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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 442 में से

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कन्यानयन महावीर कल्प-परिशेष २१७
एक दिन सुलतान ने गुरु महाराज को दूर से आने मे प्रति-
दिन कष्ट होता है, सोचकर स्वयमेव अपने महल के निकट अभि-
नव भवनादि से गोभित 'सराई' दे कर श्रावक सघ को वसने का
आदेग दिया । सुलतान ने स्वय उस वस्ती का नाम "भट्टारक
सराई" दिया । बादगाह ने वही भगवान महावीर स्वामी का
मन्दिर और पौषधगाला बनवाई । स० १३८९ मिती आषाढ
कृष्ण ७ के सुमुहूर्त्त मे बादगाह् के समादिष्ट गीत वाजित्र नाट-
कादि सम्पदा से प्रकटित अमित महोत्सवादि से स्वय मुलतान
के मगंल-क्रिया देते हुए भट्टारक गुरु पौषधगाला मे प्रविष्ट हुए ।
प्रीति दान से सन्तुष्ट किया । दीन अनाथ लोगो का दान से उद्धार
किया ।
एक बार मार्गसिर मास मे पूर्व देग की जय-यात्रा के निमित्त
जाते समय सुलतान ने अपने साथ गुरु महाराज को लिया ।
स्थान-स्थान पर बन्दियो को छुडा कर धर्म-प्रभावना की । मथुरा
तीर्थ का उद्धार किया । ब्राह्मणो को दानादि से सन्तुष्ट किया ।
सत्यप्रतिज्ञ गुरु महाराज को नित्य प्रवास से कष्ट होता समझ
कर सुलतान ने खोजा जहाँमल्लिक के साथ आगरा नगर से
राजधानी के प्रति वापस भेज दिया । हस्तिनापुर यात्रा के लिए
फरमान ले कर सूरि जी स्वस्थान पधारे । चतुर्विध सघ को एकत्र
कर चाहड गाह के पुत्र वोहित्य गाह को सघपति तिलक किया
और गुरु महाराज ने आचार्य आदि परिवार परिवृत श्री हस्तिना-
पुर तीर्थ की यात्रा के लिए प्रस्थान किया । स्थान-स्थान पर सघ-
पति वोहित्य ने महोत्सव किए । तीर्थभूमि मे पहुँच कर तीर्थ को
बधाया । गुरु महाराज ने वहाँ नये बनवाये हुए गान्तिनाथ-
कुन्थुनाथ और अरनाथ जिनेग्वर के विम्व और अम्विका देवी की
प्रतिमा चैत्य स्थान मे प्रतिष्ठित किए । संघ वात्सल्यादि द्वारा संघ-