सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 284

कुडुंगेश्वर नाभेयदेव-कल्प २०१
सवत्सर प्रवर्त्तन करने वाले महाराजा श्री विक्रमादित्यदेव ने
आकर कहा—क्षीर चाटने वाले भिक्षु ! क्या तुम देव को नमस्कार
नही करते ? तब उन्होने कहा—मेरे नमस्कार करने से देव का
लिंग भग्न हो जायगा ! जो आपके अप्रीति का कारण हो जायगा ।
राजा ने कहा—होने दो । आप नमस्कार तो कीजिये । उन्होने
कहा—तब सुनिये । फिर उन्होने पद्मासनस्थ होकर द्वात्रिंशद्
द्वात्रिंशिकाओ से देव की स्तुति करना प्रारम्भ किया । यथा—
“अव्यक्त, प्रव्याहत, विश्वलोक स्वरूप अनादि-मध्य-अन्त
रहित पुण्य-पापविहीन स्वयभू और सहस्रनेत्रभूत अनेक रूप वाले
एकाक्षर भावलिंग को · ।
इत्यादि प्रथम श्लोक से ही प्रासाद स्थित शिखि के शिखाग्र
से धुआँ निकलने लगा । तब लोगो ने कहा—'आठ विद्याओ के
अधीश्वर ये कालाग्नि रुद्र हैं । भगवान अपने तीसरे नेत्र की अग्नि
से इस साधु को भस्म कर डालेगे !” इतने मे ही बिजली के तेज
समान तडतडाहट करते हुए प्रथम ज्योति निकलकर अप्रतिचक्रा—
चक्रेश्वरी देवी द्वारा मिथ्यादृष्टि देवता को ताड्यमान करते लिंग-
मूल से दो टुकडे होकर पद्मासनस्थ स्वयभू भगवान ऋषभदेव
प्रादुर्भूत हुए ।
इस धर्मप्रभावना द्वारा पाराञ्चित समुद्र से उत्तीर्ण होकर
उन्होने रक्ताम्बर त्याग कर रजोहरण मुखवस्त्रादि युक्त साधुलिंग
मे प्रकट होकर महाराजा को धर्मलाभ आशीर्वाद दिया । “दूर से
ही हाथ उठाए हुए आशीर्वादरूप 'धर्मलाभ' बोलने पर आचार्य
सिद्धसेन को राजा ने करोड दिए ।” फिर प्रभु से क्षमा-याचना
कर राजा ने स्तुति की ।
पाराञ्चित प्रायश्चित वहन करने वाले सिद्धसेन दिवाकराचार्य
प्रतिष्ठित श्रीमान् कुडुङ्गेश्वर नाभिराजाङ्गज ऋषभदेव जिनेश्वर
आपका कल्याण करे ।