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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

२१६ विविध तीर्थ-कल्प

पहु-पटह-शंख युक्त भुगलादि विपुल वाजित्रो से दिग्दिगत को
ध्वनित करते, विप्रवर्ग के वेदध्वनिपाठ और गन्धर्वो, सधवाओ
द्वारा मगल गाते हुए तत्काल श्री सुलतान सराय की पौषध शाला
पहुँचे । सघ के प्रधान पुरुषो ने वधामणा महोत्सव किया । सकल
सघ कारित महोत्सव सहित भाद्रपद शुक्ल ३ के दिन श्री पर्यूषण
कल्प सूत्र वाचा । गुर्वागमन प्रभावना-लेख स्थान-स्थान पर पहुंचे,
सारे देश का सघ रंजित हुआ । सैकडो राज-वन्दी, वृद्ध लोगो और
वन्दी बनाये हुए सैकडो-हजारो श्रावको को छुड़ाया । करुणापूर्वक
जैनेतर लोगो को भी कारागार से उन्मुख किया । अप्रतिष्ठित
लोगो को प्रतिष्ठा दी और दिलाई । इस तरह अनेक प्रकार से
जैन धर्म की प्रभावना की और कराई !
सूरि महाराज प्रतिदिन राजसभा मे पधार कर पण्डितो,
वादिवृन्दो पर विजय प्राप्त कर धर्म-प्रभावना करते । क्रमशः
चातुर्मास पूर्ण किया । एक दिन फाल्गुन महीने मे सुलतान ने
अपनी माता 'मग्दूम-इ-जहाँ' के दौलताबाद से आते समय चतु-
रंगिणी सेना और परिवार सहित सुसज्जित होकर स्वागतार्थ
सामने जाते हुए सूरिजी को भी साथ मे लिया । 'वडथूण' स्थान
मे माता से मिलकर वादशाह ने सबको महादान दिया और
प्रधान 'कवाहि' वस्त्र पहनाये । क्रमशः राजधानी मे महोत्सव
पूर्वक आये । गुरु महाराज को वस्त्र कर्पूरादि से सम्मानित किया ।
सूरिजी ने मिति चैत्र शुक्ल १२ के दिन राजयोग मे सुलतान
को पूछ कर शाही साईवान की छाया मे नन्दी मण्डाण कराके
पाँच शिष्यो को दीक्षा दी । मालारोपण, सम्यक्त्व धारण आदि
धर्मकृत्य कराये । थिरदेव के पुत्र ठक्कुर मदन ने व्यय किया ।
मिति आषाढ शुक्ल १० के दिन नव्य निर्मादित तेरह प्रतिमाओ
की विस्तृत समारोह पूर्वक प्रतिष्ठा की । बिम्ब-निर्माताओ ने,
विशेषकर साहु महाराज पुत्र अजयदेव ने प्रचुर द्रव्यव्यय किया ।