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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

२०४ विविध तीर्थ-कल्प
इस प्रकार वह तीर्थ के माहात्म्य से ही गुद्ध वासना-भावना
समृद्ध हुई । सात आठ दिन अनगन पालन कर पापो को नष्ट कर
वह स्वर्ग गई ।
अगर-चन्दन मे उसके गरीर का अग्नि-सस्कार करके प्रतोली
के दक्षिण तरफ उसकी पाषाणमूर्त्ति स्थापित की ।
तीर्थचूडामणि श्री विमलाचल की चिरकाल जय हो, जहाँ
तिर्यंच भी आराधकाग्रणी हुए ।
श्री जिनप्रभसूरि ने यह व्याघ्री-कल्प रच कर जो पुण्य उपार्जन
किया वह श्रीसघ को सुखकारी हो ।
यह व्याघ्री-कल्प समाप्त हुआ, इसकी ग्रन्थ सख्या १४ है ।
४९. अष्टापदगिरि-कल्प
अष्टापद-स्वर्ण के समान देह की कान्ति वाले भवरूपी हस्ती
के लिए अष्टापद के समान श्री ऋषभदेव को नमस्कार करके
अष्टापद गिरि का कल्प सक्षेप से कहता हूँ ।
इसी जम्बूद्वीप नामक द्वीप मे दक्षिण भरतार्द्ध मे भारतवर्ष में
नौ योजन चौडी और बारह योजन लवी अयोध्या नामक नगरी
है । यही श्री ऋषभ-अजित-अभिनदन-सुमति-अनन्तादि जिनेश्वरो
की जन्मभूमि है । इस के उत्तर दिगा मे बारह योजन पर अष्टा-
पद नामक कैलाग अपर नाम वाला रम्य गिरिश्रेष्ठ आठ योजन
ऊँचा, स्वच्छ स्फटिक गिलामय है । इसी से लोगो मे धवल गिरि