सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 269

१८६ विविध तीर्थ-कल्प
सोने के रथ मे स्थित जीवन्त स्वामी श्री पार्श्वनाथ भगवान की
प्रतिमा देखी और उस प्रतिमा के हृदय पर उस कटोरे को भी
देखा। धीवर ने कहा—ये दम्पति धन्य हैं जिनका घिसा हुआ ,
चन्दन विलेपन भगवान के हृदय पर स्थित है। धीवर ने उसे
लाकर व्यापारी को दिया, उसने भी उसे प्रचुर द्रव्य दिया।
नाविक ने विम्व का स्वरूप कहा तो श्रद्धालु वङ्कचूल ने उसे ही
प्रवेग कराके भगवत् प्रतिमा को निकलवा और स्वर्णरथ को वही
छोड दिया। भगवान ने स्वप्न मे आगे ही सूचित कर दिया था—
जहाँ डाली हुई पुष्पमाला जाकर ठहरे वहाँ प्रतिमा की शोध
करना। तदनुसार विम्व लाकर वङ्कचूल राजा को समर्पित कर
दिया। उसने श्री महावीर स्वामी विम्ब-जिनालय के बहिर्मण्डप मे
स्थापित किया और जबतक इसके लिए नया मन्दिर न बने तब
तक यही विराजमान रहे। मन्दिर तैयार होने पर उसमे स्थापित
करने के लिए राजकीय पुरुपो ने विम्व को उत्थापन करना प्रारम्भ
किया पर देवताधिष्ठान से वह विम्व नही उठा और आज तक भी
वैसे ही स्थित है।
धीवर ने पल्लीपति वङ्कचूल राजा से निवेदन किया—मैंने
नदी मे प्रविष्ट होने पर दूसरी प्रतिमा भी देखी थी, उसे बाहर
लाने का प्रयत्न करना चाहिए, पूजा होने पर ही ऐसा होता है!
तब पल्लीपति ने अपनी सभा मे पूछा—कोई इन प्रतिमाओ का
सविधान जानते हो? किसने इन्हे नदी मे रखा? यह सुन कर
पुरातत्त्वविद स्थविर ने कहा—देव! एक नगर मे पहले एक राजा
था जो परचक्र के आने पर उसके साथ युद्ध करने के लिए सैन्य
सजा कर गया। उसकी पटरानी ने अपने सर्वस्व विम्बद्वय को सोने
के रथ मे रख कर जल-दुर्ग समझ कर कोटिंबक मे डाल कर
चर्मणवती मे रख दिए। चिरकाल युद्धरत अवस्था मे किसी खल
व्यक्ति ने बात फैला दी कि राजा को शत्रु ने नष्ट कर दिया।