विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टापदगिरि-कल्प [२०५]
नाम भी प्रसिद्ध है। आज भी अयोध्या के निकटवर्ती उड्डयकूट पर
स्थित होने पर आकाश निर्मल हो तो उसकी धवल शिखर
पंक्तियाँ दीखती हैं। फिर वह महासरोवर, घने सरस वृक्ष, पानी
के पूर वाले झरनो से युक्त, परिपार्श्व मे सचरण करते जलधर,
मत्त मोर आदि पक्षियो के कोलाहल युक्त, किन्नर-विद्याधररमणियो
से रमणीक, चैत्यो को वदन करने के लिए आने वाले चारण-
श्रमणादि लोगो के दर्शनमात्र से भूख प्यास हरण करने वाला,
निकटवर्त्ती मानसरोवर विराजित है। इसकी उपत्यका मे साकेत-
वासी लोग नाना प्रकार की क्रीडाएँ कराते हैं।
इसी के शिखर पर ऋषभदेव स्वामी चतुर्दश भक्त से पर्यंकासन
स्थित, दस हजार अणगारो के साथ माघी कृष्ण त्रयोदशी के दिन
अभिजित नक्षत्र मे पूर्वाह्लि मे निर्वाण प्राप्त हुए। शक्रादि ने वहाँ
स्वामी का देह-सस्कार किया। पूर्व दिशा मे स्वामी की चिता,
दक्षिण दिशा मे इक्ष्वाकुवंशियो की और पश्चिम दिशा मे शेष
साधुओ की थी। उन तीन चितास्थानो पर देवो ने तीन स्तूप
किये। भरत चक्रवर्ती ने स्वामी के सस्कार के निकटवर्ती भूतल
पर एक योजन लंबा, आधा योजन चौडा, तीन कोश ऊँचा सिंह-
निषद्या नामक प्रासाद रत्नोपल-वार्द्धकि रत्न के द्वारा बनवाया।
उसके स्फटिक रत्नमय चार द्वार हैं। उभय पक्ष मे सोलह रत्न
चदन कलश हैं। प्रत्येक द्वार पर सोलह रत्नमय तोरण हैं। द्वार-
द्वार पर सोलह अष्टमंगल हैं। उन द्वारो मे चार विशाल मुख्य
मण्डप हैं। उन मुख्य मण्डपो के आगे चार प्रेक्षामण्डप हैं। उन
प्रेक्षामण्डपो के मध्य भाग मे वज्रमय अक्षवाटक हैं। प्रत्येक
अखाडे के बीच मे रत्नसिंहासन हैं। प्रत्येक प्रेक्षा-मण्डप के आगे
मणिपीठिकाएँ हैं। उनके ऊपर रत्नमय चैत्य-स्तूप हैं। उन चैत्य-
स्तूपो के आगे प्रत्येक के प्रतिदिशा मे वडी विशाल पूजा-मणि-