विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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शत्रु भी मित्र भाव वाले होकर बैठते हैं। ये सब रत्न वप्र के बाहर
मणिमय छद मे बैठते हैं।
बाह्य वप्र के द्वारा मध्य मे दो दो गोल वापियाँ होती हैं।
कोनो मे एक-एक चौकोर वापी होती है।
तीर्थंकर पादमूल मे नमस्कार करते हुए देव चारो ओर कल-
कल शब्द से उकडु बैठे हुए सिंहनाद करते हैं।
चैत्य वृक्ष, पीठ छदक, आसन, छत्र, और चामर जो भी
करणीय हैं, वे वाणमतर देव करते हैं।
पूर्व से पश्चिम का अवगाहन करती हुई दो-दो पद्मपंक्तियाँ
मार्ग मे भगवान के पाँवो के नीचे आती है। अन्य सात घूमती
हुई क्रमश पाँवो के नीचे आती रहती हैं।
दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाभिमुख देव कृत प्रतिबिम्ब
होते हैं। ज्येष्ठ गणधर अथवा अन्य दक्षिण पूर्व मे निकट बैठते हैं।
जिनेश्वर देव के प्रतिबिम्ब जो देवकृत हैं वे तीनो दिशाओ
के अभिमुख हैं। उनका भी वैसा ही प्रभाव हैं और तदनुरूप
होते हैं।