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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

२१२ विविध तीर्थ-कल्प
पुत्र हस्ति हुआ जिसके नाम से यह हस्तिनापुर नगर है जो अनेक
आश्चर्य की खान है । पहले श्री आदिनाथ भगवान का प्रथम पारणा
श्रेयांस के घर इक्षुरस से हुआ और पच दिव्य प्रकट हुए । यहाँ
शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ—तीन जिनेश्वरो का जन्म
हुआ और यही सार्वभौम सम्राट होकर ऋद्धि का भोग किया ।
मल्लिनाथ प्रभु भी यहाँ समवसरे थे जिससे यहाँ श्रावको के बन-
वाये हुए चैत्यचतुष्टय अद्भुत महिमा वाले देखे जाते हैं ।
यहाँ जगत् के नेत्रो को पवित्र करने वाला अम्बिका देवी का
भवन भी यात्रियो के उपद्रव को नष्ट करने वाला भासमान है ।
उन चैत्य की दीवालो को जाह्नवी गंगा अपनी तरंगो से
प्रक्षालित करती है । उछलती हुई कल्लोले भक्तिपूर्वक स्नात्र
कराती हो ऐसा लगता है ।
सनत्कुमार, सुभूम और महापद्म चक्रवर्त्ती एव मुक्तिश्री को
वरण करने वाले पाँच पाण्डव भी यही हुए हैं ।
गगादत्त और कार्त्तिक सेठ मुनि सुव्रत स्वामी के शिष्य हुए
और विष्णुकुमार ने नमुचि को यही शासित किया था ।
कलि के दर्प को नष्ट करने वाली भक्ति और विस्तृत संगीत-
युक्त उत्तम व्यय युक्त निर्व्याज भक्ति यहाँ भव्यो ने की ।
इस पत्तन मे गान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ के चार
कल्याणक हुए और जगत् के लोगो को आनन्दकारी श्री सम्मेत-
शिखर गिरि पर निर्वाण प्राप्त हुए ।
भाद्रपद कृष्ण ७, भाद्रपद शुक्ल ९ और फाल्गुन शुक्ल २
तिथि को इनका देवलोक से च्यवन हुआ । ज्येष्ठ कृष्ण १३, वैशाख
कृष्ण १४, और मार्गशीर्ष शुक्ल १० तिथि मे जन्म हुआ । ज्येष्ठ
कृष्ण १४, वैशाख कृष्ण ५, माघ सुदि ११ तीनो के दीक्षा के दिन
हैं । पोष वदि ९ चैत्र शुक्ल ३, ऊर्ज शुक्ल १२ आपकी ज्ञानोत्पत्ति
के दिन हैं ।