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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

वस्तुपाल-तेजपालमन्त्रि-कल्प १७९
कोटि सिद्ध हुए । अरनाथ भगवान के ३४ युगो तक बारह कोटि
मुनि सिद्ध हुए । मल्लिनाथ भगवान के बीस युगो तक छ कोटि
मुनि सिद्ध हुए और मुनि सुव्रत भगवान के शासन मे तीन कोटि
मुनि व नमिनाथ प्रभु के शासन मे एक कोटि मुनि सिद्ध हुए ।
इसलिए इसका नाम कोटिशिला है ।
शिर पर, ग्रीवा तक, छाती तक, उदर तक, कोटिपर्यन्त और
जघाओं तक तथा जानुपर्यन्त एव चार अगुल तक वासुदेव उसे
उठाते हैं ।
यह कोटिशिला तीर्थ त्रिभुवनजनो को सुख देनेवाला देवता
व खेचरो से पूजित है । वह भव्यजनो का कल्याण करे ।
कोटिशिलातीर्थ का कल्प समाप्त हुआ । इसमे ग्रन्थ-श्लोक
सख्या २४ अक्षर ६ हैं ।
•
४२. वस्तुपाल-तेजपालमन्त्रि-कल्प
श्री वस्तुपाल और तेजपाल दोनो भ्राता प्रसिद्ध मन्त्रीश्वर हुए
हैं, उनकी कीर्त्तन-सख्या कहता हूँ ।
पहले गुर्जर-धरामण्डन मण्डली महानगरी मे श्री वस्तुपाल
तेजपाल आदि निवास करते थे । एक बार श्रीपत्तन निवासी
प्राग्वाटजातीय ठक्कुर श्री चण्डप के पुत्र ठक्कुर श्री चण्डप्रसाद
के पुत्र मन्त्री श्री सोमकुलावतश ठक्कुर श्री आसराज के नन्दन,
कुमारदेवी के कुक्षी रूपी सरोवर के दो राजहस श्री वस्तुपाल-

१८० विविध तीर्थ-कल्प

तेजपाल श्री शत्रुञ्जय गिरनार आदि तीर्थों की यात्रा के लिए
चले । हडाला गाँव आ कर जब अपने वैभव का विचार किया तो
वह सर्वस्व तीन लाख हुआ । फिर सौराष्ट्र में दुख का आकलन
कर एक लाख पृथ्वी मे गाडने के लिए रात्रि मे एक बड़े पीपल के
नीचे खड्डा खुदवाया । उसे खोदते हुए किसी का पुराना स्वर्ण
पूर्ण गोलक कलश निकला । उसे ले कर वस्तुपाल ने तेजपाल की
स्त्री अनुपमा देवी को मान्य होने से पूछा—इस निधि को कहाँ
रखे ? उसने कहा—गिरिशिखर पर ही इसे ऊँचा स्थापित करना
चाहिए जिससे प्रस्तुत निधि की भाँति वह अन्य के अधिकार मे न
आ सके । यह सुन कर वस्तुपाल ने उस द्रव्य को श्री शत्रुञ्जय
गिरनार मे व्यय किया । यात्रा कर के लौटते समय वे धवलक्कपुर
आये ।
इसी बीच महणदेवी नामक कन्नौजपति की पुत्री पिता से
कंचुलिक खर्च मे गुजरात की पृथ्वी पा कर उसका आधिपत्य भोग
कर मृत्यु के उपरान्त वही देश की अधिष्ठात्री देवी हुई । उसने
एक दिन राजा वीरधवल को स्वप्न मे कहा कि वस्तुपाल-तेज-
पाल को राज्यचिन्तक नियुक्त करके सुख से राज्य करो ! वैसा
करने से तुम्हारे राज्य-राष्ट्र की वृद्धि होगी । यह आदेश देते हुए
अपने को प्रकट कर देवी अन्तर्धान हो गई । प्रातः काल उठ कर
राजा ने वस्तुपाल-तेजपाल को बुलाया और सम्मानपूर्वक बड़े को
स्तम्भतीर्थ व धवलक्क के राज्यो का आधिपत्य एव तेजपाल को
सर्व राज्य की व्यापार मुद्रा दी । तब वे दोनो षट् दर्शन को दान,
नाना प्रकार के धर्म स्थान बनवाने आदि सैकडो सुकृत्यो द्वारा
अपना समय बिताने लगे ।
जैसे कि उन्होने सवा लाख जिन-प्रतिमाएँ बनवाईं । अठारह
करोड छियानवे लाख द्रव्य श्री शत्रुञ्जय तीर्थ पर व्यय किया ।
बारह करोड अस्सी लाख श्री उज्ज्वयन्त पर, बारह करोड त्रेपन

वस्तुपाल-तेजपालमन्त्रि-कल्प १८१
लाख आबू पर लूणगवसही मे खर्च किये। नौ सौ चौरासी पौषध-
गालाएँ वनवाई। पाँच सौ दाँत के सिंहासन, पाँच सौ जादर के
समवशरण, सात सौ सतरह ब्रह्मगाला, सात सौ दानगालाएँ,
तपस्वी-कापालिक मठो मे सर्वत्र भोजन-दान किया। तीन हजार
दो माहेश्वरायतन, तेरह सौ चार शिखरवद्ध जिनालय, तेईस सौ
जिनालयो का उद्धार, अठारह करोड़ स्वर्ण के व्यय से तीन स्थानो
मे सरस्वती-भण्डार भरवाये। पाँच सौ ब्राह्मण प्रतिदिन वेद-पाठ
करते थे। वर्ष मे तीन वार सघ पूजा, पन्द्रह सौ श्रमण घर मे
नित्य वहोरते थे। एक हजार से अधिक तटिक-कार्पटिक प्रतिदिन
भोजन करते थे। सघपति वन कर तेरह तीर्थयात्राएँ की। प्रथम
यात्रा मे चार हजार पाँच सौ गाडे—सेज वाले (शय्यापालक),
सात सौ सुखासन, अठारह सौ वाहिनी, उन्नीस सौ श्रीकरी,
इक्कीस सौ श्वेताम्वरो व ग्यारह सौ दिगम्वरो के, साढे चार सौ
जैन गायक, तेतीस सौ वन्दीजन, चौरासी तालाव बँधाये। चार
सौ चौसठ वावडी (वापी) तीस-वत्तीस पाषाणमय दुर्ग, चौवीस
दन्तमय जैन रथ, दो हजार शाक (सागवान काष्ठ) घटित (रथ
वनवाये)। वस्तुपाल मत्री के ‘सरस्वती कण्ठाभरण’ आदि चौवीस
विरुद थे। उसने चौसठ मस्जिदे करवाई। दक्षिण मे श्रीपर्वत
तक, पश्चिम मे प्रभास तक, उत्तर मे केदार तक और पूर्व मे
वाराणसी तक उनके कीर्त्तिकलाप व्यास है। सब मिला कर तीन
सौ करोड़ चौदह लाख अठारह हजार आठ सौ मे तीन लौष्टिक
कम द्रव्य हुआ। त्रेसठ वार सग्राम मे उसने जय-पत्र प्राप्त किया।
इस प्रकार अठारह वर्ष उनका व्यापार-कार्यकाल चला।
इस प्रकार अनेक पुण्यकृत्य करते हुए कितने ही काल पर
राजा वीरधवल काल प्राप्त हुआ। तब उसके पट्ट पर उसके पुत्र
वीसलदेव को मन्त्रिश्रेष्ठो ने राज्याभिषिक्त किया। वह समर्थ होता

१८२ विविध तीर्थ-कल्प
हुआ क्रमश घमण्डी हो गया । उसने दूसरा सचिव वनाकर मन्त्री
तेजपाल को हटा दिया । यह देखकर राजपुरोहित सोमेश्वर
महाकवि ने राजा को उद्देश्य करके व्यङ्गात्मक नव्य काव्य पढा—
हे चञ्चल समीर ! महीने भर सुन्दर पाटल पुष्पो के परिमल
को वहन करती अपनी महान् शक्ति का तूने क्या प्रयोग किया हैं ?
देख तो सही—अन्धकार को दूर हटाने वाले सूर्य और चन्द्रमा
का दूर से ही तिरस्कार करके पादस्पर्श सहन करने वाली धूलि
को उनके स्थान पर स्थापित कर दिया । इत्यादि ।
उन पुरुष-रत्नो का शेष वृत्तान्त और आदि से उत्पत्ति का
स्वरूप तो लोक-प्रसिद्धि से ही जान लेना चाहिए ।
गायकवर्य सूढा के द्वारा जान करके दोनो मन्त्रिमुख्यो के
कीर्त्ति-कलापो की यह सख्या बतलायी है ।
जहाँ अर्हन्त भगवान विराजमान हो, वह तीर्थ कहलाता है
और उन दोनो मन्त्रियो के चित्त मे अर्हन्त अहर्निश बसते थे ।
इसलिए उन तीर्थरूप पुरुषश्रेष्ठो के कीर्त्तन से भी क्या कल्पकृति
व्याप्त नही है ? अर्थात् है । ऐसा विचार कर उन दोनो मन्त्री-
नायको का यह सक्षिप्त कल्प श्री जिनप्रभसूरि ने हृदय से
वनाया है ।
महामात्य श्री वस्तुपाल तेजपाल के कीर्त्तन-सख्या का यह
कल्प ग्रन्थाग्र० ५३ और अक्षर ६ अधिक है ।

४३. ढिंपुरीतीर्थ-कल्प
श्री चेल्लण पार्श्वनाथ और श्री वीर प्रभु का ध्यान करके
श्री ढिंपुरी तीर्थ का कल्प यथाश्रुत कहता हूँ। पारेत जनपद मे
महानदी चर्मण्वती के तट पर नाना प्रकार के गहरे जंगलो मे
गहन ढिंपुरी नगरी है।
इसी भारतवर्ष मे विमलयशा नामक राजा हुआ। उसके रानी
सुमंगला देवी के साथ विषय-सुख अनुभव करते क्रमश सन्तान-
युगल जन्मे। उनमे पुत्र का नाम पुष्पचूल और पुत्री पुष्पचूला
थी। उद्दण्ड, अनर्थकारी होने से लोगो ने पुष्पचूल का नाम वङ्कचूल
कर दिया। महाजनो के उपालम्भ से रुष्ट होकर राजा ने वङ्कचूल
को नगर से निकाल दिया। अपने परिजन और स्नेह वश बहिन
के साथ जाते हुए वह भीषण अटवी के मार्ग मे पड गया। वहाँ
भूख प्यास से व्याकुल अवस्था मे उसे भीलो ने देखा और अपनी
पल्ली मे ले गए। उन्होने उसे अपने पूर्ण पल्लीपति के पद पर
स्थापित कर दिया। वह ग्राम, नगर और पथिको के सार्थ को लूट
खसोट कर राज्य-पालन करने लगा।
एक वार सुस्थिताचार्य आबूसे अष्टापद यात्रा के हेतु जाते हुए
अपने शिष्यादि परिवार के साथ सिंहगुफा नामक इसी पल्ली मे
पहुचे। वर्षाकाल आया, भूमि जीवाकुल हो गई। सूरिजी ने साधुओ
के साथ आलोचना करके वकचूल से वसति माँग कर वही रह
गए। उसने पहले से ही व्यवस्था कर ली कि हमारी सीमा मे
धर्म-कथा न कहे क्योकि आपकी कथाओ मे अहिंसादि धर्म है
और उससे हम लोगो का निर्वाह नही होता। गुरु महाराज

१८४ विविध तीर्थ-कल्प

उसका कथन स्वीकार कर उपाश्रय मे ठहर गए। उसने सभी
प्रधान पुरुषो को बुलाकर कहा—मैं राजपुत्र हूँ, मेरे पास
ब्राह्मणादि आवेगे अत आप लोग पल्ली मे जीव-वध एव मास-
मदिरा का प्रसग उपस्थित न करें जिससे साधुओ को भी आहार-
पानी कल्प्य हो जायगा। उन्होने चार महीने ऐसा ही किया।
विहार का समय आया। सूरिजी ने वङ्कचूल को—"श्रमणो
और पक्षियो का वास अनियत होता है" वाक्यो द्वारा सूचित
किया। वह गुरु महाराज के साथ चला। अपनी सीमा पर पहुचा
कर विनति की—हम परायी सीमा मे प्रवेश नही करते ! सूरिजी
ने कहा—हम सीमान्तर मे आ गए, अब कुछ उपदेश देंगे।
वङ्कचूल ने कहा—मेरे से निर्वाह हो सके, ऐसा उपदेश दीजिए।
सूरिजी ने उसे चार नियम दिलाए—१ अज्ञात फल न खाना,
२ सात-आठ पाँव पीछे हट कर आघात करना, ३ पट्टरानी से
गमन नही करना, ४ कौए का मास भक्षण न करना। वह नियम
स्वीकार कर गुरु महाराज को नमस्कार कर अपने घर आ गया।
एक बार वह सार्थ पर डाका डालने के लिए गया। शकुन
न होने के कारण सार्थ नही आया, वङ्कचूल का पाथेय समाप्त
हो गया। ठाकुर लोग क्षुधा-पीडित हुए। उन्होने फला हुआ
किम्पाक वृक्ष देखा, उसके फल ग्रहण किए। वङ्कचूल ने उस फल
का नाम न जानने से उन्हे नही खाया, दूसरे सब लोगो ने खाया।
वे लोग किम्पाक फल से मर गए। वङ्कचूल ने सोचा—अहो !
नियम पालन का यह फल है। उसके बाद वह पल्ली मे अकेला
आया। रात्रि मे अपने घर मे प्रविष्ट होकर दीपक के प्रकाश मे
पुष्पचूला को पुरुष वेश मे अपनी पत्नी के साथ सोये हुए देखा।
उन पर क्रुद्ध होकर कहा—दोनो को खड्ग से मारूँगा। ऐसा
सोचकर नियम याद आ जाने से सात-आठ पाँव पीछे हट कर

ढिंपुरीतीर्थ-कल्प १८४
आघात करने के उद्दे श्य से पीछे हटा और खड्ग के खटके से जग
कर बहिन ने "वङ्कचूल जीते रहो" गव्द कहे। उसने लज्जित
होकर पूछा- यह ऐसा क्यो ? बहिन ने नट का सारा वृत्तान्त
बतलाया।
कालक्रम से वङ्कचूल के राज्य-शासन करते उस पल्ली मे
उन्ही आचार्य महाराज के धर्मऋषि धर्मदत्त नाम के दो मुनि
वर्षावास रहे। उनमे से एक के तीन मासक्षमण और दूसरे के
चार मासक्षमण तप था। वङ्कचूल आचार्य महाराज के उपदेश के
के शुभ फल अनुभव कर चुका था, अतः उसने—कृपा कर कुछ
उपदेश दीजिये—कहा। उन्होने क्लेश का नाश करनेवाला चैत्य
निर्माण कराने का उपदेश दिया। वङ्कचूल ने 'शराविका' पर्वत
समीपवर्ती उसी पल्ली मे चर्मणवती नदी के तट पर ऊँचे शिखर
वाला सुन्दर जिनालय बनवाया। उसमे श्री महावीर स्वामी की
प्रतिमा स्थापित की। वह तीर्थ के रूप मे प्रसिद्ध हो गया, चारो
दिशाओ से सघ आने लगे।
कालान्तर मे कोई व्यापारी अपनी पत्नी के साथ सर्वऋद्धि
सहित वहाँ की यात्रा के लिए चला। क्रमशः रन्ति नदी पर
आया। नौका मे बैठे हुए दम्पति ने चैत्य का शिखर देखा और
सोने के कटोरे मे कुकुम, चन्दन, कर्पूर आदि डालकर शीघ्रता से
जल मे प्रक्षेप करते हुए व्यापारी की पत्नी के हाथ से प्रमादवश
छूट कर नदी तल मे जा डूबा। वणिक ने कहा—यह करोडो के
मूल्य वाला रत्नजटित कटोरा राजा द्वारा ग्रहणक मे दिया हुआ
था, अब राजा से कैसे छुटकारा होगा ? उसने दीर्घ विचार करके
यह बात वङ्कचूल से कही ताकि यह राजकीय वस्तु मिल जाय
ऐसा प्रयत्न करे। वङ्कचूल ने उसकी खोज के लिए धीवर को
आदेश दिया, वह नदी मे प्रविष्ट होकर तल तक गया। उसने

१८६ विविध तीर्थ-कल्प
सोने के रथ मे स्थित जीवन्त स्वामी श्री पार्श्वनाथ भगवान की
प्रतिमा देखी और उस प्रतिमा के हृदय पर उस कटोरे को भी
देखा। धीवर ने कहा—ये दम्पति धन्य हैं जिनका घिसा हुआ ,
चन्दन विलेपन भगवान के हृदय पर स्थित है। धीवर ने उसे
लाकर व्यापारी को दिया, उसने भी उसे प्रचुर द्रव्य दिया।
नाविक ने विम्व का स्वरूप कहा तो श्रद्धालु वङ्कचूल ने उसे ही
प्रवेग कराके भगवत् प्रतिमा को निकलवा और स्वर्णरथ को वही
छोड दिया। भगवान ने स्वप्न मे आगे ही सूचित कर दिया था—
जहाँ डाली हुई पुष्पमाला जाकर ठहरे वहाँ प्रतिमा की शोध
करना। तदनुसार विम्व लाकर वङ्कचूल राजा को समर्पित कर
दिया। उसने श्री महावीर स्वामी विम्ब-जिनालय के बहिर्मण्डप मे
स्थापित किया और जबतक इसके लिए नया मन्दिर न बने तब
तक यही विराजमान रहे। मन्दिर तैयार होने पर उसमे स्थापित
करने के लिए राजकीय पुरुपो ने विम्व को उत्थापन करना प्रारम्भ
किया पर देवताधिष्ठान से वह विम्व नही उठा और आज तक भी
वैसे ही स्थित है।
धीवर ने पल्लीपति वङ्कचूल राजा से निवेदन किया—मैंने
नदी मे प्रविष्ट होने पर दूसरी प्रतिमा भी देखी थी, उसे बाहर
लाने का प्रयत्न करना चाहिए, पूजा होने पर ही ऐसा होता है!
तब पल्लीपति ने अपनी सभा मे पूछा—कोई इन प्रतिमाओ का
सविधान जानते हो? किसने इन्हे नदी मे रखा? यह सुन कर
पुरातत्त्वविद स्थविर ने कहा—देव! एक नगर मे पहले एक राजा
था जो परचक्र के आने पर उसके साथ युद्ध करने के लिए सैन्य
सजा कर गया। उसकी पटरानी ने अपने सर्वस्व विम्बद्वय को सोने
के रथ मे रख कर जल-दुर्ग समझ कर कोटिंबक मे डाल कर
चर्मणवती मे रख दिए। चिरकाल युद्धरत अवस्था मे किसी खल
व्यक्ति ने बात फैला दी कि राजा को शत्रु ने नष्ट कर दिया।

रानी ने यह सुन कर उस कोर्टिवक को जल के तल मे रख दिया
और स्वय मरण स्वीकार कर लिया। वह राजा जब शत्रु को
हरा कर अपने नगर मे आया और रानी के वृत्तान्त को सुन
कर ससार से विरक्त होकर भागवती दीक्षा स्वीकार कर ली।
उसमे से एक विम्व को देव वाहर लाये, वह तो पूज्यमान है,
दूसरा भी निकाला जाय ऐसा उपक्रम करना चाहिए। यह सुन
कर परमर्हन्त चूडामणि बकचूल ने उसी धीवर को विम्व निकलने
के लिए नदी मे प्रवेश कराया। उसने उस प्रतिमा को कटि प्रदेश
पर्यन्त जल-तल मे और अवशिष्ट वाह्य रहे हुए देख कर उसे
वाहर निकालने के अनेक उपाय किये पर बाहर न निकलने से
दैवी प्रभाव ज्ञात कर उसने अपने स्वामी को उसका स्वरूप निवे-
दन किया। आज भी वह वैसा ही है। सुना जाता है कि आज
भी किसी वृद्ध धीवर ने नौका स्तम्भित होने पर उसका कारण
खोजते उस स्वर्णमय रथ की एक कीलिका प्राप्त की। उसे
स्वर्णमय देख कर लोभवश सोचा—मैं इस सारे रथ को क्रमश
ग्रहण कर के धनवान हो जाऊँगा ! इससे उसे रातभर नीद नही
आई। किसी अदृश्य पुरुष ने कहा—यदि इसे वही रखोगे तो सुखी
रहोगे, अन्यथा मैं तुम्हे शीघ्र ही मार दूगा , उसने भय के मारे
उस युग-कीलिकादि को वही छोड दिया। देवाधिष्ठित पदार्थों के
प्रति कौन-सी वात सम्भव नही होती ?
सुना जाता है कि वर्त्तमान काल मे कोई म्लेच्छ हाथ में
पत्थर ले कर श्री पार्श्वनाथ प्रतिमा को तोडने के लिए उपस्थित
हुआ। उसकी भुजाएँ स्तम्भित हो गई। बहुत कुछ पूजा-विधि
करने से वह ठीक हुआ। श्री वीरप्रभु की प्रतिमा वडी है और श्री
पार्श्वनाथ प्रतिमा उसकी अपेक्षा छोटी है अतः श्री महावीर
प्रतिमा के सामने यह वालरूप देव है। इस प्रकार 'मेद' लोग

उज्जयिनी, धारा, प्रतिष्ठान (पैठण), कांची एवं दाक्षिणात्य तीर्थ कल्प

१८८ विविध तीर्थ कल्प
'चेल्लण' नाम से इसे कहते हैं। बड़े भारी माहात्म्य वाले श्री
चेल्लण पार्श्वनाथ के समक्ष उन महर्षियों ने सुवर्ण मुकुट मन्त्रा-
म्नाय भव्यों के लिए आद्यन्त व प्रकाशित की। और वह सिंह-
गुफा पल्ली कालान्तर में ढिपुरी नाम से प्रसिद्ध नगरी हुई। आज
भी वे भगवान् महावीर और वे चेल्लण पार्श्वनाथ उसी नगरी में
यात्रोत्सवादि से आराधन किये जाते हैं।
एक बार वकचूल खात डाल कर चोरी करने के लिए उज्जैन
मे किसी सेठ के घर गया। कोलाहल सुन कर वहाँ से लौट आया
और देवदत्ता नामक प्रधान गणिका के घर में प्रविष्ट हुआ।
उसने उसे कोढ़ी के साथ सोये हुए देखा। वहाँ से निकल कर नगर
सेठ के घर गया। वहाँ एक विंशोपक हिसाब मे कम हो रहा था
जिसके लिए सेठ ने अपने पुत्र को दुर्वाक्यों से फटकार कर घर से
निकाल दिया। यह देखते हुए रात बीत गई। फिर—राजकुल में
जाऊँगा—यह सोचते हुए सूर्योदय होने से पल्लीपति वकचूल ने
नगर से निकल कर गोह लेकर वृक्ष के नीचे दिन बिताया। रात्रि
मे फिर राजकीय भण्डार के बाहर से गोह के पूँछ द्वारा चढ़ कर
अन्दर प्रविष्ट हो गया। उसे राजा की रूठी हुई पटरानी ने देख
कर पूछा—तुम कौन हो ? उसने कहा—मै चोर हूँ। रानी ने
कहा—डरो मत, मेरे साथ सङ्गम करो। चोर ने कहा—तुम कौन
हो ? उसने कहा—मैं पटरानी हूँ। चोर ने कहा—तब तो तुम
मेरी माँ होती हो। कहते हुए जाने का निश्चय किया तो रानी ने
नखो से अंग विदीर्ण कर पहरेदारो को पुकार के बुलाया। उन्होने
पकड़ लिया। रानी को मनाने के लिए आये हुए राजा ने यह
दृश्य स्वयं देख लिया था। अत उसने अपने पुरुषो को कहा—
इसे ज्यादा कष्ट मत दो। उन्होने उसे रखा। प्रातःकाल राजा के
पूछने पर उसने कहा—देव ! मै चोरी करने के लिए प्रविष्ट हुआ,
पीछे आपके भण्डार मे देवी ने मुझे देख लिया। इसके आगे कुछ

[Header] टिपूरीतीर्थ-कल्प १८९

न कहने पर जानकार राजा ने प्रसन्न होकर उसे पुत्र रूप में
स्वीकार कर लिया और सामन्त पद पर आरूढ किया । वकचूल
ने राजा के द्वारा विडम्बना की जाती हुई रानी की रक्षा की ।
अब वकचूल सोचने लगा—अहो ! नियम धारण करने का भी
कैसा शुभ फल है !
एक बार राजा ने उसे कामरूप के राजा को जीतने के लिए
भेजा । वह युद्ध मे गया और उसे जीत कर घावो से जर्जरित
होकर स्वदेश लौटा ! राजा ने वैद्यो को नियुक्त कर इलाज कराया
पर घाव बढते ही गए । उन्होंने कहा—देव ! कौए के मास से यह
अच्छा होगा ।
जिनदास श्रावक के साथ वकचूल की मित्रता थी अत राजा
ने उसे बुलाने के लिए पुरुषो को भेजा ताकि मित्र के समझाने से
ये काक-मास भक्षण कर ले । राजा द्वारा बुलाए हुए जिनदास ने
अवन्ती आते हुए किन्ही दो देवियो को रोते हुए देखा । उसने
पूछा—क्यो रोती हो ! देवियो ने कहा—हमारा पति सौधर्म देव-
लोक से च्युत हो गया अत हम राजकुमार वकचूल की प्रार्थना
करती हैं, पर तुम्हारे जाने पर वह काक-मास भक्षण कर दुर्गति-
भाजन हो जायगा, इसलिए रोती है । सेठ ने कहा—मै ऐसा ही
करूँगा कि यह उसे भक्षण न करे । सेठ उज्जैन गया, राजा के
अनुरोध से उसने वकचूल से कहा—काक-मास ग्रहण करो । अच्छे
होकर प्रायश्चित कर लेना । वकचूल ने कहा—तुम जानते हो,
जिस कार्य को करके फिर प्रायश्चित लेना पडे, इससे तो उसका
आचरण पहले से ही न करना श्रेयस्कर है । कीचड को प्रक्षालन
करने से तो अच्छा है कि उसका स्पर्श न कर दूर ही रहा जाय ।
इस प्रकार राजा को निषेधकर अपने नियमपालन मे दृढ रह कर
वह मर कर अच्युत कल्प मे उत्पन्न हुआ ।

४५. चौरासी तीर्थ-नामसंग्रह-कल्प
जिन्होने पाप का निग्रह कर दिया है ऐसे पंच परमेष्ठी की
उपासना करके तत्र जानने वालो को विदित 'चौरासी तीर्थ जिन'
नाम का संग्रह करता हूँ ।
जैसे कि शत्रुञ्जय परभुवन मे दीपक के तुल्य श्री वज्रस्वामी
प्रतिष्ठित श्री आदिनाथ एवं पांडवो द्वारा स्थापित श्री मूलनायक
नन्दिवर्द्धन युगादिनाथ, श्री शांतिनाथ, पुण्डरीक, श्री कलश
प्रतिष्ठित और दूसरे श्री वज्रस्वामी प्रतिष्ठित पूर्ण कलश ।
सुधाकुण्ड जीवित स्वामी श्री शांतिनाथ और अवसर्पिणी मे भरत
क्षेत्र से प्रथम सिद्ध होने वाली माता मरुदेवी स्वामिनी ।
श्री उज्जवन्त गिरनार पर पुण्य कलश-मदन मूर्त्ति श्री नेमि-
नाथ, कच्चन वालानक मे अमृतनिधि श्री अरिष्टनेमि, पापा मठ मे
अतीत चौवीसी मे से श्री नेमीश्वरादि आठो पुण्य के निधान है ।
१ कायद्रा मे त्रिभुवन मंगल कलश श्री आदिनाथ । पारकर
देश मे आदिनाथ, अयोध्या मे श्री ऋषभदेव, कोलापुर मे वज्र-
मिट्टमय श्री भरतेश्वरपूजित भुवनतिलक श्री आदिनाथ, सोपारक
मे जीवंत स्वामी श्री ऋषभदेव प्रतिमा । नगरमहास्थान मे
श्री भरतेश्वर द्वारा कारित युगादि देव, दक्षिणापथ मे गोमटदेव श्री
बाहुबली, उत्तरापथ मे कलिंग देश मे गोमट श्री ऋषभदेव,
खंगारगढ मे श्री उग्रसेन द्वारा पूजित पृथ्बी के मुकुट श्री आदिनाथ,
महानगरी के उद्दण्डविहार मे श्री आदिनाथ, पुरिमताल मे श्री
आदिनाथ, तक्षशिला मे बाहुबलि का बनवाया हुआ धर्मचक्र ।
मोक्षतीर्थ मे आदिनाथपादुका, कुल्पाक में मन्दोदरी के देहरासर

चौरासी तीर्थनामसंग्रह-कल्प १९३
के श्री माणिक्यस्वामी ऋषभदेव । गगा यमुना के वेणी सगम पर
श्री आदिकर मण्डल तीर्थ है ।
२ अयोध्या मे श्री अजितनाथ, चन्देरी मे श्री अजितनाथ,
तारण तीर्थ की विश्वकोटिशिला पर श्री अजितनाथ, अगदिका मे
श्री अजित-शांति दो तीर्थंकर ब्रह्मेन्द्र के देहरासर के हैं ।
३ श्रावस्ती मे जागुली विद्यापति श्री संभवनाथ है ।
४ सेगमती गाँव मे श्री अभिनन्दन देव हैं । नर्मदा नदी उन्ही
के चरणो मे से निकली है ।
५ क्रौंच द्वीप, सिंहल द्वीप, हंस द्वीप मे श्री सुमतिनाथ देव
की पादुका हैं । आवुरिणि गाँव मे श्री सुमतिनाथ देव हैं ।
६ माहेन्द्र पर्वत और कौशाम्बी मे श्री पद्मप्रभ है ।
७ मथुग मे महालक्ष्मीनिर्मित श्री सुपार्श्व-स्तूप है । दशपुर
नगर मे सीता देवी के देहरासर के श्री सुपार्श्वनाथ हैं ।
८ प्रभास मे शशिभूषण श्रीचन्द्रप्रभ स्वामी की चन्द्रकान्त
मणिमय प्रतिमा श्री ज्वालामालिनी देवी के देहरासर की है ।
वल्लभी में आई हुई, श्री चन्द्रप्रभ स्वामी की प्रतिमा नन्दिवर्द्धन
राजा की बनवायी हुई और श्री गौतमस्वामी द्वारा प्रतिष्ठित है ।
नाशिक मे जीवितस्वामी त्रिभुवनतिलक श्री चन्द्रप्रभ हैं ।
चन्द्रावती के मन्दिर में मुकुटसदृश श्री चन्द्रप्रभ है । वाराणसी
के विघ्नेश्वर मे भी श्री चन्द्रप्रभ भगवान है ।
९ कायाद्वार मे श्री सुविधिनाथ भगवान है ।
१० प्रयाग तीर्थ मे श्री शीतलनाथ है ।
११ विन्ध्याचल और मलयगिरि पर श्री श्रेयासनाथ
भगवान है ।
१२ चम्पानगर में विश्वतिलक श्री वासुपूज्य है ।
१३ कम्पिला जी तीर्थ में गगातट पर एव श्रीसिंहपुर मे श्री
विमलनाथ हैं ।
१३

१९० विविध तीर्थ-कल्प
लौटते हुए जिनदास श्रावक ने उन देवियो को उसी प्रकार
रोते देखकर कहा—अब क्यो रोती हो ? उसने मास ग्रहण नही
किया है । देवियो ने कहा—वह तो अधिक धर्माराधन करके
अच्युत-कल्प मे चला गया, हमारा पति नही बना ।
इस प्रकार जैन धर्म के प्रभाव को बहुत काल तक विचारता,
मनन करता हुआ जिनदास श्रावक अपने घर लौटा ।
इस प्रकार इस तीर्थ के निर्माता वंकचूल भी जगत को आनंद
देने वाले हुए । ढिंपुरीतीर्थरत्न का यह कल्प जैसा सुना, उसकी
किंचित् रूप से श्री जिनप्रभसूरि ने रचना की ।
यह चेल्लण पार्श्वनाथ का कल्प समाप्त हुआ । इसकी ग्रन्थ-
संख्या ११६ अक्षर २६ ऊपर हैं ।
◼
४४. ढिंपुरीस्तव
विविध उत्तुंग पर्वतों के बीच शुभ्र छाया सुशोभित श्री महावीर
प्रभु, पार्श्वनाथ, मुनि सुव्रत और आदिनाथ की प्रतिमाओ से युक्त,
नियमधारण करने वाले श्री वंकचूल की विश्वविश्रुत पल्ली
ढिंपुरी चिरकाल तक अद्भुत लक्ष्मी को करे ।
यहाँ हस्तिदेव नदी के तट पर स्थित मनोहर गगनचुम्बी
शिखर वाले चैत्यों को देखकर यात्री-गण अपने नेत्रो को शीतलता
देते हैं ।
यहाँ मूलनायक चरम जिनेश्वर महावीर स्वामी की लेप्यमय

ढिंपुरीस्तव १९१
विगाल प्रतिमा है। दाहिनी ओर चेल्लण पार्श्वनाथ जयवन्त है
जिनके रूपर सर्पफण अलकृत हैं।
एक ओर आदिनाथ जिनेश्वर और दूसरे ओर श्री मुनि सुव्रत
भगवान् हैं। इस प्रकार अनेक जिनेश्वर मूर्त्तियो वाला मन्दिर
चमकीले वादलो के सहश है। द्वार के समीपवर्त्तिनी अविका देवी
और छ० भुजाओ वाला क्षेत्रपाल हैं। सर्वज्ञ भगवान के चरण
कमलो मे वे दोनो सेवा करते हुए भ्रमर के समान सघ के विघ्न-
समूह क्षण मात्र मे नष्ट करते हैं।
यहाँ पौष दशमी को लोक समूह द्वारा किये जाने वाले उत्सव
को देखकर भव्यजन कलिकाल के घर निश्चय ही कृतयुग को
पाहुने के रुप मे आने की संभावना करते हैं।
देवताओ द्वारा पूजित इस तीर्थ की भक्ति से आराधना करके
समस्त मनोवाञ्छित प्राप्त होते हैं और सर्व प्रकार के भयो को
जीत लेते हैं। अत्यन्त सुगन्धित चन्दन को पा कर ताप से व्याप्त
आलिङ्गित अग को कौन सहन कर सकता है ?
पापो को दूर करने मे दृढ वद्यजन ढिंपुरी तीर्थ रत्न की
वन्दना करते हैं। जिसमे कल्प वृक्ष के सहश प्रार्थित अर्थ को देने
वाले पद्मावती और धरणेन्द्र द्वार चरण गृहीत भगवान चेल्लण
पार्श्वनाथ की यह कायोत्सर्ग स्थित देह है।
शक सवत् १२५१ दीपावली के दिन सघसहित इस नगरी मे
आकर प्रभावमहोदधि इस तीर्थ का मुदित मन वाले श्री जिनप्रभ-
सूरि ने यह स्तोत्र बनाया है।

१९४ विविध तीर्थ-कल्प
१४ मथुरा मे यमुना-ह्रद मे, द्वारिका मे समुद्र मे, और नाक-
पाणि मे श्री अनन्तनाथ भगवान हैं ।
१५ अयोध्या के समीप रत्नवाहपुर मे नागराजपूजित श्री
धर्मनाथ भगवान हैं ।
१६ किष्किन्धा, लका, पाताललका और त्रिकूटगिरि पर श्री
शान्तिनाथ भगवान हैं ।
१७ १८ गगा यमुना के वेणी सगम पर श्री कुन्थुनाथ—श्री
अरनाथ भगवान है ।
१९ श्रीपर्वत पर श्री मल्लिनाथ हैं ।
२० भृगुपत्तन—भरोच मे अनर्घ्य रत्नचूड श्री मुनिसुव्रत हैं ।
प्रतिष्ठानपुर—अयोध्या, विन्ध्याचल मे माणिक्य दडक मे श्री
मुनि सुव्रत भगवान हैं ।
२१ अयोध्या मे मोक्ष तीर्थ मे श्री नमिनाथ हैं ।
२२ सौरीपुर के शख-जिनालय मे, पाटला नगर मे, मथुरा,
द्वारिका, सिंहपुर, स्तम्भ तीर्थ मे पाताललिंग नामक श्री नेमि-
नाथ भगवान हैं ।
२३ अजाहरा मे नवविधि पार्श्वनाथ, स्तम्भन मे भवभयहर
पार्श्वनाथ, फलौदी मे विश्वकल्पलता श्री पार्श्वनाथ, करहेडा में
उपसर्गहर पार्श्वनाथ, अहिछत्रा में त्रिभुवनभानु पार्श्वनाथ, कलि-
कुण्ड और नागह्रद में श्री पार्श्वनाथ, कुवकुटेश्वर मे विश्वगज
पार्श्वनाथ । माहेन्द्र पर्वत पर छाया पार्श्वनाथ, ओकार पर्वत पर
-सहस्रफणा पार्श्वनाथ, वाराणसी मे दण्डखात मे भव्य पुष्कग-
वर्त्तक पार्श्व, महाकाल के अन्तर मे पातालचक्रवर्ती पार्श्व,
मथुरा मे कल्पद्रुम पार्श्व, चम्पा मे अशोकपार्श्व, मलयगिरि पर
श्री पार्श्वनाथ भगवान हैं ।

समवसरण रचना-कल्प १९५
२४ श्रीपर्वत पर घण्टाकर्ण महावीर, विन्ध्याचल पर श्री-
गुप्त, हिमाचल मे छायापार्श्व मन्त्राधिराज श्रीस्फुलिंग है। श्री-
पुर मे अन्तरिक्ष श्री पार्श्वनाथ, डाकुली भीमेश्वर मे श्री पार्श्व-
नाथ, भाइल स्वामिगढ मे देवाधिदेव हैं।
श्री रामसेन मे प्रद्योतकारी श्रीवर्द्धमान, मोढेरा, वायड,
खेडनाणा, पाली, मतुण्डक, मूगथला, श्री मालपत्तन, ओसियाँ,
कुण्डग्राम, सत्यपुर, टका मे, गंगाह्रद मे, सर स्थान मे, वीतभय मे,
चम्पा मे, अपापा मे, पुण्ड्र मे पर्वत पर नन्दिवर्द्धन कोटि भूमि मे
श्री वीर प्रभु हैं। राजगृह वैभारगिरि पर, कैलाग और श्री
रोहणाचल मे भी श्री महावीर भगवान हैं।
अष्टापद पर चौवीस तीर्थङ्कर हैं, समेतशिखर पर वीस जिनेश्वर
हैं, हेम सरोवर मे बहत्तर जिनालय है, कोटिशिला सिद्धक्षेत्र है।
इस प्रकार जैन धर्म मे प्रसिद्ध तीर्थों की नामावली को श्री
जिनप्रभसूरि ने स्फुटित किया। इनमे कुछ मैने देखे हैं, कुछ सुने है
वैसे ही अपने तीर्थों कै नामो की पद्धति मे मैंने लिखे हैं।
समस्त तीर्थों का नामसग्रह-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ
सख्या ४९ और २१ अक्षर हैं।

४६. समवशरण रचना-कल्प
श्री महावीर जिनेश्वर को नमस्कार करके पूर्वाचार्य कृत
समवशरण-रचना का गाथाओ से कल्प कहता हूँ।
वायुकुमार और मेघकुमार क्रमश एक योजन भूमि शुद्ध कर
सुगन्धित जल की वर्षा करते हैं। वाणमंतर मणिरत्नमय भूमि
गत करते हैं और कुसुमवृष्टि करते हैं।
श्रेष्ठ रजत कनक और रत्न के तीन प्राकार क्रमश भुवनपति,
ज्योतिष और वाणमंतर देव बनाते हैं। प्राकारो पर कचन, रत्न
और मणियो के कपिशीर्षक होते हैं।
उन प्राकारो का एक-एक गाऊ और छः सौ धनुष का अन्तर
होता है। तेतीस धनुष एक हाथ और आठ अगुल का विस्तार
होता हैं।
उन वप्रो के पाँच सौ धनुष ऊँचे द्वार होते हैं। ये सर्व माप
जिनेश्वरो के स्वहस्त प्रमाण से जानना चाहिए।
भूमि से दश हजार सोपान चढ़ने पर प्रथम प्राकार आता है।
वहाँ से पचास धनुष जाने पर पाँच हजार सोपान चढकर दूसरा
वप्र आता है।
उसका अन्तर भी पूर्वोक्त विधि से जान लेना चाहिए। तद-
नन्तर पूरे बीस हजार सोपान चढ़ने पर तीसरा कोट है।
वे सब क्रमश दश, पाँच और पाँच हजार सोपान एक हाथ
ऊँचे व एक हाथ विस्तीर्ण है। बाह्य, मध्य और अभ्यन्तर वप्रो के
ये सोपान समझना चाहिए।
उनके बीच मे भूमि से ढाई कोश ऊँचा, दो सौ धनुष लम्बा-

समवशरण रचना-कल्प १९७
चौडा मणिपीठ है और जिनेश्वरो की धनुष-ऊंचाई के समान ही
उसके चार द्वार हैं।
उस चार मणि-रत्न जटित सिंहासन हैं, जिन पर तीन छत्रो
से भूषित भगवान पूर्वाभिमुख विराजमान होते है।
समधिक योजन विस्तार वाला दो सौ सोलह धनुष ऊँचा
अशोक वृक्ष है। व्यन्तरदेव भगवान के तीन प्रतिबिम्ब शेष तीन
सिंहासनो पर विराजमान करते हैं।
परिषद के आगे प्रारम्भ मे मुनिराज, वैमानिक देवियाँ और
साध्वियाँ रहती हैं। भुवनपति व्यन्तर ज्योतिषी देव-देवी, वैमानिक
देव और पुरुष-स्त्री बैठते है।
कुडहिकेतु सकीर्ण एक हजार योजन ऊँचे दण्ड वाला धर्मध्वज
होता है, दो यक्ष चामरधारी होते हैं और जिनेश्वर के आगे धर्म-
चक्र होता है।
ऊँची ध्वजाएँ मणितोरण अष्ट मङ्गल, पूर्णकलश, मालाओ,
पचालिकाओ और छत्रादि से प्रत्येक द्वार सुशोभित होते हैं, धूप-
घटिकाएँ होती हैं।
क्रमश. हेम-श्वेत-रक्त और श्यामल वर्ण वाले वैमानिक,
व्यन्तर, ज्योतिषी और भुवनपति प्रतिद्वार पर रत्न के वप्र वाले
पूर्वादि वप्रो पर प्रतिहार होते हैं।
जय, विजय, जयन्त और अपराजित क्रमश गौर, रक्त,
कनक व नील आभा वाली देवियाँ पूर्व क्रम से कनकमय स्थापित
करती है।
प्रत्येक बाह्य वप्र के द्वार पर दोनो ओर जटित मुकुटो से
मण्डित तुम्बुरु, पट्‌वाङ्ग पुरुष श्रीमालाओ से युक्त स्थापित
करते हैं।
वाह्यवप्र मे यानादि रहते हैं, दूसरे वप्र मे तिर्यंच परस्पर

१९८ विविध तीर्थ-कल्प
शत्रु भी मित्र भाव वाले होकर बैठते हैं। ये सब रत्न वप्र के बाहर
मणिमय छद मे बैठते हैं।
बाह्य वप्र के द्वारा मध्य मे दो दो गोल वापियाँ होती हैं।
कोनो मे एक-एक चौकोर वापी होती है।
तीर्थंकर पादमूल मे नमस्कार करते हुए देव चारो ओर कल-
कल शब्द से उकडु बैठे हुए सिंहनाद करते हैं।
चैत्य वृक्ष, पीठ छदक, आसन, छत्र, और चामर जो भी
करणीय हैं, वे वाणमतर देव करते हैं।
पूर्व से पश्चिम का अवगाहन करती हुई दो-दो पद्मपंक्तियाँ
मार्ग मे भगवान के पाँवो के नीचे आती है। अन्य सात घूमती
हुई क्रमश पाँवो के नीचे आती रहती हैं।
दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाभिमुख देव कृत प्रतिबिम्ब
होते हैं। ज्येष्ठ गणधर अथवा अन्य दक्षिण पूर्व मे निकट बैठते हैं।
जिनेश्वर देव के प्रतिबिम्ब जो देवकृत हैं वे तीनो दिशाओ
के अभिमुख हैं। उनका भी वैसा ही प्रभाव हैं और तदनुरूप
होते हैं।