विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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है उसे प्रतिषेक कहते हैं । नाभि, केशान्तभूमि, जिह्वा, तालु,
श्रीवत्स, चुचुक, हाथ और पाँवो के तले तपनीय स्वर्णमय हैं।
नयनपद्म, कनीनिकाएँ, मगु, भौंहे, रोम और गिरके केश अरिष्ट-
रत्नमय हैं। ओष्ठ विद्रुममय हैं, दन्त स्फटिकमय हैं, गीर्षघटिका
वज्रमय हैं। अन्दर लोहिताक्ष प्रतिषेक वाली स्वर्णमय नासिकाएँ
हैं। लोहिताक्ष प्रतिषेक प्रान्त वाले अंकमय लोचन हैं। उन
प्रतिमाओ के पृष्ठ भाग मे प्रत्येक के एक-एक मुक्ताप्रवाल जाल
कस कोरट मल्ल दाम वाली, स्फटिक मणि-रत्न के दण्ड वाली,
श्वेत छत्र के धारण करने वाली छत्रधर प्रतिमाएँ हैं। उनके
दोनो ओर प्रत्येक उठाए हुए मणिचामरो वाली रत्नमयी चामर-
धारिणी प्रतिमाएँ हैं। प्रतिमाओ के आगे दो-दो नागप्रतिमाएँ,
दो-दो यक्षप्रतिमाएँ, दो-दो भूतप्रतिमाएँ, दो-दो कुण्डधारिणी
प्रतिमाएँ सर्वाङ्गोज्ज्वल रत्नमयी कृताञ्जलि हो पर्युपासना करती
हैं। तथा देवछंदा मे चौवीस रत्न घण्टे, चौवीस माणिक्य दर्पण और
वैसे ही स्वर्णमयी स्थान स्थित दीपिकाएँ है। तथा रत्नकरण्डक
पुष्प चगेरियाँ, लोमहस्त, पटलिकाएँ, आभरणकरण्डक कनकमय
हैं। धूपदहनक, आरतियाँ, रत्नमय मगलदीप, रत्नमय भृगार,
रत्नमय स्थाल, सोने के प्रतिग्रह, रत्नचन्दन के कलश, रत्नमय
सिहासन, रत्नमय अष्टमङ्गल, स्वर्णमय तेल के डब्बे, कनकमय
धूपभाण्ड और स्वर्णमय कमलहस्तक हैं। ये सब प्रत्येक प्रतिमा के
आगे होते हैं। वह चैत्य चन्द्रकान्त गाल से शोभित है। ईहामृग,
वृषभ, मकर, तुरगम, नर-किन्नर, विहग, वालग, रुरु, गरभ,
चमरी, गज, वनलताओ से विचित्रित रत्नस्तम्भो से समाकुल है।
स्वर्ण के ध्वज-दण्डमण्डित पताका है। उपरिस्थित किकिणी शब्द
से मुखर ऊपर पद्मराग कलश से विराजित और गोशीर्ष चन्दनरस
के हस्तको से लांछित है। विचित्र चेष्टाओ वाली, अधिष्ठित
नितम्ब वाली माणिक्य की गालभजिकाएँ, चन्दनरस से लिप्त