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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 442 में से

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पृष्ठ 283

४७. कुडुँङ्गेश्वर नाभेय (ऋषभ) देव-कल्प
श्वेताम्बराचार्य चारणमुनि वज्रसेन द्वारा चक्रावतार तीर्थ
मे प्रतिष्ठित श्री ऋषभदेव जयवन्त हो ।
विशेष तेजस्वी भगवान कुडुङ्गेश्वर ऋषभदेव का सङ्क्षिप्त कल्प
देखकर कहता हूँ ।
पूर्व काल मे लाट देश मण्डन भरोच नगर के अलङ्कार
शकुनिकाविहार स्थित श्री वृद्धवादीसूरि ने "जो जिससे हारेगा
वह उसका शिष्य होगा" इस प्रतिज्ञा को लेकर दक्षिणापथ से
आये हुए कर्णाट भट्ट दिवाकर को जीत कर उसे व्रत ग्रहण
कराया, सिद्धसेन दिवाकर नाम रखा गया । फिर कितने ही दिनो
मे उसने समस्त आगमो का अध्ययन कर लिया । एक दिन
उन्होने—सभी आगमो को मैं संस्कृत मे कर दूंगा—कहा तो
पूज्यश्री ने कहा—क्या तीर्थङ्कर-गणधर संस्कृत नही जानते थे जो
अर्द्धमागधी मे आगमो को कहा । ऐसा बोलने से तुम्हे प्रायश्चित्त
लगा है । तुम्हे क्या कहा जाय, तुम स्वय जानते हो ।
उन्होने विचार कर कहा—भगवन् ! मौन धारण करके बारह
वर्षीय पाराञ्चित नामक प्रायश्चित्त लेकर रजोहरण मुखवस्त्रिकादि
साधु लिंग को गुप्त रखकर अवधूत के वेश मे विचरण करना
आवश्यक है । गुरु महाराज के मुख से—"यह उपयुक्त है" ऐसा
सुन कर ग्राम नगरादि देशान्तर मे पर्यटन करते हुए बारहवे वर्ष
उज्जैन मे कुडुङ्गेश्वर देवालय मे शेफालिका के कुसुम से रञ्जित वस्त्र
धारण किए हुए आकर बैठ गए । लोगो द्वारा "देव को क्यो नही
नमस्कार करते हो ?" ऐसा कहने पर भी कुछ नही बोले । इस
प्रकार जन-परम्परा से सुनकर सबको ऋण मुक्त करके अपना