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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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२०८ विविध तीर्थ-कल्प

कलशयुग से अलंकृत द्वारदेश के उभय पक्ष मे शोभायमान हैं।
तिरछी बाँध के लटकाई हुई धूपित-सुगन्धित सुन्दर मालाएँ,
पंचवर्ण कुसुम रचित गृहतल, कर्पूर, अगर, कस्तूरी, धूपधूम-
धारित अप्सरागण संकीर्ण, विद्याधरी-परिवृत, आगे-पीछे और
पार्श्व मे चारु चैत्य पादपो, मणिपीठिकाओ से विभूषित भरत की
आज्ञा से यथाविधि वार्धकिरत्न के द्वारा निष्पादित है। वही
दिव्य रत्न-शिलामय ९९ भाइयो की प्रतिमाएँ बनवाईं। सुश्रूषा
करती हुई अपनी प्रतिमा भी बनवाई। चैत्य के बाहर भगवान
ऋषभदेव स्वामी का एक स्तूप और ९९ भाइयो के स्तूप करवाए।
मनुष्य लोग यहाँ आवागमन करके आशातना न करे इसलिए
लोहयंत्रमय आरक्षक पुरुष बनवाए जिससे वह अगम्य हो गया।
पर्वत की चोटियाँ भी दण्डरत्न से तोड दी, अत वह गिरिराज
अनारोहणीय हो गया। योजन-योजन के अन्तर मे मेखलारूप
आठ सीढियाँ—पदो द्वारा मनुष्यो के लिए अलंघ्य कर दिया।
जिससे अष्टापद नाम प्रसिद्ध हो गया।
फिर काल-क्रम से चैत्यरक्षण के निमित्त सगर चक्रवर्ती के
साठ हजार पुत्रो ने दण्डरत्न से पृथ्वी को खोद कर सहस्र योजन
की परिखा की। दण्डरत्न से गगातट को विदीर्ण कर जल से
पूर्ण किया। तब गगा को खाई मे भरने से अष्टापदासन्न ग्राम-
नगर, पुरादि डूबने लगे। अत उसे दण्ड-रत्न से निकाल कर
कुरु देश के बीच से, हस्तिनापुर के दक्षिण से कोशल देश के
पश्चिम, प्रयाग से उत्तर, काशी देश से दक्षिण, वत्सदेश मे दक्षिण
से मगध के उत्तर से नदी का मार्ग काटते हुए सगरादिष्ट जन्हुपुत्र
भागीरथ कुमार ने पूर्वी समुद्र मे उतार दिया। तब से गगासागर
तीर्थ हो गया।
इसी पर्वत पर ऋषभदेव स्वामी के आठ पौत्र, और वाहुबलि-
प्रमुख निनानवें पुत्र भी स्वामी के साथ सिद्ध हुए। इस प्रकार