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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 442 में से

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पृष्ठ 298

कल्यानयन महावीर कल्प-परिशेप २१५

आचार्यवर्गों द्वारा वंद्यमान राजभूमिमण्डन श्री अल्लावपुर दुर्ग
पहुचे। वहाँ उस प्रकार की प्रभावना का प्रकर्ष को नही सहन
करने वाले म्लेच्छो की विप्रतिपत्ति को जानकर सूरि महाराज के
शिष्योत्तम, राजसभामण्डन, गुरुगुणालंकृत देह वाले श्री जिनदेव
सूरि द्वारा विज्ञप्ति करने पर नरेश्वर ने बहुमानपूर्वक सन्मुख भेज
कर मल्लिक के प्रति फरमान के साथ सकल स्वस्तिक वस्तु विशेष
से जिनशासन की प्रभावना करते हुए डेढ मास रहकर अल्लाव-
पुर से चले। फिर सुलतान ने श्री सिरोह महानगर में गुरु महाराज
के सामने स्निग्ध देव दूष्य प्राय उत्तदश वस्त्र भेजकर अलंकृत
किया। गुरु महाराज हम्मीर वीर की राजधानी—रणथंभोर—के
निकट प्रदेश मे पहुचे। चिरोपचित भक्ति राग पूर्वक दर्शननिमित्त
को भी अमृत कुण्ड-स्थान की भाँति अपने को धन्य मानने वाले,
सामने आये हुए आचार्य-मुनि-श्रावकवृन्द से परिवृत्त युगप्रधान
प्रभु मिती भाद्रपद शुक्ल २ के दिन राजसभा मे पधारे। आनद
पूर्ण नेत्रो वाले सुलतान श्री महम्मद बादशाह ने अभ्युत्थान
आचरण पूर्वक कोमल वाणी से श्री सूरिजी से कुशल पृच्छा की।
उसने गुरु महाराज के हाथ का चुम्बन कर अत्यन्त स्नेह पूर्वक
बडे आदर के साथ उनका आदर अपने हृदय पर रखा। गुरु
महाराज ने भी तत्काल निर्मित नवीन आशीर्वाद काव्य द्वारा
नरेश्वर का चित्त चमत्कृत किया। उसने महा महोत्सव के साथ
सूरिजी को विगाल शाला वाली पौषधशाला मे भेजा। बादगाह
ने गुरु महाराज के साथ जाने के लिए प्रधान पुरुषो, हिन्दू राजाओ
और महामल्लिक श्री दोनार प्रमुखो को आदेग दिया।
हजारो वंदनार्थ चिर उत्कण्ठित और चिर दर्शन लालसा
वाले श्रावको व नागरिको ने नमस्कार किया। कौतूहल प्रकृति से
जानपद लोग भी साथ चल पडे। वन्दी वृन्द के विरुदावली,
स्तवना करते, बादगाहि प्रसादित भेरी-वेणु-वीणा-मद्दल-मृदग-