विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टापदगिरि-कल्प २०९
एक सौ आठ उत्कृष्ट अवगाहना से एक समय मे आश्चर्यभूत
सिद्ध हुए।
श्री वर्द्धमान स्वामी ने स्वयं कहा कि "जो मनुष्य इस पर्वत
पर स्वशक्ति से चढ कर चैत्यो की वन्दना करेगा वह इसी भव मे
मोक्ष प्राप्त होगा।" यह सुन कर लब्धिनिधान भगवान गौतम
स्वामी इस पर्वतश्रेष्ठ पर चढे। चैत्यो की वन्दना कर अशोक
वृक्ष के नीचे वैश्रमण के आगे तप से कृश अग का वखान करते हुए
स्वय उपचित गरीर वाले अन्यथा वादकारी है—ऐसे उसके
विकल्प को निवारण करने के लिए पुण्डरीक अध्ययन प्रणीत
किया। पुष्ट देह वाला पुण्डरीक भावशुद्धि से सर्वार्थसिद्ध गया
और दुर्बल शरीर वाला कण्डरीक सातवी नरक गया। यह
पुण्डरीक अध्ययन सामानिक देव वैश्रमण ने गौतम स्वामी के मुख
से सुनकर अवधारित किया। वे ही तुववण सन्निवेश मे धनगिरि
की पत्नी सुनंदा के गर्भ मे उत्पन्न होकर दश पूर्वधर श्री वज्र
स्वामी हुए। अष्टापद से उतरते हुए गौतम स्वामी ने कौडिन्य-
दिन्न-सेवालि तापसो को पन्द्रह सौ तीन की सख्या मे दीक्षित
किया। उन्होने जनपरम्परा से "इस तीर्थ के चैत्यो की वदना
करने वाला इसी भव मे मोक्ष प्राप्त करेगा"—ऐसे वीर-वचनो को
सुनकर प्रथम, दूसरी और तीसरी मेखला सख्यानुसार कौडिन्यादि
चढे और इससे आगे जाने मे असमर्थ थे। उन्होने गौतम स्वामी
को अप्रतिहत उतरते देखकर विस्मित हो प्रतिबोध पाया और
उनके पास दीक्षित हो गए।
इसी पर्वत पर भरत चक्रवर्ती आदि अनेक महर्षि कोटि सिद्ध
हुए। वही सगर चक्रवर्ती के सुबुद्धि नामक महामात्य ने जन्हु
आदि सगर के पुत्रो के समक्ष आदित्ययशा से लेकर पचास लाख
कोटि सागरोपम काल मे भरत महाराजा के वश मे समुद्भूत
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