन्तुष्ट धरणेन्द्र ने तीर्थ-
वन्दना के लिए आये हुए रावण को अमोघ विजयाशक्ति रूप-
कारिणी विद्या दी ।
इसी पर्वत पर गौतम स्वामी ने सिंहनिषद्या चैत्य के दक्षिण
द्वार से प्रवेश कर पहले संभवनाथ आदि चार प्रतिमाओ को
वन्दन किया । फिर प्रदक्षिणा देते हुए पश्चिम द्वार से सुपार्श्वादि
हस्तिनापुर तीर्थ-स्तवन २११
आठ तीर्थङ्करो को, फिर उत्तर द्वार से धर्मनाथादि दश को, फिर
पूर्व द्वार से ऋषभदेव अजितनाथ जिनेश्वरद्वय को वन्दन किया ।
यद्यपि यह तीर्थ अगम्य है फिर भी स्फटिक वन-गहन समर
वालो से जो जल मे प्रतिविम्बित चैत्य के ध्वज-कलशादि देखता
है वह भाव-विशुद्धि वाला भव्य जीव वहाँ ही पूजा-न्हवणादि करते
हुए यात्रा का फल प्राप्त करता है, क्योकि भावोचित फलप्राप्ति
कही है।
भरतेश्वर से निर्माणित प्रतिमायुक्त इस चैत्य-स्तूपो की जो
वन्दन-पूजन करते हैं वे धन्य है, वे श्रीनिलय हैं।
श्री जिनप्रभसूरि द्वारा निर्मित इस अष्टापद-कल्प की जो भव्य
अपने मन मे भावना करते है, उनके कल्याण उल्लसित होते हैं।
पहले अष्टापद-स्तवन मे जो अर्थ सक्षेप से कीर्त्तन किया है वही
हमने विस्तार से इस कल्प मे प्रकाशित किया है।
श्री अष्टापद तीर्थ का कल्प समाप्त हुआ, इसकी ग्रथ सख्या
११८ है।
५०. हस्तिनापुरतीर्थ-स्तवन
जगद्वद्य श्री गान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ भगवान को
नमस्कार कर के इन्द्रो के समूह से स्तुत्य गजपुर तीर्थ की स्तवना
करता हूँ ।
भगवान ऋषभदेव के सौ पुत्रो मे कुरु नामक राजा हुआ ।
उसके नाम से यह राष्ट्र कुरुक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ । कुरु का
२१२ विविध तीर्थ-कल्प
पुत्र हस्ति हुआ जिसके नाम से यह हस्तिनापुर नगर है जो अनेक
आश्चर्य की खान है । पहले श्री आदिनाथ भगवान का प्रथम पारणा
श्रेयांस के घर इक्षुरस से हुआ और पच दिव्य प्रकट हुए । यहाँ
शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ—तीन जिनेश्वरो का जन्म
हुआ और यही सार्वभौम सम्राट होकर ऋद्धि का भोग किया ।
मल्लिनाथ प्रभु भी यहाँ समवसरे थे जिससे यहाँ श्रावको के बन-
वाये हुए चैत्यचतुष्टय अद्भुत महिमा वाले देखे जाते हैं ।
यहाँ जगत् के नेत्रो को पवित्र करने वाला अम्बिका देवी का
भवन भी यात्रियो के उपद्रव को नष्ट करने वाला भासमान है ।
उन चैत्य की दीवालो को जाह्नवी गंगा अपनी तरंगो से
प्रक्षालित करती है । उछलती हुई कल्लोले भक्तिपूर्वक स्नात्र
कराती हो ऐसा लगता है ।
सनत्कुमार, सुभूम और महापद्म चक्रवर्त्ती एव मुक्तिश्री को
वरण करने वाले पाँच पाण्डव भी यही हुए हैं ।
गगादत्त और कार्त्तिक सेठ मुनि सुव्रत स्वामी के शिष्य हुए
और विष्णुकुमार ने नमुचि को यही शासित किया था ।
कलि के दर्प को नष्ट करने वाली भक्ति और विस्तृत संगीत-
युक्त उत्तम व्यय युक्त निर्व्याज भक्ति यहाँ भव्यो ने की ।
इस पत्तन मे गान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ के चार
कल्याणक हुए और जगत् के लोगो को आनन्दकारी श्री सम्मेत-
शिखर गिरि पर निर्वाण प्राप्त हुए ।
भाद्रपद कृष्ण ७, भाद्रपद शुक्ल ९ और फाल्गुन शुक्ल २
तिथि को इनका देवलोक से च्यवन हुआ । ज्येष्ठ कृष्ण १३, वैशाख
कृष्ण १४, और मार्गशीर्ष शुक्ल १० तिथि मे जन्म हुआ । ज्येष्ठ
कृष्ण १४, वैशाख कृष्ण ५, माघ सुदि ११ तीनो के दीक्षा के दिन
हैं । पोष वदि ९ चैत्र शुक्ल ३, ऊर्ज शुक्ल १२ आपकी ज्ञानोत्पत्ति
के दिन हैं ।
कन्नानयन महावीर कल्प-परिशेष २१३
ज्येष्ठ कृष्ण १३, वैशाख शुक्ल १५, मार्गशीर्ष सुदि १० क्रमशः
आपकी निर्वाण-तिथियाँ हैं ।
आप जैसे पुरुषरत्नो की यह जन्मभूमि है जो स्पर्शमात्र से
ही श्रेष्ठ जनो के अनिष्ट को नष्ट करती है ।
स्तुति की तो बात ही क्या ? उस प्रकार के अतिशयो वाले
पुरुषप्रणीत जिनप्रतिबिम्ब (शान्ति-कुन्थु-अर) त्रयी के महोत्सवो से
शोभायमान भागीरथी के जलसग से पवित्र पृथ्वी पर तीर्थरत्न
यह गजपुर चिरकाल जयवन्त रहे ।
शक सवत् १२५३ वैशाख शुक्ल ६ को इस प्रकार यात्रोत्सव
के लिए आये हुए सघसहित श्री जिनप्रभसूरि ने यह गजपुर का
स्तवन किया ।
५१. कन्नानयन महावीर-कल्प परिशेष
श्री सघतिलक सूरि के आदेश से विद्यातिलक मुनि कन्नाणय
महावीर-कल्प का कुछ परिशेष कहते हैं ।
भट्टारक श्री जिनप्रभसूरि ने श्री दौलताबाद नगर के साहु
पेथड, साहु सहजा, ठा० अचल द्वारा कारित चैत्यो का तुर्कों द्वारा
भङ्ग किये जाते समय फरमान दिखाकर निवारण किया । श्री जैन-
शासन की अतिशय प्रभावना करते हुए, शिष्यादि अध्ययनेच्छुओ
का सिद्धान्त वाचना देते, तपस्वियो के अग और अनग प्रविष्टागम
तपादि कराते, अपने शिष्यो व दूसरे गच्छ के मुनियो को भी
प्रमाण, व्याकरण, काव्य, नाटक, अलकार शास्त्रादि पढाते,
उद्भट वादभट्ट वादवृन्दो के अनल्प दर्प को अपहरण करते हुए
उन्होने कुछ कम तीन वर्ष बिताये ।
इधर श्री योगिनीपुर-दिल्ली मे शकाधिराज श्री महम्मद गाह
किसी अवसर प्रस्तुत होने पर पण्डितो की गोष्ठी मे शास्त्र-विचार
मे सशय उत्पन्न होने पर गुरु महाराज के गुणो का स्मरण किया ।
सुलतान कहने लगा—आज यदि वे भट्टारकसभा को अलकृत
करते तो मेरे मनोगत सारे संशय दूर करने मे क्षणमात्र मे सहज
क्षमताशील थे । निश्चय ही उनकी बुद्धि से पराजित होकर
वृहस्पति भी भूमि का त्याग कर आकाश में चला गया ।
इस प्रकार राजा द्वारा गुरु-गुण-वर्णना-व्यतिकर से तत्काल
समयज्ञ दौलतावाद से आये हुए ताज मल्लिक ने पृथ्वी पर मस्तक
टिका कर निवेदन किया—महाराज ! वे महात्मा वहाँ हैं पर उस
नगर का जल नही मानने से वे बहुत कृशाङ्ग—थक गए हैं।
तब गुरुगुणप्राग्भार स्मृत पृथिवीपति सुलतान ने उसी मीर को
आदेश दिया कि—मल्लिक ! तुम शीघ्र दुवीरखाने मे जाकर
फरमान पत्र लिखाकर वहाँ भेजो ! वैसी सामग्री भी भेजो जिससे
भट्टारक पुन यहाँ आवें ।
मल्लिक ने वैसा ही किया, फरमान भेजा । क्रमश दौलता-
वाद-राजसभा मे पहुँचा । नगरनायक श्री कुतुलखान ने भट्टारक
श्री जिनप्रभसूरि जी को विनयपूर्वक शाही फरमान आने व
दिल्ली के प्रति प्रस्थान करने की सूचना दी । तब दस दिन के
पश्चात् तैयार होकर ज्येष्ठ शुक्ल १२ राजयोग मे गुरु महाराज ने
सघ सहित आने की सूचना पहुचाते हुए प्रस्थान किया ।
क्रमश स्थान-स्थान पर महोत्सवादि का प्रादुर्भाव कराते,
विषम दूषम काल के दर्प की दलन करते, अन्तरालवर्त्ति सकल
जनता के नेत्रो को कुतुहल उत्पन्न करते, धर्म-स्थानो के उद्धार
करवाते, दूर से ही दर्शनोत्कण्ठित भक्तो व स्वागतार्थ आते हुए
कल्यानयन महावीर कल्प-परिशेप २१५
आचार्यवर्गों द्वारा वंद्यमान राजभूमिमण्डन श्री अल्लावपुर दुर्ग
पहुचे। वहाँ उस प्रकार की प्रभावना का प्रकर्ष को नही सहन
करने वाले म्लेच्छो की विप्रतिपत्ति को जानकर सूरि महाराज के
शिष्योत्तम, राजसभामण्डन, गुरुगुणालंकृत देह वाले श्री जिनदेव
सूरि द्वारा विज्ञप्ति करने पर नरेश्वर ने बहुमानपूर्वक सन्मुख भेज
कर मल्लिक के प्रति फरमान के साथ सकल स्वस्तिक वस्तु विशेष
से जिनशासन की प्रभावना करते हुए डेढ मास रहकर अल्लाव-
पुर से चले। फिर सुलतान ने श्री सिरोह महानगर में गुरु महाराज
के सामने स्निग्ध देव दूष्य प्राय उत्तदश वस्त्र भेजकर अलंकृत
किया। गुरु महाराज हम्मीर वीर की राजधानी—रणथंभोर—के
निकट प्रदेश मे पहुचे। चिरोपचित भक्ति राग पूर्वक दर्शननिमित्त
को भी अमृत कुण्ड-स्थान की भाँति अपने को धन्य मानने वाले,
सामने आये हुए आचार्य-मुनि-श्रावकवृन्द से परिवृत्त युगप्रधान
प्रभु मिती भाद्रपद शुक्ल २ के दिन राजसभा मे पधारे। आनद
पूर्ण नेत्रो वाले सुलतान श्री महम्मद बादशाह ने अभ्युत्थान
आचरण पूर्वक कोमल वाणी से श्री सूरिजी से कुशल पृच्छा की।
उसने गुरु महाराज के हाथ का चुम्बन कर अत्यन्त स्नेह पूर्वक
बडे आदर के साथ उनका आदर अपने हृदय पर रखा। गुरु
महाराज ने भी तत्काल निर्मित नवीन आशीर्वाद काव्य द्वारा
नरेश्वर का चित्त चमत्कृत किया। उसने महा महोत्सव के साथ
सूरिजी को विगाल शाला वाली पौषधशाला मे भेजा। बादगाह
ने गुरु महाराज के साथ जाने के लिए प्रधान पुरुषो, हिन्दू राजाओ
और महामल्लिक श्री दोनार प्रमुखो को आदेग दिया।
हजारो वंदनार्थ चिर उत्कण्ठित और चिर दर्शन लालसा
वाले श्रावको व नागरिको ने नमस्कार किया। कौतूहल प्रकृति से
जानपद लोग भी साथ चल पडे। वन्दी वृन्द के विरुदावली,
स्तवना करते, बादगाहि प्रसादित भेरी-वेणु-वीणा-मद्दल-मृदग-
२१६ विविध तीर्थ-कल्प
पहु-पटह-शंख युक्त भुगलादि विपुल वाजित्रो से दिग्दिगत को
ध्वनित करते, विप्रवर्ग के वेदध्वनिपाठ और गन्धर्वो, सधवाओ
द्वारा मगल गाते हुए तत्काल श्री सुलतान सराय की पौषध शाला
पहुँचे । सघ के प्रधान पुरुषो ने वधामणा महोत्सव किया । सकल
सघ कारित महोत्सव सहित भाद्रपद शुक्ल ३ के दिन श्री पर्यूषण
कल्प सूत्र वाचा । गुर्वागमन प्रभावना-लेख स्थान-स्थान पर पहुंचे,
सारे देश का सघ रंजित हुआ । सैकडो राज-वन्दी, वृद्ध लोगो और
वन्दी बनाये हुए सैकडो-हजारो श्रावको को छुड़ाया । करुणापूर्वक
जैनेतर लोगो को भी कारागार से उन्मुख किया । अप्रतिष्ठित
लोगो को प्रतिष्ठा दी और दिलाई । इस तरह अनेक प्रकार से
जैन धर्म की प्रभावना की और कराई !
सूरि महाराज प्रतिदिन राजसभा मे पधार कर पण्डितो,
वादिवृन्दो पर विजय प्राप्त कर धर्म-प्रभावना करते । क्रमशः
चातुर्मास पूर्ण किया । एक दिन फाल्गुन महीने मे सुलतान ने
अपनी माता 'मग्दूम-इ-जहाँ' के दौलताबाद से आते समय चतु-
रंगिणी सेना और परिवार सहित सुसज्जित होकर स्वागतार्थ
सामने जाते हुए सूरिजी को भी साथ मे लिया । 'वडथूण' स्थान
मे माता से मिलकर वादशाह ने सबको महादान दिया और
प्रधान 'कवाहि' वस्त्र पहनाये । क्रमशः राजधानी मे महोत्सव
पूर्वक आये । गुरु महाराज को वस्त्र कर्पूरादि से सम्मानित किया ।
सूरिजी ने मिति चैत्र शुक्ल १२ के दिन राजयोग मे सुलतान
को पूछ कर शाही साईवान की छाया मे नन्दी मण्डाण कराके
पाँच शिष्यो को दीक्षा दी । मालारोपण, सम्यक्त्व धारण आदि
धर्मकृत्य कराये । थिरदेव के पुत्र ठक्कुर मदन ने व्यय किया ।
मिति आषाढ शुक्ल १० के दिन नव्य निर्मादित तेरह प्रतिमाओ
की विस्तृत समारोह पूर्वक प्रतिष्ठा की । बिम्ब-निर्माताओ ने,
विशेषकर साहु महाराज पुत्र अजयदेव ने प्रचुर द्रव्यव्यय किया ।
कन्यानयन महावीर कल्प-परिशेष २१७
एक दिन सुलतान ने गुरु महाराज को दूर से आने मे प्रति-
दिन कष्ट होता है, सोचकर स्वयमेव अपने महल के निकट अभि-
नव भवनादि से गोभित 'सराई' दे कर श्रावक सघ को वसने का
आदेग दिया । सुलतान ने स्वय उस वस्ती का नाम "भट्टारक
सराई" दिया । बादगाह ने वही भगवान महावीर स्वामी का
मन्दिर और पौषधगाला बनवाई । स० १३८९ मिती आषाढ
कृष्ण ७ के सुमुहूर्त्त मे बादगाह् के समादिष्ट गीत वाजित्र नाट-
कादि सम्पदा से प्रकटित अमित महोत्सवादि से स्वय मुलतान
के मगंल-क्रिया देते हुए भट्टारक गुरु पौषधगाला मे प्रविष्ट हुए ।
प्रीति दान से सन्तुष्ट किया । दीन अनाथ लोगो का दान से उद्धार
किया ।
एक बार मार्गसिर मास मे पूर्व देग की जय-यात्रा के निमित्त
जाते समय सुलतान ने अपने साथ गुरु महाराज को लिया ।
स्थान-स्थान पर बन्दियो को छुडा कर धर्म-प्रभावना की । मथुरा
तीर्थ का उद्धार किया । ब्राह्मणो को दानादि से सन्तुष्ट किया ।
सत्यप्रतिज्ञ गुरु महाराज को नित्य प्रवास से कष्ट होता समझ
कर सुलतान ने खोजा जहाँमल्लिक के साथ आगरा नगर से
राजधानी के प्रति वापस भेज दिया । हस्तिनापुर यात्रा के लिए
फरमान ले कर सूरि जी स्वस्थान पधारे । चतुर्विध सघ को एकत्र
कर चाहड गाह के पुत्र वोहित्य गाह को सघपति तिलक किया
और गुरु महाराज ने आचार्य आदि परिवार परिवृत श्री हस्तिना-
पुर तीर्थ की यात्रा के लिए प्रस्थान किया । स्थान-स्थान पर सघ-
पति वोहित्य ने महोत्सव किए । तीर्थभूमि मे पहुँच कर तीर्थ को
बधाया । गुरु महाराज ने वहाँ नये बनवाये हुए गान्तिनाथ-
कुन्थुनाथ और अरनाथ जिनेग्वर के विम्व और अम्विका देवी की
प्रतिमा चैत्य स्थान मे प्रतिष्ठित किए । संघ वात्सल्यादि द्वारा संघ-
२१८ विविध तीर्थ-कल्प
पति और सघ ने महोत्सव किये । भाट-भोजक आदि लोगो का
वस्त्र-भोजन-ताम्बूलादि से पूजा सत्कार किया ।
गुरु महाराज ने यात्रा से लौटते ही मिती वैगाख गुक्ल १०
के दिन समस्त दुरित नागक श्री महावीर स्वामी के विम्ब की
महोत्सव पूर्वक स्थापना की । वादशाह के बनवाए हुए मन्दिर मे
सघ के द्वारा वहाँ पूजा की जाती है । सुलतान के दिगयात्रा से
आने पर मन्दिर मे विगेप उत्सव प्रवर्त्तित होते हैं । सार्वभौम
सम्राट उत्तरोत्तर अधिकाधिक मान दे कर गुरु महाराज को
सम्मानित करता है । सूरिसार्वभौम श्री जिनप्रभसूरि की धर्म-
प्रभावना का यशपटह सर्व दिगाओ मे वजता है । राजाधिराज
के दिए हुए फरमान हाथ मे होने से श्वेताम्बर-दिगम्बर सर्व देश
मे विना किसी उपसर्ग वाधा के विचरण करते हैं । यवन सैन्य
परिभूत दिग् चक्र किये होने पर भी खरतर गच्छालकार गुरु
महाराज के प्रसाद से फरमान ग्रहण करते शत्रुञ्जय-गिरनार-
फलौदी आदि तीर्थ निर्भय-निरापद हुए । इस प्रकार के धर्मकृत्यो
से श्री पादलिप्तसूरि-मल्लवादी-सिद्धसेन दिवाकर-हरिभद्रसूरि-हेम-
चन्द्रसूरि आदि पूर्वाचार्यों को उद्योतित किया । अधिक क्या कहा
जाय, सूरिचक्रवर्त्ती गुरु महाराज के गुणो से खिचे हुए नरेन्द्र भो
सकल धर्म कार्यारम्भ मे प्रवर्त्तन करता था ।
चैत्य-वसतियो मे प्रति प्रात काल शखध्वनि वजती रहती है ।
धार्मिक लोगो द्वारा वीरविहार मे मादल, मृदङ्ग, भुगल, ताल
वजते हुए प्रेक्षणीय महापूजाएँ की जाती हैं । भगवान महावीर के
आगे भव्य लोग कर्पूर, अगर, परिमल युक्त धूप दे कर उसकी
भुगन्ध दिगमंडल मे व्याप्त करते हैं । हिन्दू राज्य के समान
सचरण करते हैं । इस पचम काल और अनार्य राज्य मे भी चतुर्थ
आरे की भाँति जो जिन-गासन की प्रभावना होती है वह गुरु-
गिक्षा का ही प्रभाव है । और तो क्या ? गुरु महाराज के चरणो