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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 442 में से

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पृष्ठ 263

१८० विविध तीर्थ-कल्प

तेजपाल श्री शत्रुञ्जय गिरनार आदि तीर्थों की यात्रा के लिए
चले । हडाला गाँव आ कर जब अपने वैभव का विचार किया तो
वह सर्वस्व तीन लाख हुआ । फिर सौराष्ट्र में दुख का आकलन
कर एक लाख पृथ्वी मे गाडने के लिए रात्रि मे एक बड़े पीपल के
नीचे खड्डा खुदवाया । उसे खोदते हुए किसी का पुराना स्वर्ण
पूर्ण गोलक कलश निकला । उसे ले कर वस्तुपाल ने तेजपाल की
स्त्री अनुपमा देवी को मान्य होने से पूछा—इस निधि को कहाँ
रखे ? उसने कहा—गिरिशिखर पर ही इसे ऊँचा स्थापित करना
चाहिए जिससे प्रस्तुत निधि की भाँति वह अन्य के अधिकार मे न
आ सके । यह सुन कर वस्तुपाल ने उस द्रव्य को श्री शत्रुञ्जय
गिरनार मे व्यय किया । यात्रा कर के लौटते समय वे धवलक्कपुर
आये ।
इसी बीच महणदेवी नामक कन्नौजपति की पुत्री पिता से
कंचुलिक खर्च मे गुजरात की पृथ्वी पा कर उसका आधिपत्य भोग
कर मृत्यु के उपरान्त वही देश की अधिष्ठात्री देवी हुई । उसने
एक दिन राजा वीरधवल को स्वप्न मे कहा कि वस्तुपाल-तेज-
पाल को राज्यचिन्तक नियुक्त करके सुख से राज्य करो ! वैसा
करने से तुम्हारे राज्य-राष्ट्र की वृद्धि होगी । यह आदेश देते हुए
अपने को प्रकट कर देवी अन्तर्धान हो गई । प्रातः काल उठ कर
राजा ने वस्तुपाल-तेजपाल को बुलाया और सम्मानपूर्वक बड़े को
स्तम्भतीर्थ व धवलक्क के राज्यो का आधिपत्य एव तेजपाल को
सर्व राज्य की व्यापार मुद्रा दी । तब वे दोनो षट् दर्शन को दान,
नाना प्रकार के धर्म स्थान बनवाने आदि सैकडो सुकृत्यो द्वारा
अपना समय बिताने लगे ।
जैसे कि उन्होने सवा लाख जिन-प्रतिमाएँ बनवाईं । अठारह
करोड छियानवे लाख द्रव्य श्री शत्रुञ्जय तीर्थ पर व्यय किया ।
बारह करोड अस्सी लाख श्री उज्ज्वयन्त पर, बारह करोड त्रेपन