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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 442 में से

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पृष्ठ 282

समवशरण रचना-कल्प १९९

हुए जो जिनेश्वरदेव कहते हैं उसे यदि सारी आयु तक (आजीवन)
सुनना पडे तो वे सुनने की इच्छा रखते हैं।
साढे बारह लाख और उतने करोड सोनइयो का प्रीतिदान
भगवान का आगमन कहने वाले को चक्रवर्ती देते हैं।
वासुदेव इतने ही प्रमाण के रजत का दान देते हैं। लाख और
हजार का दान मण्डलीक राजा (प्रान्तपति) देते हैं।
इभ्य—श्रेष्ठी आदि भी जिनेश्वर भगवान का आगमन सुनकर
नियुक्त पुरुषो को अपनी-अपनी भक्ति और वैभव के अनुसार दान
देते हैं।
राजा, युवराज, अमात्य द्वारा शासित प्रवर जनपद मे कोई
दुर्वलाखण्डित पूजायोग्य आढक कलमा शालि विना तुले अखण्ड
फलक जैसे वलि किए जाते हैं, जिनसे देवता भी स्तब्ध हो जाते हैं।
पूर्व द्वार से एक साथ ही पूजा की जाती है। तिगुनी पूर्व द्वार
पर उसकी आधी अन्य द्वार स्थित देवो को दी जाती है।
आधी-आधी अधिपतियो की और अवशेष याचक जनो की
होती है। यह सर्व रोगो का प्रशमन करने वाली होती है, छः
मास तक कोई व्याधि नही आती।
पादपीठ पर राजोपनीत सिंहासन पर बैठे हुए ज्येष्ठ गणधर
अथवा दूसरे गणधर दूसरे प्रहर मे देशना देते हैं।
श्री जिनप्रभसूरि ने यह समवशरण रचना-कल्प सक्षेप से
सूत्रानुसार लिखा है। इसे पढना चाहिए।
श्री समवशरण रचना-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ सख्या
४३ हैं।