विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तिनापुर तीर्थ-स्तवन २११
आठ तीर्थङ्करो को, फिर उत्तर द्वार से धर्मनाथादि दश को, फिर
पूर्व द्वार से ऋषभदेव अजितनाथ जिनेश्वरद्वय को वन्दन किया ।
यद्यपि यह तीर्थ अगम्य है फिर भी स्फटिक वन-गहन समर
वालो से जो जल मे प्रतिविम्बित चैत्य के ध्वज-कलशादि देखता
है वह भाव-विशुद्धि वाला भव्य जीव वहाँ ही पूजा-न्हवणादि करते
हुए यात्रा का फल प्राप्त करता है, क्योकि भावोचित फलप्राप्ति
कही है।
भरतेश्वर से निर्माणित प्रतिमायुक्त इस चैत्य-स्तूपो की जो
वन्दन-पूजन करते हैं वे धन्य है, वे श्रीनिलय हैं।
श्री जिनप्रभसूरि द्वारा निर्मित इस अष्टापद-कल्प की जो भव्य
अपने मन मे भावना करते है, उनके कल्याण उल्लसित होते हैं।
पहले अष्टापद-स्तवन मे जो अर्थ सक्षेप से कीर्त्तन किया है वही
हमने विस्तार से इस कल्प मे प्रकाशित किया है।
श्री अष्टापद तीर्थ का कल्प समाप्त हुआ, इसकी ग्रथ सख्या
११८ है।
५०. हस्तिनापुरतीर्थ-स्तवन
जगद्वद्य श्री गान्तिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ भगवान को
नमस्कार कर के इन्द्रो के समूह से स्तुत्य गजपुर तीर्थ की स्तवना
करता हूँ ।
भगवान ऋषभदेव के सौ पुत्रो मे कुरु नामक राजा हुआ ।
उसके नाम से यह राष्ट्र कुरुक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ । कुरु का