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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 296

कन्नानयन महावीर कल्प-परिशेष २१३
ज्येष्ठ कृष्ण १३, वैशाख शुक्ल १५, मार्गशीर्ष सुदि १० क्रमशः
आपकी निर्वाण-तिथियाँ हैं ।
आप जैसे पुरुषरत्नो की यह जन्मभूमि है जो स्पर्शमात्र से
ही श्रेष्ठ जनो के अनिष्ट को नष्ट करती है ।
स्तुति की तो बात ही क्या ? उस प्रकार के अतिशयो वाले
पुरुषप्रणीत जिनप्रतिबिम्ब (शान्ति-कुन्थु-अर) त्रयी के महोत्सवो से
शोभायमान भागीरथी के जलसग से पवित्र पृथ्वी पर तीर्थरत्न
यह गजपुर चिरकाल जयवन्त रहे ।
शक सवत् १२५३ वैशाख शुक्ल ६ को इस प्रकार यात्रोत्सव
के लिए आये हुए सघसहित श्री जिनप्रभसूरि ने यह गजपुर का
स्तवन किया ।
५१. कन्नानयन महावीर-कल्प परिशेष
श्री सघतिलक सूरि के आदेश से विद्यातिलक मुनि कन्नाणय
महावीर-कल्प का कुछ परिशेष कहते हैं ।
भट्टारक श्री जिनप्रभसूरि ने श्री दौलताबाद नगर के साहु
पेथड, साहु सहजा, ठा० अचल द्वारा कारित चैत्यो का तुर्कों द्वारा
भङ्ग किये जाते समय फरमान दिखाकर निवारण किया । श्री जैन-
शासन की अतिशय प्रभावना करते हुए, शिष्यादि अध्ययनेच्छुओ
का सिद्धान्त वाचना देते, तपस्वियो के अग और अनग प्रविष्टागम
तपादि कराते, अपने शिष्यो व दूसरे गच्छ के मुनियो को भी
प्रमाण, व्याकरण, काव्य, नाटक, अलकार शास्त्रादि पढाते,