विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 293, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें२१० विविध तीर्थ-कल्प
राजर्षियो को चित्रान्तर गण्डिका से सर्वार्थसिद्धगति और मोक्ष गए
बतलाया है ।
इसी गिरिराज पर प्रवचन देवनानीत वीरमती ने चौबीस
जिन-प्रतिमाओ के भाल-स्थल पर रत्नजटित स्वर्णतिलक
चढाए । उसके तब धूसरी भव, युगलिया भव और देव भव प्राप्त
कर दमयन्ती के भव मे अन्धकार को दूर करने वाला भाल-स्थान
मे स्वाभाविक तिलक हुआ ।
इसी पर्वत पर बालि महर्षि कायोत्सर्ग करके स्थित थे ।
विमानस्खलन से कुपित रावण ने पूर्व वैर को स्मरण कर नीचे की
भूमि खोदकर, उसमे प्रविष्ट होकर अपने वैरी सहित अष्टापद
गिरि को उठाकर लवण समुद्र मे फेकने की बुद्धि से हजारो
विद्याओ का स्मरण कर पर्वत को उठाया । उन राजर्षि ने अवधि-
ज्ञान से यह जान कर चैत्य-रक्षा के निमित्त पैर के अगूठे से गिरि-
शिखर को दबाया । तब इससे सकुचितगात्र दशानन मुह से
रुधिर वमन करते हुए चीखने लगा । जिससे वह रावण नाम से
प्रसिद्ध हुआ । जब दयालु महर्षि ने छोडा तो वह चरणो मे गिर
कर क्षमायाचना कर स्वस्थान गया ।
यही लंकाधिपति ने जिनेश्वरदेव के समक्ष नाटक करते हुए
दैवयोग से वीणा की तांत टूटने पर नाट्य-भङ्ग न हो इस विचार
से अपनी भुजा की तात काट कर वीणा मे जोड दिया । इस
प्रकार वीणावादन और भक्त-साहस से सन्तुष्ट धरणेन्द्र ने तीर्थ-
वन्दना के लिए आये हुए रावण को अमोघ विजयाशक्ति रूप-
कारिणी विद्या दी ।
इसी पर्वत पर गौतम स्वामी ने सिंहनिषद्या चैत्य के दक्षिण
द्वार से प्रवेश कर पहले संभवनाथ आदि चार प्रतिमाओ को
वन्दन किया । फिर प्रदक्षिणा देते हुए पश्चिम द्वार से सुपार्श्वादि