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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

४८ व्याघ्री-कल्प
जो जीव-जन्तु आराधक होते हैं, उनका कीर्त्तन करने से
निश्चय ही कल्याण होता है, यह हृदय मे आलोचना-विचार करके
मै किञ्चित् रूप मे व्याघ्री-कल्प कहता हू ।
श्री शत्रुञ्जय पर आदिनाथ चैत्य दुर्ग के प्रतोली द्वार को रोक
कर कभी कोई व्याघ्री आ बैठी । उसे निश्चलाङ्गी देखकर उससे
आतङ्कित चिन्तित मन वाले श्रावक लोग जिनेश्वर को नमन
बाहर से ही कर लेते, पर आगे नही जाते ।
कोई साहसी ठाकुर उसके पास गया, पर वह न तो उसके प्रति
आकृष्ट हुई और न उसको किञ्चित् भी मारने की चेष्टा की ।
तब उस क्षत्रिय ने कही से मास लाकर उसके आगे रखा, पर
उसने उस ओर आँख उठाकर भी नही देखा ।
अब निर्भय होकर श्रावको ने भी उसके आगे आकर क्रमश˙
उत्तम भक्ष्य और पानी रखा । तो भी उसे अनिच्छुक देखकर
जनता ने हृदय मे सोचा—अवश्य ही इसने जातिस्मृति पाकर
तीर्थ पर अनशन स्वीकार किया है ।
इसका तिर्यंच भव भी प्रससनीय है, जिसने चारो प्रकार का
आहार छोड दिया । यह एकाग्र नेत्रो से देव को ही निरीक्षण
करती है ।
साधर्मी की बुद्धि से श्रावको ने उसकी चन्दन-पुष्पादि से पूजा
की और संगीत उत्सवादि मे भावना-भक्ति मे लग गए ।
निरागार प्रत्याख्यान करवाया और हर्षपूर्वक मन से ही
उसने श्रद्धा करके उसे स्वीकार किया ।