विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्भट वादभट्ट वादवृन्दो के अनल्प दर्प को अपहरण करते हुए
उन्होने कुछ कम तीन वर्ष बिताये ।
इधर श्री योगिनीपुर-दिल्ली मे शकाधिराज श्री महम्मद गाह
किसी अवसर प्रस्तुत होने पर पण्डितो की गोष्ठी मे शास्त्र-विचार
मे सशय उत्पन्न होने पर गुरु महाराज के गुणो का स्मरण किया ।
सुलतान कहने लगा—आज यदि वे भट्टारकसभा को अलकृत
करते तो मेरे मनोगत सारे संशय दूर करने मे क्षणमात्र मे सहज
क्षमताशील थे । निश्चय ही उनकी बुद्धि से पराजित होकर
वृहस्पति भी भूमि का त्याग कर आकाश में चला गया ।
इस प्रकार राजा द्वारा गुरु-गुण-वर्णना-व्यतिकर से तत्काल
समयज्ञ दौलतावाद से आये हुए ताज मल्लिक ने पृथ्वी पर मस्तक
टिका कर निवेदन किया—महाराज ! वे महात्मा वहाँ हैं पर उस
नगर का जल नही मानने से वे बहुत कृशाङ्ग—थक गए हैं।
तब गुरुगुणप्राग्भार स्मृत पृथिवीपति सुलतान ने उसी मीर को
आदेश दिया कि—मल्लिक ! तुम शीघ्र दुवीरखाने मे जाकर
फरमान पत्र लिखाकर वहाँ भेजो ! वैसी सामग्री भी भेजो जिससे
भट्टारक पुन यहाँ आवें ।
मल्लिक ने वैसा ही किया, फरमान भेजा । क्रमश दौलता-
वाद-राजसभा मे पहुँचा । नगरनायक श्री कुतुलखान ने भट्टारक
श्री जिनप्रभसूरि जी को विनयपूर्वक शाही फरमान आने व
दिल्ली के प्रति प्रस्थान करने की सूचना दी । तब दस दिन के
पश्चात् तैयार होकर ज्येष्ठ शुक्ल १२ राजयोग मे गुरु महाराज ने
सघ सहित आने की सूचना पहुचाते हुए प्रस्थान किया ।
क्रमश स्थान-स्थान पर महोत्सवादि का प्रादुर्भाव कराते,
विषम दूषम काल के दर्प की दलन करते, अन्तरालवर्त्ति सकल
जनता के नेत्रो को कुतुहल उत्पन्न करते, धर्म-स्थानो के उद्धार
करवाते, दूर से ही दर्शनोत्कण्ठित भक्तो व स्वागतार्थ आते हुए